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Thursday, September 13, 2018

क्षितिज....गोपाल कृष्ण शुक्ल

दूर, बहुत दूर पर कहीं
हमने अक्सर देखा।

अम्बर के
नीलाभ पटल पर
मटमैली धरती
अपना रंग घोलती।

ये दृष्य देख कर
मेरा मन हुलस उठा
मष्तिष्क में
प्रश्न कौंधा
कैसे पावन-बन्धन में
बाँध रही है
धरती और अम्बर को
यह क्षितिज रेखा।

दूर, बहुत दूर पर कहीं
हमने अक्सर देखा।।

-गोपाल कृष्ण शुक्ल


Wednesday, September 12, 2018

जाने के ख्वाहिश हैं.....एस. नेहा

क्षितिज के उस पार 
जहाँ  मेरी जाने के ख्वाहिश हैं

वहां न ख्वाहिशों की  बेड़ियाँ हैं 
और न ही रिश्तों का दोहरापन 
वहाँ न ही उम्मीदें हैं 
और न ही किसी प्रकार का सूनापन 

वहां बसता है गर कुछ तो 
बस शांति का एहसास ....
मेरे चेहरे पे अब थकान दिखने लगी हैं 
मेरे आवाज में बेबसी सजने लगी है 
की मुझे ये दुनिया पसंद नहीं 
की मै थक गई हूँ।

अब मुझे इस थकान  को मिटाना है 
आवाज से इस बेबसी को मिटाना है 
कि मैं  जिन बन्धनों में बंध  गई हूँ 
तोड़ देना है उन्हें 
कि मुझे अब चीखना है  जोरों से   
कि मेरा खुदा  सुन सके 

और मेरा मसीहा मुझसे  मिल सके 
की अब तो मुझे क्षितिज के पार ही जाना है 
-एस. नेहा
दस साल पुरानी रचना