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Friday, December 16, 2016

दर्द इतना कहाँ से उठता है.........


दर्द इतना कहाँ से उठता है।
ये समझ लो की जाँ से उठता है।

सबसे आँखें चुरा रहा था मै
गम मगर अब जुबां से उठता है।

वो असर एक दिन दिखायेगा
शब्द जो भी जुबां से उठता है।

दिल गुनाहों से भर गया सबका
अब भरोसा जहाँ से उठता है।

आग लालच की खा गयी सबको
अब धुआँ हर मकाँ से उठता है।

याद किरदार फिर वही आया 
जो मेरी दास्तां से उठता है।

फिर कोई वस्वसा नहीं होता
न्याय जब नकदखाँ से उठता है।

मसअले प्यार से हुये थे हल
वो हुनर अब जहाँ से उठता है।

आग दिल की तो बुझ गई नादिर
बस धुआँ ही यहाँ से उठता है।

Tuesday, November 22, 2016

रिश्ते ऐसे क्यों मै निभाऊँ....नादिर खान

दुखड़ा अपना किसको सुनाऊँ
का पहनूँ मै, और का खाऊँ

जब दामों में आग लगी हो
क्या सौदा बाज़ार से लाऊँ

मंहगाई अब मार रही है
कैसे इससे पिंड छुड़ाऊँ

खुद अपना ही बोझ बना मै
कैसे घर का बोझ उठाऊँ

विद्यालय की फीस बहुत है
अब बच्चों को कैसे पढ़ाऊँ

पैसों से हैं, बनते बिगड़ते
रिश्ते ऐसे क्यों मै निभाऊँ

हैं झूठी तारीफ के भूखे
अब इनको मै क्या समझाऊँ 

-नादिर खान

Thursday, November 3, 2016

पिता.........नादिर खान















वो छुपाते रहे अपना दर्द
अपनी परेशानियाँ
यहाँ तक कि
अपनी बीमारी भी….

वो सोखते रहे परिवार का दर्द
कभी रिसने नहीं दिया
वो सुनते रहे हमारी शिकायतें
अपनी सफाई दिये बिना ….

वो समेटते रहे
बिखरे हुये पन्ने
हम सबकी ज़िंदगी के …..

हम सब बढ़ते रहे
उनका एहसान माने बिना
उन पर एहसान जताते हुये
वो चुपचाप जीते रहे
क्योंकि वो पेड़ थे
फलदार
छायादार ।









-नादिर खान

Monday, October 3, 2016

तेरी बातें तेरी ख़ुशबू हैं .........नादिर खान



नाम अल्लाह का लेकर मै निकल जाऊँगा 
मै जो हालात का मारा हूँ, संभल जाऊँगा |

दूर मंज़िल है बहुत राह में दुश्वारी भी
हाथ में हाथ दे वरना मै फिसल जाऊँगा |

बात झूठी हैं तेरी और हैं झूठी कसमें
क्‍यूँ समझता है कि बातों से बहल जाऊँगा |

दोष मुझमें हैं बहुत, प्यार मगर सच्चा है
साथ तेरा जो मिलेगा तो बदल जाऊँगा |

रूठ जाना जो बहाना है फ़क़त इक पल का
तुम अगर प्यार से देखोगी पिघल जाऊँगा |

तेरी बातें तेरी ख़ुशबू हैं अभी तक मुझमें
मै अगर टूट भी जाऊँ तो संभल जाऊँगा ।

-नादिर खान
http://nadirahmedkhan.blogspot.in/2016/02/blog-post.html

Thursday, September 29, 2016

शैतान हँस रहा है........नादिर खान

















लड़की चीख़ी
चिल्लायी भी
मगर हैवानों के कान बंद पड़े थे
नहीं सुन पाये
उसकी आवाज़ का दर्द

वह रोयी बहुत
आँखों से उसके
झर-झर आँसू गिरे
ख़ून के आँसू
मगर हैवानों की आँखें
पत्थर की थी
वो आँसुओं का दर्द
नहीं देख पाये

वो हिचकियाँ लेकर
सिसकती रही
दुहाई देती रही
कभी इंसानी रिश्तों की
कभी ईश्वर की
मगर हैवानों के दिल नहीं थे
वो दर्द महसूस न कर सके
वो घंटों लड़ती रही हैवानों से
अब मौत से लड़ रही है

दूर खड़ा शैतान हँस रहा है
मुस्कुरा रहा है
एक बार फिर
वो अपने मक़सद पर कामयाब रहा
इंसानियत को तार –तार कर गया
इंसानों का इंसानों पर से
विश्वास हिला गया
सभ्य समाज को आईना दिखा गया
-नादिर खान