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Saturday, May 26, 2018

अगन बरसती आसमां से....कुसुम कोठारी

अगन बरसती आसमां से जाने क्या क्या झुलसेगा
ज़मीं तो ज़मीं खुद तपिश से आसमां भी झुलसेगा

जा ओ जेठ मास समंदर में एक दो डुबकी लगा
जिस्म तेरा काला हुवा खुद तू भी अब झुलसेगा

ओढ़ के ओढ़नी रेत की  पसरेगा तू बता कहां 
यूं बेदर्दी से जलता रहा तो सारा संसार झुलसेगा

देख आ एक बार किसानों की जलती आंखों में
उजड़ी हुई फसल में उनका सारा जहाँ झुलसेगा

प्यासे पाखी प्यासी धरती प्यासे मूक पशु बेबस
सूरज दावानल बरसाता तपिश से चांद झुलसेगा 

ना इतरा अपनी जेष्ठता पर समय का दास है तू
घिर आई सावन घटाऐं फिर भूत बन तू झुलसेगा।
 -कुसुम कोठारी


Friday, April 20, 2018

*पंद्रह कदम* ......कुसुम कोठारी


पहले कदम से साथ चले सब
एक सुंदर स्नेह *अलाव*'प्रज्वलित कर 
फिर मचा *'बवाल'* जबरदस्त
तीसरा कदम एक *'चित्र'* मनोरम
रचा सभी ने काव्य विहंगम
फिर कायनात हुई *इंद्रधनुषी*
*पहाड़ी नदी* की रागिनी मोहक
*खलल* पडा फिर भी ना  रुका कारवाँ
बढते रहे कदम उत्साहित
*प्रश्न* पूछना था तितली से
क्यों मंडराती हो सुमनों पर
सांझ ढले होती *उदास*
*परिक्रमा* ये कैसी विचित्र
फिर भी ना छोडी *उम्मीद*
*एहसास* था कितना गहरा
उस पर *तन्हाई* का पहरा
तोड बंधन भरी  *उड़ान* 
*डर* का ना था अब कोई काम
पंद्रहवें कदम पर *कदम*  मिलायें
आज तक की यही कहानी
लिखो कदम पर कविता सुहानी।
-कुसुम कोठारी।

Wednesday, January 10, 2018

जीवन और तुषार बूंद!! ....कुसुम कोठारी


निलंबन हुवा नीलाम्बर से 
भान हुवा अच्युताका कुछ क्षण
गिरी वृक्ष चोटी, इतराई 
फूलों पत्तों दूब पर देख 
अपनी शोभा मुस्काई, 
गर्व से अपना रूप मनोहर 
आत्म प्रशंसा भर लाया 
सूर्य की किरण पडी सुनहरी 
अहा शोभा द्विगुणीत हुई !
भाव अभिमान के थे अब उर्धमुखी 
हाँ, भूल गई "मैं "
अब निश्चय है अंतःपास मे 
मै तुषार बूंद नश्वर, भूली अपना रूप 
कभी आलंबन अंबर का 
कभी तृण सहारे सा अस्तित्व 
पर आश्रित नाशवान शरीर 
"मैं"आत्मा अविनाशी 
भूल गई क्यों शुद्ध स्वरूप। 
-कुसुम कोठारी


Wednesday, December 27, 2017

पीला पत्ता.....कुसुम कोठारी

शाख से झर रहा हूं 
मै पीला पत्ता 
तेरे मन से उतर गया हूं 
मैं पीला पत्ता
ना तुम्हें ना बहारों को 
कुछ भी अंतर पड़ेगा 
सूख कर मुरझाया सा 
मै पीला पत्ता 
छोड़ ही दोगे ना तुम मुझे 
आज कल मे
लो मै ही छोड तुम्हें चला
मै पीला पत्ता
संग हवाओं के बह चला 
मै पीला पत्ता 
अब रखा ही क्या है मेरे लिये 
न आगे की नियति का पता
ना किसी गंतव्य का
मै पीला पत्ता।। 

कुसुम कोठारी 

Monday, December 11, 2017

सर्द हवा की थाप....कुसुम कोठरी


सर्द हवा की थाप ,
बंद होते दरवाजे खिडकियां
नर्म गद्दौ में रजाई से लिपटा तन 
और बार बार होठों से फिसलते शब्द 
आज कितनी ठंड है 
कभी ख्याल आया उनका 
जिन के पास रजाई तो दूर
हड्डियों पर मांस भी नही ,
सर पर छत नही 
औऱ आशा कितनी बड़ी
कल धूप निकलेगी और 
ठंड कम हो जायेगी 
अपनी भूख, बेबसी, 
औऱ कल तक अस्तित्व 
बचा लेने की लड़ाई 
कुछ रद्दी चुन के अलाव बनायें
दो कार्य एक साथ 
आज थोड़ा आटा हो तो 
रोटी और ठंड दोनों सेक लें ।
-कुसुम कोठरी...