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Sunday, December 31, 2017

मैं पुरूष था....नीरज द्विवेदी

मैं पुरूष था, 
नही समझ पाया 
स्त्री होने का मर्म..
वो स्त्री थी, 
जानती थी..
मेरे पुरूष होने का सच !!

-नीरज द्विवेदी

Wednesday, November 1, 2017

देख रही थी उन आँखों को...........पल्लवी मुखर्जी

इस पूरे प्रकरण में
वे दोनों साक्षी थे
पर हर बार तुम
जलील होती रही
और वो
तमाम बेगुनाही का सबूत देकर
बच निकलता था
हर बार वो तय मुताबिक 
उसके अस्तित्व को तार-तार कर देता था
वो मूक स्तब्ध होकर
देख रही थी उन आँखों को
जिसने उसे एक नज़र दी थी
दुनिया को देखने की
पर ये क्या
उसके हौसले पस्त हो रहे थे
उसी पुरुष के सामने
जिसने  कभी कहा था
तुम मेरी मुमताज़ हो
बनाउंगा एक ताज़महल वैसे ही
जैसे कभी शाहजहां ने बनाया था
खूबसूरत मुमताज के लिये
-पल्लवी मुखर्जी

Friday, October 20, 2017

हमेशा हाथ ही मलता रहा......अनिरुद्ध सिन्हा

धूप को सर पर लिये  चलता रहा
मैं ज़मीं के साथ  ही जलता रहा

नफ़रतों के  जहर पीकर  दोस्तो
प्यार के साँचे में मैं  ढलता रहा

टूटकर इक दिन बिखर जाऊँगा मैं
मेरे अन्दर  खौफ़ ये  पलता रहा

लौट आया आसमां को  छूके  मैं
जलनेवाला उम्र- भर जलता  रहा

लोग अपनी मंज़िलों को  हो लिये
वो  हमेशा  हाथ  ही मलता रहा

-अनिरुद्ध सिन्हा
गुलज़ार पोखर, मुंगेर (बिहार )811201
Email-anirudhsinhamunger@gmail.com
Mobile-09430450098  

Sunday, October 15, 2017

कवि के हाथों में लाठी!...परितोष कुमार ‘पीयूष’


वो बात किया करते हैं
अक्सर ही स्त्री स्वतंत्रता की
बुद्धिजीवियों की जमात में 
उनका दैनिक उठना बैठना 
चाय सिगरेट हुआ करता है

साहित्यिक राजनीतिक मंचों से
स्त्री स्वतंत्रता के पक्ष में
धाराप्रवाह कविता पाठ किया करते हैं
अखबारी स्तंभों में भी 
यदा कदा नजर आ ही जाते हैं
नवलेखन, साहित्य अकादमी, 
साहित्य गौरव, साहित्य शिरोमणि, कविताश्री
और पता नहीं क्या-क्या इकट्ठा कर रखा है
उसने अपने अंतहीन परिचय में

सड़क से गुजरते हुए
एकदिन अचानक देखा मैंने
उनके घर के आगे 
भीड़! शोर शराबा! 
पुलिस! पत्रकार!
कवि के हाथों में लाठी!
मुँह से गिरती धाराप्रवाह गालियाँ!
थोड़े ही फासले पर फटे वस्त्रों में खड़ी
रोती-कपसती एक सुंदर युवती
और ठीक उसकी बगल में 
अपाहिज सा लड़खड़ाता एक युवक

इसी बीच 
भीड़ की कानाफूसी ने मुझे बताया
पिछवाड़े की मंदिर
उनकी बेटी ने दूसरी जाति में
विवाह कर लिया है

मैं अवाक् सोचता रहा
कि आखिर किनके भरोसे 
बचा रहेगा हमारा समाज
क्या सच में कभी
स्त्रियों को मिल पायेगी
उनके हिस्से की स्वतंत्रता
-परितोष कुमार ‘पीयूष’ 

Saturday, August 19, 2017

तमाशा देखेंगे....कवि डी. एम. मिश्र


कोई ‘हिटलर’ अगर हमारे मुल्क में जनमे तो।
सनक में अपनी लोगों का सुख-चैन चुरा ले तो।

अच्छे दिन आयेंगे, मीठे - मीठे जुमलों में,
बिन पानी का बादल कोई हवा में गरजे तो।

मज़लूमों के चिथड़ों पर भी नज़र गड़ाये हो,
ख़ुद परिधान रेशमी पल-पल बदल के निकले तो।

