Showing posts with label अहसास मेरी कलम से. Show all posts
Showing posts with label अहसास मेरी कलम से. Show all posts

Saturday, April 14, 2018

इनकी शरारत तो देखिए....कौशल शुक्ला

है मुफ़लिसी का दौर पर हिम्मत तो देखिए,
इस शायर-ए-फनकार की मोहब्बत तो देखिए।

बिन पंख के ही उड़ने को बेताब किस कदर,
नादान परिंदे की हसरत तो देखिए।

सूखे में किसानों का जीना मोहाल था,
अब बाढ़ है, खुदाई रहमत तो देखिए।

जब से हमारे शहर अदाकार आ गए,
बाज़ार में अश्कों की कीमत तो देखिए।

सदियों से परिंदों के जो आशियाँ रहे,
इन शख्त दरख्तों की नज़ाकत तो देखिए।

हर कायदे-कानून के वे जानकार हैं,
यह कवायद, पैंतरे, हुज्जत तो देखिए।

कहीं गाली, कहीं गंठजोड़ की जद्दो-जहद शुरू,
इस सियासी ऊंट की करवट तो देखिए।

जिसको भी देखिए वही कींचड़ में सना है,
सियासत में शरीफों की किल्लत तो देखिए।

जीने की आरज़ू में मरे जा रहें हैं लोग,
यह ख्वाहिश-ए-दौलत, ये जरूरत तो देखिए।

‘बाप’ छोड़िए, इन्हें ‘दादा’ बना लिया,
इस शहर में गुंडों की इज्जत तो देखिए।

जेल से रिहा नेता का खैरात लूटते,
चिथड़े लपेटे बच्चे की किस्मत तो देखिए।

अल्फ़ाज की तपिश को सीने में दबाकर,
गुम-सुम पड़े पन्ने की शराफत तो देखिए।

पिंजरे में कुलबुलाते दिल के सभी अरमान,
अब कागजों पर इनकी शरारत तो देखिए।

-कौशल शुक्ला

Sunday, April 1, 2018

तड़पते दर्द का एहसास....उर्मिला सिंह

सरेआम  कैसे  ज़ख्मों  से पर्दा  हटा दूँ!
ज़िगर है घायल आहों को कैसे सुना दूँ!!

 बारीकियां होती हैं ज़ख्मों की ऐ जाने ज़िगर!
 ‎किस तरह लफ़्ज़ों की माला से ग़जल बना दूँ!!

एक हम ही नही है जख्मी बेमुरव्वत जहाँ में!
हर शख़्स लहूलुहान है कैसे उसे सुकुते दर्द दूँ!!

तपती दुपहरी दर्द की जब अंतड़िया सूखने लगती!
भूख से बिलबिलाते बचपन को कैसे बांहों में भर लूँ!

ईमान, उसूल,विचार,विश्वास घायल तड़प रहें हैं!
तड़पते दर्द का एहसास कैसे सियासत को करा दूँ!!
**
-उर्मिला सिंह 

Saturday, March 31, 2018

काँच की चूड़ियाँ...अनुराधा सिंह

छुम छुम छन छन करती
कानों में मधुर रस घोलती
बहुत प्यारी लगी थी मुझको
पहली बार देखी जब मैंने
माँ की हाथों में लाल चूड़ियाँ
टुकुर टुकुर ताकती मैं
सदा के लिए भा गयी 
अबोध मन को लाल चूड़ियाँ
अपनी नन्ही कलाईयों में
कई बार पहनकर देखा था
माँ की उतारी हुई नयी पुरानी
खूब सारी काँच की चूड़ियाँ

वक्त के साथ समझ आयी बात
कलाई पर सजी सुंदर चूड़ियाँ
सिर्फ एक श्रृंगारभर नहीं है
नारीत्व का प्रतीक है ये 
सुकोमल अस्तित्व को
परिभाषित करती हुई
खनकती काँच की चूड़ियाँ
जिस पुरुष को रिझाती है
सतरंगी चूड़ियों की खनक से
उसी के बल के सामने
निरीह का तमगा पहनाती
ये खनकती छनकती चूड़ियाँ

ब्याह के बाद सजने लगती है
सुहाग के नाम की चूड़ियाँ
चुड़ियों से बँध जाते है 
साँसों के आजन्म बंधन
चूड़ियों की मर्यादा करवाती
एक दायित्व का एहसास 
घरभर में खनकती है चूड़ियाँ
सबकी जरूरतों को पूरा करती
एक स्वप्निल संसार सजाती
रंग बिरंगी काँच  की चूड़ियाँ

चूड़ियों की परिधि में घूमती सी
अन्तहीन ख्वाहिशें और सपनें
टूटते,फीके पड़ते,नये गढ़ते
चूड़ियों की तरह ही रिश्ते भी
हँसकर रोकर सुख दुख झेलते
पर फिर भी जीते है सभी
एक नये स्वप्न की उम्मीद लिए
कलाईयों में सजती हुई 
नयी काँच चूड़ियों की तरह
जीवन भी लुभाता है पल पल
जैसे खनकती काँच की चूड़ियाँ.....
-अनुराधा सिंह

