माँ..
सारे दिन खटपट करतीं
लस्त- पस्त हो
जब झुँझला जातीं
तब...
तुम कहतीं-एक दिन
ऐसे ही मर जाउँगी
कभी कहतीं -
देखना मर कर भी
एक बार तो उठ जाउँगी
कि चलो-
समेटते चलें
हम इस कान सुनते
तुम्हारा झींकना
और उस कान निकाल देते
क्योंकि-
हम अच्छी तरह जानते थे
माँ भी कभी मरती हैं !
कितने सच थे हम
आज..
जब अपनी बेटी के पीछे
किटकिट करती
घर- गृहस्थी झींकती हूँ
तो कहीं-
मन के किसी कोने में छिपी
आँचल में मुँह दबा
तुम धीमे-धीमे
हंसती हो माँ...!!!
-उषा किरण
"ताना- बाना” से

बेटियां होती हैं कितनी प्यारी
कुछ कच्ची
कुछ पक्की
कुछ तीखी
कुछ मीठी
पहली बारिश से उठती
सोंधी सी महक सी
दूर क्षितिज पर उगते
सतरंगी वलय सी
आंखों में झिलमिलाते तारे
पैरों में तरंगित लहरें
उड़ती फिरती हैं तितली सी
बरसती हैं बदली सी
फिर एक दिन-
आँचल में सूरज-चॉंद
ऑंगन की धूप छॉंव लेकर
कोमल सी पलकों से रचातीं
सुर्ख बेल-बूटे
फिर उजले से आंगन में
रोपती हैं जाकर
बड़े चाव से
कुछ अंकुरित बीज
समर्पण के
संस्कार के
ममता के
दुलार के
और बेटियां इस तरह
रचती हैं
क्षितिज के अरुणाभ भाल पर
आगाज
एक नन्हीं सुबह का !!!
लेखक परिचय - उषा किरण