Showing posts with label सजीवन मयंक. Show all posts
Showing posts with label सजीवन मयंक. Show all posts

Monday, August 13, 2018

कौन जो दूध का धुला होगा.....सजीवन मयंक

आज कोई तो फैसला होगा।
कौन जो दूध का धुला होगा।।

एक पगडंडी अलग से दिखती है।
कोई इस पर कभी चला होगा।।

होगी मशाल जिसके हाथों में।
पीछे उसके एक काफ़िला होगा।।

जो आदमी को गले लगाता था।
वो पागल आपको मिला होगा।।

झूठ बनकर गवाह आया है।
सांच की आंच में जला होगा।।

ठूँठ सा जो आज उपेक्षित है।
कभी इस पर भी घोंसला होगा।।

रोशनी का स्याह चेहरा है।
अंधेरे नें कहीं छला होगा।।

ये लावारिस पड़ा हुआ मुर्दा।
किसी की गोद में पला होगा।।
-सजीवन मयंक

Saturday, August 11, 2018

शून्य से शिखर हो गए........सजीवन मयंक

शून्य से शिखर हो गए।
और तीखा ज़हर हो गए।।

कल तलक जो मेरे साथ थे।
आज जाने किधर हो गए।।

बाप-बेटों की पटती नहीं।
अब अलग उनके घर हो गए।।

है ये कैसी जम्हूरी यहाँ।
हुक्मरां वंशधर हो गए।।

क्यो परिन्दे अमन चैन के।
ख़ून से तरबतर हो गए।।

भूल गए हम शहीदों को पर।
देश द्रोही अमर हो गए।।
-सजीवन मयंक

Friday, August 10, 2018

परेशां आईना है...........सजीवन मयंक

शब्द को कुछ इस तरह तुमने चुना है। 
स्तुति भी बन गयी आलोचना है।।

आजकल के आदमी को क्या हुआ है।
देखकर जिसको परेशां आईना है।।

दोस्तों इन रास्तों को छोड़ भी दो।
आम लोगों को यहाँ चलना मना है।।

जिसके भाषण आज सडकों पर बहुत हैं।
लोग कहते हैं कि वो थोथा चना है।।

जिस कुएँ में आज डूबे जा रहे हम।
वो हमारे ही पसीने से बना है।।

ठोकरों से सरक सकता है हिमालय।
जो अपाहिज हैं यह उनकी कल्पना है।।

खोल दो पिंजर मगर उड़ ना सकेगा।
कई वर्षों से ये पंछी अनमना है।।
-सजीवन मयंक