Friday, March 16, 2018

वो देवी थी या पिशाचिनी थी...पूजा

एक बेचारी
एक बड़ी 
लिए छड़ी
वह थी खड़ी –
मैंने पूछा, कौन हो तुम?
कुछ ना बोली
हो गई गुम

मैं हैरान थी --
वो देवी थी
या पिशाचिनी थी
सोचकर धड़का मन
तभी आहट आई
छन --

उफ ! रूह कांप गई
गला सूख गया
देख के उसको दिल डूब गया

गर्द भरे रूखे केश लहराते थे
पीत मुख पर 
उदासी के साये गहराते थे
शरीर जर्जर, आंखें वीरान थीं
पपड़ाये होठों पर दर्द भरी
अधूरी सी मुस्कान थी

एक बड़ी लिए छड़ी
सच, वही तो थी खड़ी !
पूछा कौन हो तुम ?
बोली-- जानना है तो सुन

मैं दुखियारी हूँ,गमों की मारी हूँ
कुछ पूजते हैं,बाकी लूटते हैं
खरीदते हैं, बेचते हैं
निर्दोष हूँ पर मारते कूटते हैं
दिखाकर लाठी कहा -- 
यह मेरी वोट रूपी शक्ति है
आह! इसी से मुझे सरेआम पीटते हैं
प्रजातंत्र की मुझे मिली है सजा
मैं प्रजा हूँ --- एक बेचारी प्रजा 

© पूजा
27/6/85

Wednesday, March 14, 2018

ज़िन्दगी एक सफ़र है...........रामबन्धु वत्स


ज़िन्दगी एक सफ़र है,
कोई होड़ नहीं,
कुछ देर इस मोड़ पर ठहरते है...
पल-दो-पल जीने के लिए ।

मानते हो मंजिल जिसे,
वहाँ भी अधूरे ख्वाब है,
हर हथेली में यहाँ,
सिकुड़ा आँसमान है।

कब तलक दौड़ते रहोगे,
सड़क के सफ़र में,
वक़्त जीने में ही,
आदमी की शान है।

ज़िन्दगी एक सफ़र है,
कोई होड़ नहीं,
कुछ देर इस मोड़ पर ठहरते है..
पल-दो-पल जीने के लिए ।

©रामबन्धु वत्स

Saturday, March 10, 2018

हाइकु.....अज्ञात

अंधेरा/अंधकार/तम/तिमिर
सुहागहीन 
अमावस की रात 
तिमिर घोर।

हवा डराया
डटा रहा दीपक
तम की ओर।

दीपक पांव
तम काटी चिकोटी
नेकी का जोर।

तम की छाती
चढ़ गया दीपक 
रोशनी शोर।

छंटा अंधेरा
पूरब में सूरज
हो गई भोर।
-अज्ञात

Friday, March 9, 2018

हायकु .....अज्ञात रचनाकार

सागर/जलधि/समुद्र
प्रेम सागर
कूद गई लड़की
खेल इश्क का।

लड़की गुम
डूब गया आशिक 
सागर शांत।

खारा सागर 
डूबा महासागर 
प्रेम तलाश।

मौन प्रेम में 
भीगा नीरनिधि 
अमृत आस।

नीर नयन 
समाधि में जलधि
प्रेम भंवर।
-अज्ञात रचनाकार

Monday, February 12, 2018

स्याही से नहीं रुहानी लिखना.....कुसुम कोठारी

कोरे पन्ने पे कोरी कहानी लिखना
स्याही से नहीं रुहानी लिखना 

उछल के समंदर से जो आया वो पानी लिखना
उस रुके पानी में फिर रवानी लिखना

किताबों मे जो गुलाब थे वो निशानी लिखना
उन सुखे फूलों की खुशबू  सुहानी लिखना

क्षितिज पर मिलते धरती आसमान लिखना
मन आकाश को छूती गजल सुहानी लिखना ।

-कुसुम कोठारी 

Thursday, January 18, 2018

सवाल बेशुमार लिये बैठें हैं.....कुसुम कोठारी

जो फूलों सी जिंदगी जीते कांटे हजार लिये बैठे हैं
दिल मे फरेब और होटो पे झूठी मुस्कान लिये बैठे हैं। 

खुला आसमां ऊपर,ख्वाबों के महल लिये बैठें हैं
कुछ, टूटते अरमानो का ताजमहल लिये बैठें हैं। 

सफेद दामन वाले भी दिल दागदार लिये बैठे हैं
क्या लें दर्द किसी का कोई अपने हजार लिये बैठें हैं। 

हंसते हुए चहरे वाले दिल लहुलुहान लिये बैठे हैं
एक भी जवाब नही, सवाल बेशुमार लिये बैठें हैं। 

