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Wednesday, February 26, 2020

तेरी महफिल में ...प्रीती श्रीवास्तव

तेरी महफिल में आना चाहता हूं।
गजल तुझको सुनाना चाहता हूं।।

मोहब्बत की कहानी इस शहर में।
सनम सबको बताना चाहता हूं।।

कभी रोकर कभी सबको रूलाकर।
कभी हँसकर हँसाना चाहता हूं।।

जमाना चाहे मुझको या न चाहे।
तुझे मैं आजमाना चाहता हूं।।

मुझे मेरी मुहब्बत की कसम है।
तुझे अपना बनाना चाहता हूं।।

तेरे दिल में ठहर कर अपने लिये।
मुहब्बत फिर जगाना चाहता हूं।।

तेरी ही आरजू में जानेजां मैं।
ये दुनिया भूल जाना चाहता हूं।।
-प्रीती श्रीवास्तव

Sunday, November 10, 2019

मुखौटे बदल के देखते हैं ...नवीन मणि त्रिपाठी


1212 1122 1212 22/112
न पूछिये कि वो कितना सँभल के देखते हैं ।
शरीफ़ लोग मुखौटे बदल के देखते हैं ।।

अज़ीब तिश्नगी है अब खुदा ही खैर करे ।
नियत से आप भी अक्सर फिसल के देखते हैं ।।

पहुँच रही है मुहब्बत की दास्ताँ उन तक ।
हर एक शेर जो मेरी ग़ज़ल के देखते हैं ।।

ज़नाब कुछ तो शरारत नज़र ये करती है ।
यूँ बेसबब ही नहीं वो मचल के देखते हैं ।।

गुलों का रंग इन्हें किस तरह मयस्सर हो ।
ये बागवान तो कलियां मसल के देखते हैं ।।

ज़मीर बेच के जिंदा मिले हैं लोग बहुत ।
तुम्हारे शह्र में जब भी टहल के देखते है ।।

न जाने क्या हुआ जो बेरुख़ी सलामत है ।
हम उनके दिल के जरा पास चल के देखते हैं ।।

ये इश्क़ क्या है बता देंगे तुझको परवाने ।
जो शम्मा के लिए हर शाम जल के देखते हैं ।।

हुआ है हक़ पे बहुत जोर का ये हंगामा ।
गरीब क्यूँ यहाँ सपने महल के देखते हैं ।।

बचाएं दिल को सियासत की साज़िशों से अब ।
ये लीडरान मुहब्बत कुचल के देखते हैं ।।

वही गए हैं बुलंदी तलक यहां यारो ।
जो अपने वक्त के सांचे में ढल के देखते हैं ।।

-नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित