हया आंखो में अब बहुत मुश्किल से मिलती है
बेशर्मी आजकल अब यहाँ नाजों से पलती है ।
बयां करदूं अगर सचाई तो कड़वी बहुत होगी
शर्म का छोड़ कर गहना बिना चूनर के चलती है।
नुमाइश जिस्म की करना कहां की ये शराफत हैं
हर शय दायरे में हो तभी तक सुन्दर लगती है ।
हार बैठा दुशासन तन से नौ गज खींच कर साडी
मगर आज कल कपडों मे कितनी देर लगती है ।
आज़ादी का नहीँ मतलब शर्म अपनी गवां बैठें
कटारी तेज हो कितनी म्यान मे अच्छी लगती हैं ।
मुझे कमज़ोर समझे तो समझने दीजिए जानिब
लाज से हों झुकी पलकें तो नारी नारी लगती है।
- पावनी दीक्षित "जानिब"