टूटी कश्ती वाले हौसलों की पतवार लिये बैठे हैं
डूबने से डरने वाले साहिल पर नाव लिये बैठे हैं।
-कुसुम कोठारी


Wednesday, January 10, 2018

जीवन और तुषार बूंद!! ....कुसुम कोठारी


निलंबन हुवा नीलाम्बर से 
भान हुवा अच्युताका कुछ क्षण
गिरी वृक्ष चोटी, इतराई 
फूलों पत्तों दूब पर देख 
अपनी शोभा मुस्काई, 
गर्व से अपना रूप मनोहर 
आत्म प्रशंसा भर लाया 
सूर्य की किरण पडी सुनहरी 
अहा शोभा द्विगुणीत हुई !
भाव अभिमान के थे अब उर्धमुखी 
हाँ, भूल गई "मैं "
अब निश्चय है अंतःपास मे 
मै तुषार बूंद नश्वर, भूली अपना रूप 
कभी आलंबन अंबर का 
कभी तृण सहारे सा अस्तित्व 
पर आश्रित नाशवान शरीर 
"मैं"आत्मा अविनाशी 
भूल गई क्यों शुद्ध स्वरूप। 
-कुसुम कोठारी


Wednesday, December 27, 2017

पीला पत्ता.....कुसुम कोठारी

शाख से झर रहा हूं 
मै पीला पत्ता 
तेरे मन से उतर गया हूं 
मैं पीला पत्ता
ना तुम्हें ना बहारों को 
कुछ भी अंतर पड़ेगा 
सूख कर मुरझाया सा 
मै पीला पत्ता 
छोड़ ही दोगे ना तुम मुझे 
आज कल मे
लो मै ही छोड तुम्हें चला
मै पीला पत्ता
संग हवाओं के बह चला 
मै पीला पत्ता 
अब रखा ही क्या है मेरे लिये 
न आगे की नियति का पता
ना किसी गंतव्य का
मै पीला पत्ता।। 

कुसुम कोठारी 

Wednesday, December 20, 2017

विराने समेटे.......कुसुम कोठारी

विराने समेटे कितने पद चिन्ह
अपने हृदय पर अंकित घाव
जाता हर पथिक छोड छाप
अगनित कहानियां दामन मे
जाने अन्जाने राही छोड जाते
एक अकथित सा अहसास
हर मौसम गवाह बनता जाता
बस कोई फरियादी ही नही आता
खुद भी साथ चलना चाहते हैं
पर बेबस वहीं पसरे रह जाते हैं
कितनो को मंजिल तक पहुंचाते
खुद कभी भी मंजिल नही पाते
कभी किनारों पर हरित लताऐं झूमती
कभी शाख से बिछडे पत्तों से भरती
कभी बहार , कभी बेरंग मौसम
फिर भी पथिक निरन्तर चलते
नजाने कब अंत होगा इस यात्रा का
यात्री बदलते  रहते निरन्तर
राह रहती चुप शांत बोझिल सी।
विराने समेटे..
- कुसुम कोठारी 

Monday, December 11, 2017

सर्द हवा की थाप....कुसुम कोठरी


सर्द हवा की थाप ,
बंद होते दरवाजे खिडकियां
नर्म गद्दौ में रजाई से लिपटा तन 
और बार बार होठों से फिसलते शब्द 
आज कितनी ठंड है 
कभी ख्याल आया उनका 
जिन के पास रजाई तो दूर
हड्डियों पर मांस भी नही ,
सर पर छत नही 
औऱ आशा कितनी बड़ी
कल धूप निकलेगी और 
ठंड कम हो जायेगी 
अपनी भूख, बेबसी, 
औऱ कल तक अस्तित्व 
बचा लेने की लड़ाई 
कुछ रद्दी चुन के अलाव बनायें
दो कार्य एक साथ 
आज थोड़ा आटा हो तो 
रोटी और ठंड दोनों सेक लें ।
-कुसुम कोठरी...

Friday, December 8, 2017

ये जर जर हवेली.....कुसुम कोठारी


जर जर हवेलियां भी
संभाले खडी है
प्यार की सौगातें
कभी झांका था
एक नन्हा अंकुर
दिल की खिडकी खोल
संजोये रखूंगी प्यार से
जब तक खुद न डह जाऊंगी 
ये जर जर हवेली
ना भूलेगी कभी
वो कोमल छुवन
वो नरम पवन
जो छू के उसे
छूती थी उसे
एक नन्हे के
कोमल हाथों जैसा
अहसास ना भूलेगी
ये जर जर हवेली ।
-कुसुम कोठारी 

Sunday, December 3, 2017

शबनम की माला....कुसुम कोठारी

Photo
सुबह धुंध से
धोई सी 
शबनम की माला
पोई सी 
गजल अभी तक
सोई सी 
आंख है क्यों कुछ
रोई सी 
यादें यादों मे
खोई सी 
गूंजी कानो मे
सरगोई सी
मन वीणा से
झंकृत हो
शब्दों की लड़ियां
संजोई सी ।

- कुसुम कोठारी