Showing posts with label रसरंग से. Show all posts
Showing posts with label रसरंग से. Show all posts

Tuesday, August 6, 2019

अबूझ पहेली-सी ज़िंदगी .....अनीता वाधवानी

अबूझ पहेली-सी ज़िंदगी..
रोज ही चल पड़ती है
थामकर मेरा हाथ,
बड़ी चालाकी से ये ज़िंदगी
दिखाती है सुनहरे ख़्वाब.

थमे न थे पैर कभी
रुके न मन की आस
लालसाओं के भंवरजाल में
कराती नहीं आभास.

यूं ही छोड़ देगी किसी दिन
अनजाने एक मोड़ पर
करके कुछ बेचैन मुझे
छोड़कर कुछ सवाल.

सौंप देगी नया एक पिंजर
चल देगी फिर अपनी राह
सदियों की इस लंबी यात्रा पर
कहां थमेगी किस जगह पर.
- अनीता वाधवानी

Monday, March 7, 2016

नसीब में है क्या लिखा हुआ...........अब्दुल हमीद 'अदम'


आता है कौन दर्द के मारों के शहर में
रहते हैं लोग चांद सितारों के शहर में

मिलता तो है ख़ुशी की हकीकत का कुछ सुराग
लेकिन नज़र फ़रेब इशारों के शहर में

उन अंखड़ियों को देख होता है ये गुमां
हम आ बसे हैं बादा-ग़ुसारों के शहर में

ऐ दिल तेरे ख़ुलूस के सदके ज़रा सा होश
दुश्मन भी बेशुमार हैं यारों के शहर में

देखें 'अदम' नसीब में है क्या लिखा हुआ
दिल बेंचने चले हैं निगारों के शहर में
अप्रेल-1910 - मार्च- 1981
अब्दुल हमीद 'अदम'



अर्थ :  बादा-ग़ुसारों = शराबियों, ख़ुलूस = साफ दिल



Monday, January 25, 2016

मिले ग़म से अपने फ़ुर्सत तो सुनाऊं वो फ़साना....मुईन अहसन जज़्बी

मिले ग़म से अपने फ़ुर्सत तो सुनाऊँ वो फ़साना|
कि टपक पड़े नज़र से मय-ए-इश्रत-ए-शबाना।


यही ज़िन्दगी मुसीबत यही ज़िन्दगी मुसर्रत
यही ज़िन्दगी हक़ीक़त यही ज़िन्दगी फ़साना।


कभी दर्द की तमन्ना कभी कोशिश-ए-मदावा
कभी बिजलियों की ख़्वाहिश कभी फ़िक़्र-ए-आशियाना। 


मेरे कहकहों के ज़द पर कभी गर्दिशें जहाँ की, 
मेरे आँसूओं की रौ में कभी तल्ख़ी-ए-ज़माना


कभी मैं हूँ तुझसे नाला कभी मुझसे तू परेशाँ,
मेरी रिफ़अतों ले लर्जा कभी मेहर -ओ-माह-ओ-अंजुम।

मिरी पस्तियों से खाइफ़ कभी औज़-ए-ख़ुसरवाना 
कभी मैं तेरा हदफ़ हूँ कभी तू मेरा निशाना।

जिसे पा सका न ज़ाहिद जिसे छू सका न सूफ़ी, 
वही तीर छेड़ता है मेरा सोज़-ए-शायराना। 

-मुईन अहसन जज़्बी
जन्म : अगस्त 1912, आजमगढ़ (उ.प्र.) 
निधन : फरवरी 2005 अलीगढ़ (उ. प्र.) 
शब्दार्थ :
जश्न की रात की शराब, खुशी, इलाज की कोशिश, 
जमाने की कड़ुआहट, उँचाई, सिहरन, तारा, गहराई, डर, 
शाही ताकत का कद, उद्देश्य, श़ायर का जुनून

Thursday, March 5, 2015

टेसू खिले......संजय वर्मा 'दृष्टि'



 












खिले  टेसू
ऐसे लगते  मानो
खेल रहे हों पहाड़ों से होली

सुबह का सूरज
गोरी के गाल
जैसे बता रहे हों
खेली हमने भी होली
संग टेसू के

प्रकृति के रंगों की छटा
जो मौसम से अपने आप
आ जाती है धरती पर
फीके हो जाते हैं हमारे
निर्मित कृत्रिम रंग
डर लगने लगता है

कोई काट न ले वृक्षों को
ढंक न ले प्रदूषण सूरज को
उपाय ऐसा सोचें
प्रकृति के संग हम
खेल सकें होली

-संजय वर्मा 'दृष्टि' 

लेखक व कवि
रसरंग से......

