श्वेता सिन्हा के ब्लॉग में एक प्रतिक्रिया पढ़ी
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हे कवि !
निकलो अपने ही शहर में,
कम से कम अपने मुहल्लों में
भर दो पेट एक भी मजबूर परिवार का
जो तुम्हारी हजार सकारात्मक
या नकारात्मक लेखनी से
लाख गुणा बेहतर है ..
तो उठो ना कवि !
पटको अपनी लेखनी
उठा लो बस चन्द रोटियों की पोटली
निकल पड़ो और कहीं दूर नहीं तो
अपने ही आस-पड़ोस में, मोहल्ले में ...
कब तक भला लेखनी के भुलावे
परोसते रहोगे निरीह,बेबस,दुखियों,निर्धनों के लिए ...
जरुरत नहीं उन्हें तुम्हारी कोरी शब्दों वाली सहानुभूति की
बस .. एक बार समानुभूति में तो भींजो
बस एक बार .. आज , अभी ही भींजो
आज, अभी ही भींजोगे ना कवि ?
बोलो ना कवि ...
-सुबोध सिन्हा
