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Monday, November 5, 2018

जीने के इरादे करे...

हम क्यों रचें
अपने प्यार के इर्दगिर्द
एक स्वप्न-संसार?
क्यों हम नामुमकिन वादें करें?

क्यों ताजमहल को ही सबूत मानें
बेपनाह मोहब्बतों का?
करें क्यों हम भी वही
जो शाहजहां या शहज़ादे करें?

प्यार अनुभूति है नाजुक-सी
कोई बोझ तो नहीं
जो हम हर कहीं
हर घड़ी लादें फिरें।

आसमानों के सपनें तो फरेबी हैं
आओ कि...
हम इसी ज़मीं पर
जीने के इरादे करें।

मन की उपज