तेरे न हो सके तो किसी के न हो सके
ये कारोबारे-शौक़ मुक़र्रर न हो सका
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यूँ तो मरने के लिए ज़हर सभी पीते हैं
ज़िन्दगी तेरे लिए ज़हर पिया है मैंने
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क्या जाने दिल में कब से है अपने बसा हुआ
ऐसा नगर कि जिसमें कोई रास्ता न जाए
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हमने खुद अपने आप ज़माने की सैर की
हमने क़ुबूल की न किसी रहनुमा की शर्त
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कहेगा दिल तो मैं पत्थर के पाँव चूमूंगा
ज़माना लाख करे आके संगसार मुझे
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ज़ंज़ीर आंसुओं की कहाँ टूट कर गिरी
वो इन्तहाए-ग़म का सुकूँ कौन ले गया
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उम्र भर मसरूफ हैं मरने की तैय्यारी में लोग
एक दिन के जश्न का होता है कितना एहतमाम
-जनाब खलीलुर्रहमान आज़मी
