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Saturday, August 15, 2020

यह मौन मेरा तुम पढ़ लेना ...पावनी दीक्षित 'जानिब'

यह मौन मेरा तुम पढ़ लेना
एहसास हृदय में धर लेना।

मन वीणा का तार हो तुम
हृदय रक्त संचार हो तुम
मेरी धड़कन के तारों में
सांसों की सरगम भर देना ।
यह मौन मेरा तुम पढ़ लेना
एहसास हृदय में धर लेना।

तुम प्रेम विरह का संगम हो
तुम अनदेखा इक बंधन हो
तुम आना सूर्य की आभा ले
मेरे मन का अंधेरा हर लेना।
यह मौन मेरा तुम पढ़ लेना
एहसास हृदय में धर लेना।

चंदन हो अग्नि अंगार हो तुम
जैसे फूलों का हार हो तुम
मुझे तपा कर सोना कर
अपनी माला में गढ़ लेना
यह मौन मेरा तुम पढ़ लेना
एहसास हृदय में धर लेना।

-पावनी दीक्षित 'जानिब' 
सीतापुर

Sunday, November 26, 2017

दिल की गलियों से न गुज़र....पावनी दीक्षित 'जानिब'

बड़ी हसरत थी तमन्ना थी प्यार हो जाए 
किसी दीवाने की चौखट पे दिल ये खो जाए ।

ले चलीं हमको बहाकर अश्कों में यादें तेरी 
दिल का तूफ़ान मुझे क्या जाने कहां ले जाए।

हो गया इश्क़ तो दिवानगी का आलम है ये 
हमारे घर का पता कोई तो हमको दे जाए।

दिल की गलियों से न गुज़र ये जान लेवा हैं 
जिसको मरने का शौक़ हो तो वहां वो जाए।

इस जमाने में नहीँ मिलते वफ़ादार सनम 
किसी मगरूर से न दिल को प्यार हो जाए।

बड़े समझौते करने होंगे ये 'जानिब' सुनले 
दिल में रहकर कोई न दर्द ए बीज बो जाए ।
पावनी दीक्षित 'जानिब' 
सीतापुर

Thursday, July 13, 2017

आज हक़ीक़त सा ये किस्सा...पावनी दीक्षित 'जानिब'


मैंने उसके लिए अपना सबकुछ नीलाम कर दिया 
उसकी नज़रो में मैने खुदको ही नाकाम कर दिया।

वो मुझे समझे गुनहगार तो अब मर्ज़ी है उसकी
हमको लिखना था नाम, दिल उसके नाम कर दिया ।

तुमको खबर है दिलसे हारे है बस हम तुम्हारे हैं 
फिर क्यों अपनी नज़रों में मुझे बदनाम कर दिया ।

बेहद होकर मजबूर तेरे रास्ते से दूर आ गए निकल कर 
ठोकर लगे या सम्हलूं तूने तो यार अपना काम कर दिया ।

आओ सुनाए एक कहानी एक दीवाना था एक दीवानी
आज हक़ीक़त सा ये किस्सा मैने सरेआम कर दिया ।

जानिब नहीँ कोई शिकवा है बस ये शिकायत है थोड़ी
सुनो अब तुमने आगाज को क्यों अन्जाम कर दिया ।
- पावनी दीक्षित 'जानिब'