दूर बैठकर फिर भी आप तमाशा देखेंगे,
जनता से चलनी में वो पानी भरवाये तो।

कितने मेहनतकश दर -दर की ठोकर खायेंगे,
ज़ालिम अपने नाम का सिक्का नया चला दे तो।

वो मेरा हबीब है उससे कैसे मिलना हो,
कोई दिलों में यारों के नफ़रत भड़काये तो।

जिसके नाम की माला मेरे गले में रहती है,
वही मसीहा छुरी मेरी गरदन पर रख दे तो।

आँख मूँदकर कर लेंगे उस पर विश्वास मगर,
दग़ाबाज सिरफिरा वो हमको अंधा समझे तो।
-कवि डी. एम. मिश्र

Friday, June 2, 2017

रात के ठीक बारह बजे.....डॉ. भावना



रात के ठीक बारह बजे
जब मुन्नी बिटिया
किसी परी के देश में
विचर रही होगी बेपरवाह
ठीक उसी वक्त
मेरे जेहन में भी
विचरने लगता है
विचारों का झोंका
उतरने को कागज पर

ठीक उसी वक्त
घड़ी टिक -टिक करती हुई
प्रवेश करती है
नए दिन में

ठीक उसी वक्त
बदल जाता है
दीवार पर लटके
कैलेंडर का एक दिन

ठीक बारह बजे ही सुनाई पड़ती है
चौकीदार की कड़क आवाज़
जागते रहो ,जागते रहो
और भौंकने लगते हैं कुत्ते

रात के ठीक बारह बजे ही
याद आती है
नानी -दादी की कहानी
कि ऐसे ही समय निकलता है
बाॅसों की झुरमुटों से भूत

ठीक बारह बजे ही
मिलती है
भूत और वर्तमान की सीमा -रेखा
शायद इसीलिए
ठीक बारह बजे जन्मे थे
किशन कन्हैया

पर,आज
ठीक बारह बजे
लिख रही हूँ एक कविता
मुझे सहमा देती है
वक़्त की सहनशीलता
कि कैसे झेल पाता है यह
एक दिन के गुजरने की पीड़ा
- डॉ. भावना 
मुजफ्फरपुर, बिहार.


Thursday, June 1, 2017

ज़िन्दगी एक पहेली....नीरजा मेहता 'कमलिनी'

ज़िन्दगी 
आदि से अंत तक
शाश्वत किन्तु क्षणिक
विस्तृत किन्तु संक्षिप्त
विचित्र किन्तु सत्य
अलबेली किन्तु नित्य
चिर परिचित किन्तु अकाल्पनिक
रहस्यमयी किन्तु दिलचस्प
विस्मयकारी किन्तु प्रभावकारी
अभिशापित किन्तु अलौकिक वरदान सी
उलझी डोर सी किन्तु
सपनों को साकार करती सी
प्रवाहमयी अद्भुत अभिव्यक्ति सी
भावानुकूल सुसंस्कृत आदर्शमयी
कविता की समीक्षा सी,
चक्रव्यूह समान
मानो हो
एक अनबूझी
अनसुलझी पहेली।










-नीरजा मेहता 'कमलिनी'


Wednesday, May 31, 2017

रेशमाबाई.............डॉ. भावना














रेशमाबाई
सिर्फ एक नाम नहीं
रेडलाइट एरिया की औरत की

यह पहचान है
पुरूष की पाशविक प्रवृति की

औरत की लाचारी
भूख की अकुलाहट
अशिक्षा रूपी अंधकार
बेकार हाथ

जब तक नहीं रौंदते किसी को
तब तक कोई रेशमा
नहीं बनती "रेशमा बाई"

- डॉ. भावना 
मुजफ्फरपुर, बिहार.

Monday, May 22, 2017

और हम तैयार हो गये.......गौतम कुमार “सागर”









दंगो में चमचे ,
चिमटे भी हथियार हो गये
भीड़ जहाँ देखी..
.... उसके तरफदार हो गये !
शोहरतमंदों का ग्राफ.....
नीचे गिरा
तो कब्र बन गये
और उँचा हुआ तो..
गर्दने ऐंठ गयी
कुतुब मीनार हो गये !
अजब रोग है ...
इन खूब अमीर
मगर गुनाहगार लोगों का
मुक़दमे की........
हर तारीख पे ........
बीमार हो गये !
सियासत गंभीर मुद्दा
..... या अँग्रेज़ी वाला “फन “
क़व्वाली-ए-चुनाव में........
बेसुरे भी
फनकार हो गये !
बचपन में........
माँ जब स्कूल भेजती थी
बालों में तेल चुपड़ कर..
कंघी की... और  ह्म तैयार हो गये !
-गौतम कुमार “सागर”

Sunday, May 21, 2017

ये शेष रह जाएंगे...अंजना बाजपेई











कुछ गोलियों की आवाजें
बम के धमाके ,
फैल जाती है खामोशी ...
नहीं, यह खामोशी नहीं 
सुहागिनों का, बच्चों का,
मां बाप का करूण विलाप है,
मूक रूदन है प्रकृति का ,
धरती का, आकाश का .....

