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Monday, September 7, 2020

पारिजात... रंजना जैन

गिरे धरा पर पुष्प देखकर

मन आया पूछूँ फूलों से

बंद कली से तुम खिलने में

रूप रंग से सजने में

फिर सुगंध  रस भरने में 

जितना समय लगाते हो

उतना हक़ नहीं जीने का

अल्प अवधि रह पाते हो! 

 

फूलों ने की अलग कहानी 

अर्थ नहीं जीवन मनमानी

लाना यदि परिणाम निराला

बनना पड़ता है मतवाला

पीकर सोम मधुर रस अंतर

बन आकार पूर्ण अति सुंदर

सुखानंद की मंशा लेकर

गिर पड़ते झट डाली से

नये पुष्प भर जाने को! 

  

सार यही मानव जीवन का

मोल नहीं लम्बे छोटे का

तत्व यही ज़िंदा होने का

फैला दे जो लघु जीवन में

शिव सुन्दर का शुभ संदेश

महका दे सारे उपवन को

पथ में बिखरें फूल अनेक॥ 

-रंजना जैन

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Saturday, June 6, 2020

मेरे लिए ईमां आसां ....महेशचन्द्र द्विवेदी

शबनमी बूँद का कमल के पत्ते पर ठहरना मुश्किल
हवा में एक सिहरन हुई और बूँद का गिरना आसां  

ताल की जलकुम्भी से मवेशी का निकलना मुश्किल
हरी घास की कशिश में,  होता उसका फँसना आसां

साँसें उनकी बख़्शीश उन्हें बताना जितना मुश्किल
उन्हें मुँह चुराते हुए उस पर हँसना उतना आसां

जुदाई का इक लम्हां बिताना मुझको जितना मुश्किल
सब्र का हर इम्तिहां लेना  उनके लिए उतना आसां

जो उनके लिए कुफ़्र आसां, तो मेरे लिए ईमां आसां
तर्केइबादत मुझे मुश्किल, तर्केमुहब्बत है उनको आसां 

-महेशचन्द्र द्विवेदी
मूल रचना