जरा सी देर सही घर अगर गये होते
तेरे ही सीने से लग के निखर गये होते।
नहीं भूली हूँ जुदाई की शाम अब तक भी
जो भूले से भूल जाते बिखर गये होते।
अभी नहीं जो होता रूह से रूह का मिलना
तो इस जनम में दुबारा ठहर गये होते।
तेरा कभी तो सहारा होता तन्हाई में
तो हम भी शाम ढले अपने घर गये होते।
यूँ मन मेरा भी तो अटका रहा ख़्वाहिशों में
नहीं तो रूह छूकर "नीतू" ग़ुजरे गये होते।

-नीतू राठौर