Tuesday, March 3, 2015

रंगों के आलेख.....मनोज खरे




उमर हिरनिया हो गई, देह-इन्द्र-दरबार
मौसम संग मोहित हुए, दर्पण-फूल-बहार

दर्पण बोला लाड़ से, सुन गोरी, दिलचोर
अंगिया न सह पाएगी, अब यौवन का जोर

यूं न लो अंगड़ाइयां, संयम हैं कमजोर
देर टूटते ना लगे, लोक-लाज की डोर

शाम सिंदूरी होंठ पर, आँखें उजली भोर
बैरन नदिया सा चढ़े, यौवन ये बरजोर

तितली झुक कर फूल पर, कहती है आदाब
सीने में दिल की जगह, रक्खा लाल गुलाब 

जब से होठों ने छुए, तेरे होंठ पलाश
उस दिन से ही हो गई, अम्बर जैसी प्यास

रहे बदलते करवटें, हम तो पूरी रात
अब के हम मिलेंगे, करनी क्या-क्या बात

प्राण-गली से गुजर रही, हंसी तेरी मनमीत
काला जादू रूप का, कौन सकेगा जीत

गढ़े कसीदे नेह के, रंगों के आलेख
पास पिया को पाओगे, आँखें बंद कर देख

~मनोज खरे
संयुक्त संचालक, जनसंपर्क विभाग, मध्य प्रदेश शासन. 








Sunday, March 1, 2015

~होरी में.....प्रवीण करण







 













चांद-के गाल पे रंग लगा दओ होरी में
चांद-ए बाने अपओं बना लओ होरी में

चांद के आंगे पीछो फिरतो
आंगे फिरतो पीछे फिरतो
वई चांद-ए-संग बिठा लओ होरी में


चांद के पीछे पागल जैसो
पागल जैसो घायल जैसो
वई चांद-ए-संग नचा लओ होरी में

चांद मिले तो छूके देखों
छूके देखों छककर देखों
वई चांद-ए-अंग लगा लओ होरी में

जा होरी से चांद है मेरो
चांद है मेरो चांद है मेरो
सबे दिखा दओ सबे जता दओ होरी में
चांद-ए दिल का घाव दिखा दओ होरी में
चांद-ए दिल को दर्द सुना दओ होरी में

~प्रवीण करण
लेखक व कवि

Sunday, February 15, 2015

यूँ ही बेसबब न फिरा करो..................पद्मश्री डॉ.बशीर बद्र





पद्मश्री डॉ.बशीर बद्र 
आज पद्मश्री डॉ.बशीर बद्र जी का जन्मदिन है
मैं असीम शुभकामनाएं प्रेषित करती हूँ
 
यूँ ही बेसबब न फिरा करो, कोई शाम घर में भी रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके चुपके पढ़ा करो

कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से
ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो

अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आयेगा कोई जायेगा
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो

मुझे इश्तहार सी लगती हैं, ये मोहब्बतों की कहानियाँ
जो कहा नहीं वो सुना करो, जो सुना नहीं वो कहा करो

कभी हुस्न-ए-पर्दानशीं भी हो ज़रा आशिक़ाना लिबास में
जो मैं बन-सँवर के कहीं चलूँ, मेरे साथ तुम भी चला करो

ये ख़िज़ा की ज़र्द-सी शाम में, जो उदास पेड़ के पास है
ये तुम्हारे घर की बहार है, इसे आंसुओं से हरा करो

नहीं बेहिजाब वो चाँद सा कि नज़र का कोई असर नहीं
उसे इतनी गर्मी-ए-शौक़ से बड़ी देर तक न तका करो


पद्मश्री डॉ.बशीर बद्र,
ख़िज़ाः पतझड़  ज़र्द-सीः पीला सा
सैयद मोहम्मद बशीर
जन्मः 15 फरवरी 1936, कानपुर , उत्तर प्रदेश

