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Friday, January 11, 2019

बेहिसी के ज़ख्म......डॉ. अंजुम बाराबंकवी

प्यार के हर रंग को दस्तूर होना चाहिए,
ये गुज़ारिश है इसे मंजूर होना चाहिए।

फूल से चेहरे पर इतनी बरहमी अच्छी नहीं,
जानेमन गुस्से को अब काफूर होना चाहिए।

आजकल संजीदगी से अहले-दिल कहने लगे,
बेहिसी के ज़ख्म को नासूर होना चाहिए।

काटते रहते हैं जो बेरूह लफ्ज़ों का पहाड़,
उनको श़ायर तो नहीं मज़दूर होना चाहिए।

शोहरतों के फूल क़दमों में पड़े हैं देखिए,
आप को थोड़-बहुत मग़रूर होना चाहिए।

दिल के क़िस्से में चटकना-टूटना है सब फूजूल,
अब तो इस शीशे को चकनाचूर होना चाहिए।

कैसे-कैसे लोग ना क़दरी से पीले पड़ गए,
जिनको दुनिया में बहुत मशहूर होना चाहिए।
-डॉ. अंजुम बाराबंकवी

Sunday, September 4, 2016

राजेन्द्र नाथ रहबर पड़ी रहेगी अगर ग़म की धूल शाख़ों पर...........राजेन्द्र नाथ 'रहबर'


पड़ी रहेगी अगर ग़म की धूल शाख़ों पर
उदास फूल खिलेंगे मलूल शाखों पर।

अभी न गुलशन-ए-उर्दू को बे-चराग कहो
खिले हुए हैं अभी चंद फूल शाख़ों पर

निकल पड़े हैं ह़िफ़ाज़त को चंद कांटे भी
हुआ है जब भी गुलों का नुज़ूल शाख़ों पर

हवा के सामने उलकी बिसात ही क्या थी
दिखा रहे थे बहारें जो फूल शाख़ों पर ।

निगार-ए-गुल हो मिला है ये इज़्न बुलबुल को
हुआ है हुक्म गुल-ए-तर को झूल शाख़ों पर ।

वो फूल पहुंच न जाने कहां-कहां 'रहबर'
नहीं था जिनको ठरहना कुबूल शाख़ों पर ।

-राजेन्द्र नाथ  'रहबर'

..रसरंग से

Thursday, August 4, 2016

लोग समझे कि मर गए हैं हम.....नरेश कुमार "शाद"


डूब कर पार उतर गए हैं हम
लोग समझे कि मर गए हैं हम

ए ग़म-ए-दहर तेरा क्या होगा
ये अगर सच है कि मर गए हैं हम

ख़ैर-मकदम किया हवादिस ने
ज़िदगी में जिधर गए हैं हम

या बिगड़ कर उजड़ गए हैं लोग
या बिगड़ कर संवर गए हैं हम

मौत को मुँह दिखाएँ क्या या रब
ज़िंदगी  ही  में  मर गए  हैं  हम

हाए क्या शय है नश्शा-ए-मय भी
फ़र्श  से  अर्श पर  गए  हैं  हम

आरजूओं की आग में जल कर
और भी कुछ निखर गए हैं हम

जब भी हम को किया गया महबूस
मिस्ल-ए-निकहत बिखर गए हैं हम

शादमानी  के  रंग-महलों  में
"शाद" बा-चश्म-ए-तर गए हैं हम

-नरेश कुमार "शाद" 

Tuesday, February 16, 2016

नयी-नयी पोशाक बदलकर, मौसम आते-जाते हैं,

नयी-नयी पोशाक बदलकर, मौसम आते-जाते हैं,
फूल कहॉ जाते हैं जब भी जाते हैं लौट आते हैं।

शायद कुछ दिन और लगेंगे, ज़ख़्मे-दिल के भरने में,
जो अक्सर याद आते थे वो कभी-कभी याद आते हैं।

चलती-फिरती धूप-छॉव से, चहरा बाद में बनता है,
पहले-पहले सभी ख़यालों से तस्वीर बनाते हैं।

आंखों देखी कहने वाले, पहले भी कम-कम ही थे,
अब तो सब ही सुनी-सुनाई बातों को दोहराते हैं ।

निदा फाजली
1938-2016

इस धरती पर आकर सबका, अपना कुछ खो जाता है,
कुछ रोते हैं, कुछ इस ग़म से अपनी ग़ज़ल सजाते हैं।

Tuesday, June 30, 2015

यात्रा का चक्र..............नीलेश रघुवंशी
















बंजर जिंदगी को पीछे छोड़ देना
बारिश को छूना चाँद बादलों से यारी
नंगे पाँव घास पर चलकर ओस से भींग जाना
खाना-बदोश और बंजारों के छोड़े गए घरों को देखना
खुद को तलाशना उन जैसा हो जाना
न होने पर ईर्ष्या का उपजना...
प्राचीन इमारतों के पीछे भागना
स्थापत्य मूर्तियों को निहारना
एक पल में कई बरस का जीवन जी लेना
ट्रेन का छूट जाना जेब का कट जाना
किसी के छूटे सामान को देखकर
बम आर.डी.एक्स. की आशंका से सिहर जाना
घर पहुँचना और पहुँचकर घर को गले लगा लेना
यात्रा का पहला नाम डर दूसरा फकीरी!
बहुत दिनों से जाना चाहती हूँ यात्रा पर
लेकिन जा नहीं पा रही हूँ
एक हरे भरे मैदान में
तेज बहुत तेज गोल चक्कर काट रही हूँ
यात्रा के चक्र को पूरा करते
खुद को अधूरा छोड़ रही हूँ...

- नीलेश रघुवंशी

भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, आर्य स्मृति साहित्य सम्मान, 
दुष्यंत कुमार स्मृति सम्मान, केदार सम्मान, शीला स्मृति पुरस्कार, 
युवा लेखन पुरस्कार (भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता), 
डी. डी. अवार्ड 2003, डी. डी. अवार्ड 2004
:: श्री रघुवंशी जी की अन्य रचनाएं व विस्तृत परिचय हेतु ::



Monday, June 29, 2015

सिंदूर.....अनुलता राज नायर













किसी ढलती सांझ को
सूरज की एक किरण खींच कर
मांग में रख देने भर से
पुरुष पा जाता है स्त्री पर सम्पूर्ण
अधिकार।
पसीने के साथ बह आता है सिंदूरी रंग
स्त्री की आँखों तक
और तुम्हें लगता है वो दृष्टिहीन हो गई।
मांग का टीका गर्व से धीरण कर
वो ढंक लेती है अपने माथे की लकीरें
हरी लाल चूड़ियों से कलाई को भरने
वाली स्त्रियां
इन्हें ङथकड़ी नहीं समझतीं,
बल्कि इनकी खनक के आगे
अनसुना कर देती हैं अपने भीतर की 
हर आवाज....
वे उतार नहीं फेंकती
तलुओं पर चुभते बिछुए,
भागते पैरों पर
पहन लेती है घुंघरू वाली मोटी पायलें
वो नहीं देता किसी को अधिकार
इन्हें बेड़ियां कहने का।

यूं ही करती हैं ये स्त्रियां
अपने समर्पण का, अपने प्रेम का
अपने जूनून का उन्मुक्त प्रदर्शन।

प्रेम की कोई तय परिभाषा नहीं होती

-अनुलता राज नायर
....रसरंग.. 8 मार्च