अगन बरसती आसमां से जाने क्या क्या झुलसेगा
ज़मीं तो ज़मीं खुद तपिश से आसमां भी झुलसेगा
जा ओ जेठ मास समंदर में एक दो डुबकी लगा
जिस्म तेरा काला हुवा खुद तू भी अब झुलसेगा
ओढ़ के ओढ़नी रेत की पसरेगा तू बता कहां
यूं बेदर्दी से जलता रहा तो सारा संसार झुलसेगा
देख आ एक बार किसानों की जलती आंखों में
उजड़ी हुई फसल में उनका सारा जहाँ झुलसेगा
प्यासे पाखी प्यासी धरती प्यासे मूक पशु बेबस
सूरज दावानल बरसाता तपिश से चांद झुलसेगा
ना इतरा अपनी जेष्ठता पर समय का दास है तू
घिर आई सावन घटाऐं फिर भूत बन तू झुलसेगा।
-कुसुम कोठारी