Monday, December 22, 2014

‘‘न दैन्यं न पलायनम्।’’ ......................अटल बिहारी वाजपेयी













कर्तव्य के पुनीत पथ को
हमने स्वेद से सींचा है,
कभी-कभी अपने अश्रु और—
प्राणों का अर्ध्य भी दिया है।

किंतु, अपनी ध्येय-यात्रा में—
हम कभी रुके नहीं हैं।
किसी चुनौती के सम्मुख
कभी झुके नहीं हैं।

आज,
जब कि राष्ट्र-जीवन की
समस्त निधियाँ,
दाँव पर लगी हैं,
और,
एक घनीभूत अंधेरा—
हमारे जीवन के
सारे आलोक को
निगल लेना चाहता है;

हमें ध्येय के लिए
जीने, जूझने और
आवश्यकता पड़ने पर—
मरने के संकल्प को दोहराना है।

आग्नेय परीक्षा की
इस घड़ी में—
आइए, अर्जुन की तरह
उद्घोष करें :
‘‘न दैन्यं न पलायनम्।’’ 


-अटल बिहारी वाजपेयी


 प्राप्ति स्रोतः रसरंग

माननीय अटल बिहारी वाजपेयी
(पूर्व प्रधान मंत्री, कवि) 

जन्मः 25 दिसम्बर 1926
ग्वालियर, मध्य प्रदेश
प्रमुख कृतियाँ
मेरी इंक्यावन कविताएँ, न दैन्यं न पलायनम्, 
मृत्यु और हत्या, अमर बलिदान.
भाषाः हिन्दी 


Tuesday, October 14, 2014

दुआओं में असर भी न मिला..........आले अहमद सरूर



वो जिएँ क्या जिन्हें जीने का हुनर भी न मिला
दश्त में ख़ाक उड़ाते रहे घर भी न मिला

ख़स ओ ख़ाशाक से निस्बत थी तो होना था यही
ढूँढने निकले थे शोले को शरर भी न मिला

न पुरानों से निभी और न नए साथ चले
दिल उधर भी न मिला और इधर भी न मिला

धूप सी धूप में इक उम्र कटी है अपनी
दश्त ऐसा के जहाँ कोई शजर भी न मिला

कोई दोनों में कहीं रब्त निहाँ है शायद
बुत-कदा छूटा तो अल्लाह का घर भी न मिला

हाथ उट्ठे थे क़दम फिर भी बढ़ाया न गया
क्या तअज्जुब जो दुआओं में असर भी न मिला

बज़्म की बज़्म हुई रात के जादू का शिकार
कोई दिल-दादा-ए-अफ़सून-ए-सहर भी न मिला.



 दश्त : मरुस्थल, ख़ाशाक : सूखी घांस  , निस्बत : नाता  ,शरर चमक,  शजर: पेड़, रब्त: रिश्ता,  निहाँ: छिपा,  तअज्जुब: आश्चर्य, बज़्म: सभा ,


 आले अहमद सरूर
जन्म : 09 सितम्बर 1911,बदायूं उ.प्र.
मृत्यु : 08 फरवरी 2002, दिल्ली




 

Sunday, October 5, 2014

अब क़ातिल ख़ुद ही मसीहा है.........मलिकज़ादा 'मंजूर'



मामूल पर साहिल रहता है फ़ितरत पे समंदर होता है
तूफ़ाँ जो डुबो दे कश्‍ती को कश्‍ती ही के अंदर होता है

जो फ़स्ल-ए-ख़िजाँ में काँटों पर रक़्साँ व ग़ज़ल-ख़्वाँ गुज़रे थे
वो मौसम-ए-गुल में भूल गए फूलों में भी ख़ंजर होता है

हर शाम चराग़ाँ होता है अश्‍कों से हमारी पलकों पर
हर सुब्ह हमारी बस्ती में जलता हुआ मंज़र होता है

अब देख के अपनी सूरत को इक चोट सी दिल पर लगती है
गुज़रे हुए लम्हे कहते हैं आईना भी पत्थर होता है

इस शहर-ए-सितम में पहले तो ‘मंजूर’ बहुत से क़ातिल थे
अब क़ातिल ख़ुद ही मसीहा है ये ज़िक्र बराबर होता है

-मलिकज़ादा 'मंजूर'

डॉ. मालिकजादा मंजूर अहमद

जन्मः 17 अक्टूबर 1929 भिदनूपुर

....रसरंग से