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Wednesday, September 20, 2017

जो भूले से भूल जाते बिखर गये होते....नीतू राठौर

जरा सी देर सही घर अगर गये होते
तेरे ही सीने से लग के निखर गये होते।

नहीं भूली हूँ जुदाई की शाम अब तक भी
जो भूले से भूल जाते बिखर गये होते।

अभी नहीं जो होता रूह से रूह का मिलना
तो इस जनम में दुबारा ठहर गये होते।

तेरा कभी तो सहारा होता तन्हाई में
तो हम भी शाम ढले अपने घर गये होते।

यूँ मन मेरा भी तो अटका रहा ख़्वाहिशों में
नहीं तो रूह छूकर "नीतू" ग़ुजरे गये होते।
-नीतू राठौर

Monday, September 11, 2017

बेदाग दिल ही रखा है....नीतू राठौर

नहीं देखा है कभी चाँद में दीवाने को
कहाँ ढूंढू उस भटकें हुए दीवाने को।

यूँ मैंने तुम्हें ही माँगा है इस ज़माने से
देखा है मैंने तो मजबूर इस ज़माने को।

मग्न होती हूँ नज़्म जब कोई सुनाने में
तराने चुनें है दिलकश जरा सुनाने को।

यूँ दाग दिल पर लगते नहीं लगाने से
बेदाग दिल ही रखा है दिल लगाने को।

हँसी की गूंज ही आए जिस आशियानें से
बताओ कैसे बचाओगे आशियानें को।

कभी मुकर न जाना वादे "नीतू" निभाने से
जहाँ की रस्मे है आना होगा निभाने को।
-नीतू राठौर