
"दहलीज़"
संस्कारों की भाषा
सभ्यता की दहलीज़ लांघने से पहले
हर शब्द के आगे
एक लक्ष्मण रेखा खींच देती है
...
संवाद मन का मन से
कभी मौन रहकर,
कभी आंखों की भाषा पढ़ती आँखे
बिना कुछ कहे
कितनी ही बातों को पहुँचाते
ये मन के तार इक दूजे तक
दूरियाँ ऐसे क्षणों में बेमानी हो जाती
...
स्मृतियों के आँगन में
जब भी ख्यालों की छुपन-छुपाई होती
कोई अपना पकड़ा जाता
लेते हुये हिचकी :)
बेसबब सबका ध्यान अपनी ओर खींचता
वहाँ भी शब्दों का कोई काम नहीं होता
बस क्षण भर का अल्पविराम होता,
सारी स्मृतियाँ तितर-बितर हो
अपनी मैं का दायरा बनाती
साथ हँसती मुस्कराती
कभी गुनगुनाते हुए कोई गीत
एक दूजे का लिये हाथ में हाथ
चलती जाती साथ - साथ
सभ्यता की दहलीज़ लांघने से पहले !!!!
-सीमा "सदा" सिंघल