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Saturday, September 29, 2018

और रूह रिस रही है....पूजा प्रियंवदा

तुम तक पहुँचने का रास्ता
बहुत अकेला था
लम्बा भी
कड़ी धूप थी
और तुम्हारे इश्क़
की गर्मी
झुलसाती रही मेरी रूह को
मुसलसल

एक लाल रेशमी छाते से
सालों की बर्फ को
अचानक पिघलने से
बचाते हुए
गीले आँखों के पोरों को
छुपाते हुए
तुम तक पहुँची तो ....

तो तुम जा चुके थे
अपने जिस्म को
कर चुके थे
किसी और के नाम
रूह को
नीलाम कहीं कर चुके थे

तुम्हारे गिलास में
बची हुई दो घूँट व्हिस्की
एक आधी जली सिगरेट
थोड़ी ठंडी चाय चखी
और लौट आयी

अब पाँव के छालों के
मरहम का नाम याद नहीं
पीठ पर सूर्यदाह का धब्बा है
और रूह
रिस रही है !
-पूजा प्रियंवदा
पार्श्व स्वर

Monday, April 16, 2018

आखिर सत्ता का शेर भूखा कैसे सोयेगा....पूजा प्रियंवदा

one more girl
दिल्ली के ITO के पास 
यमुना पर नए चमकते पुल पर 
छोटे छोटे हाथ 
फल -सब्ज़ियाँ सजाते 
पेंसिल की छुअन 
नहीं जानते

थोड़ा आगे 
प्रगति मैदान की 
लम्बी वाली लाल बत्ती पर 
सख़्त तार के गोले से 
अपने छोटे शरीर को निकालती 
सिर्फ दो रुपये की मुस्कान

कनॉट प्लेस के चमकीले शीशों में 
देखती अपना मैला चेहरा 
जलती सड़क पर छोटे नंगे पाँव 
दिन भर भागते 
भूख से , शाम के लिए 
"सुरक्षित" कोना खोजते

वहीँ थोड़ी दूर 
संसद के सामने गुर्राती 
राजनैतिक शेरनियां 
हैबिटैट सेंटर में 
मॉकटेल्स में डूबी 
स्त्री-विमर्श की कवितायेँ

आखिर सत्ता का शेर 
भूखा कैसे सोयेगा ?
अगले दिन की 
ब्रेकिंग न्यूज़ के लिए 
भेड़िये खोजते हैं 
एक और लड़की 
उम्र, धर्म ,नाम 
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता !
-पूजा प्रियंवदा