
उग आते हैं
तुम्हारे मन–मस्तिष्क के
उन गीले
कोनों पर
जहाँ भी
हल्की-सी सीलन है।
वहाँ पनप जाते है वो
तुम्हारे भीतर
तब तुम्हें
उनकी ही तरह
सही लगता है
किसी एक रंग को ही
सारे रंगो से फीका कहना।
गुमान लगता है तुम्हें
भूखे पेट भी
मंदिर मस्जिद का
नारा लगाना।
नही चुभते है तब तुम्हारे
कोमल हृदय में
कैक्टस के सख़्त काँटे भी
आख़िर जगह दी थी
तुमने ही..।
वो उग आये
मन–मस्तिष्क के
गीले कोनों पर
जहाँ हल्की-सी भी
सीलन रहती रही।
- शंकर सिंह परगाई