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Thursday, September 11, 2014

मां की आँखें नम हो गई.....थानू निषाद "अकेला"

    










आंचल में छुपाते हुए
मां ने धीरे से कहा-
बेटी! डरो नहीं
अब तो मैं तुम्हारे पास
बैठी हूँ.


इतना सुनते ही, सहमी सी थोड़ी
दबी जुबान से बेटी ने कहा-
मां, यहां कैसे-कैसे लोग हैं ?
जो माँ को माँ, बेटी को बेटी
बहन को बहन
कहना भी भूल गए


मानवता को तार-तार कर
इंसान से हैवान बनते
ये कैसे आदमखोर लोग हैं
अब तो एक अकेली,
बाहर निकलने से भी
डर लगता है


इतना सुनते ही,
मां की आँखें नम हो गई.....


-थानू निषाद "अकेला"
टिकरापारा, फिंगेश्वर (छ.ग.)

Monday, September 8, 2014

हिलती हैं दीवारें...............डॉ. दीनदयाल दिल्लीवार
















रोज,
हर रोज ही
हिलती हैं
दीवारें
मेरे घर की
मारा जाता है
अनजानें ही
जब कोई-
आदमी
तो कांपता है
नक्शा
हिन्दुस्तान का

डॉ. दीनदयाल दिल्लीवार,
बालोद, जिला दुर्ग, छत्तीसगढ़
.........अवकाश, नवभारत