Showing posts with label डॉ. विजय कुमार सुखवानी. Show all posts
Showing posts with label डॉ. विजय कुमार सुखवानी. Show all posts

Monday, April 24, 2017

दिल के लहू में......डॉ. विजय कुमार सुखवानी


दिल के लहू में आँखों के पानी में रहते थे
जब हम माँ बाप की निग़हबानी में रहते थे

नये मकानों ने हम सब को तन्हा कर दिया
सब मिल जुल के हवेली पुरानी में रहते थे

माँ बाबा दादा दादी चाचा चाची बुआ
कितने सारे किरदार एक कहानी में रहते थे

कैसी चिंता कैसी बीमारी कहाँ का बुढ़ापा
तमाम उम्र हम लोग सिर्फ़ जवानी में रहते थे

ये कभी तो तन्हा मिले तो इस पर वार करें
सारे दुश्मन हमारे इसी परेशानी में रहते थे

जब तक बड़े बूढ़े सयाने हमारे घरों में रहे
हम लोग बड़े मज़े से नादानी में रहते थे

बड़े होकर किस किस के आगे झुकना पड़ा
जब छोटे थे सब हमारी हुक्मरानी में रहते थे

-डॉ. विजय कुमार सुखवानी

Saturday, September 17, 2016

किसी से न कहना.........डॉ. विजय कुमार सुखवानी


कहाँ गुज़ारा दिन कहाँ रात किसी से न कहना
यहाँ कोई राज़ की बात किसी से न कहना

बड़े तंगदिल हैं लोग इक पल में बदल जायेंगे
अपना मज़हब अपनी ज़ात किसी से न कहना

कौन है दोस्त कौन दुश्मन कहना मुश्किल है
खुलकर अपने ज़ज़्बात किसी से न कहना

अपनी जीत की तो जम कर मुनादी करो मगर
कब हुई शह कब हुई मात किसी से न कहना

तुम्हारी ताक़त का किसी को भी अंदाज़ा न लगे
कौन है ख़िलाफ़ कौन साथ किसी से न कहना

कोई तो शरीक ए दर्द भी ज़रूरी है ज़िंदगी में
अच्छा नहीं यूँ दर्द ए हयात किसी से न कहना

इन आँखों के मौसम आँखों में छुपा कर रखना
कब हुआ सूखा कब बरसात किसी से न कहना

-डॉ. विजय कुमार सुखवानी

Wednesday, September 7, 2016

ये दुनिया किसी के बगैर अधूरी नहीं होती...डॉ. विजय कुमार सुखवानी



इन्सान की हर ख्वाहिश पूरी नहीं होती
हर अर्ज़ी की किस्मत में मंजूरी नहीं होती

कौन कहता है फ़ासले दूरी से होते हैं
फ़ासले वहीं होते हैं जहाँ दूरी नहीं होती

दुनियादारी के फैसले तो ज़ेहन से होते हैं
इनमें दिल की रजामंदी ज़रूरी नहीं होती

बेवफ़ाई कुछ लोगों की फितरत होती है
हर बेवफ़ाई के पीछे मजबूरी नहीं होती

वो लोग नाकाम रहते हैं दुनिया में अक्सर
जिनसे मेहनत तो होती है जीहजूरी नहीं होती

ये भरम है कि हमीं से मुकम्मल है दुनिया
ये दुनिया किसी के बगैर अधूरी नहीं होती
-डॉ. विजय कुमार सुखवानी