जलेंगी चिताएं और विलीन हो जायेंगे शरीर
जो सिर्फ शरीर ही नहीं

प्यार है, उम्मीदें है, विश्वास है, आशा है ,
बच्चों के, भाई बहनों के, पत्नी, माँ बाप और
सभी अपनों के
वह सब भी जल जायेंगे
विलीन हो जायेंगे शरीर
पंचतत्वों में धुँआ बनके, राख बनके ,
आकाश, हवा, पानी मिट्टी और अग्नि में 
सब विलीन हो जायेंगे ...

कौन कहेगा उनके बच्चों से - 
बेटा आप खूब पढ़ो मै हूँ ना ?
कौन उनको प्यार देगा, 
जिम्मेदारी उठायेगा ??

कैसे बेटियाँ बाबुल के गले लगकर विदा होंगी ?
उनकी शादी बिन बाबुल के कैसे होगी?

बुजुर्ग माँ, पिता, पत्नी, बहन, भाई 
सबके खामोश आँसू बह रहे,
दर्द समेटे 
कैसे जी रहे उनको कौन संभालेगा?

ये सारे कर्तव्य शेष रह जायेंगे ,
ये विवशता के आँसू, 
ये पिघलते सुलगते दर्द बन जायेगें,
ये हवा में रहेंगे 
सिसकियाँ बनकर, 
पानी में मिलेंगे पिघले दर्द बनकर ,
मिट्टी में रहेंगे, आकाश में, बादल में रहेंगे,

ये कहीं विलीन ना हो सकेंगे
मिट ना सकेंगे.....
इन्हें कोई पूरा नहीं कर सकेगा, 
ना सरकार, ना रिश्तेदार ,
ये कर्तव्य, ये फर्ज 
अनुत्तरित प्रश्न बन जायेगे ,
ये शेष रहेंगे, ये शेष रह जाएंगे...
-अंजना बाजपेई
जगदलपुर (बस्तर )
छत्तीसगढ़....

Thursday, May 18, 2017

जीने की एक वजह काफी है.....विभा परमार


तलाशने की
कोशिश करती हूँ
जीवन से बढ़ती

उदासीनता की वजहें
रोकना चाहती हूं
अपने भीतर पनप रही
आत्मघाती प्रवृत्ति को
पर नजर आते हैं
धूप-छांव से इतने रंज औ गम
रेत की आंधियों सी मिली चोटें
और सूख चुकी पत्तियों सी उम्मीदें
कि न जीने के कारण तलाशना छोड़,
एक बार फिर से बारिश में
बाहें फैलाए जी भर के भीगूं
-विभा परमार 

Sunday, May 7, 2017

ठूँठ होना...ओम नागर















ठूँठ  होना
आसान नहीं होता

सतत् दोहन से
गुजरना होता है पेड़ को
ठूँठ होने के लिए

ठूँठ होने के लिए भी
चाहिए होती हैं
जीवन के प्रति आस्था

ठूँठ भी कई बार होता हैं
बसंत के आगमन पर
हरा -भरा।
3-ए-26, महावीर नगर तृतीय, कोटा - 324005(राज.)
मोबाइल-9460677638
E-mail-omnagaretv@gmail.com

Friday, May 5, 2017

मैं स्त्री..........नीलिमा श्रीवास्तव












मैं स्त्री
कभी अपनों ने
कभी परायों ने
कभी अजनबी सायों ने
तंग किया चलती राहों में

कभी दर्द में
कभी फर्ज में
कभी मर्ज में
वेदना मिली
इस धरती के नरक में

कभी शोर में
कभी भोर में
कभी जोर में
संताप सहे अपनी ओर से

कभी अनजाने में
कभी जान में
कभी शान में
कुचले गये अरमान झूठी पहचान में

कभी प्यार से
कभी मार से
कभी दुलार से
छली गयी हूॅ मैं स्त्री इस संसार में
-- नीलिमा श्रीवास्तव 

Sunday, April 23, 2017

कबाड़ उठाती लड़कियाँ...........मनोज चौहान











पाचं – छः जन के
समूह में
जा रही हैं वे लड़कियाँ
राष्ट्रीय राजमार्ग के एक ओर
रंग बिरंगे, पुराने से
कपड़े पहने
जो कि धुले होंगे
महीनों पहले
उनके किसी त्यौहार पर

पावों में अलग – अलग
चप्पल पहने
दिख जाती हैं पैरों की
बिबाइयां सहज ही
उन के हाथों में हैं
राशन वाली किसी दुकान से खाली हुई
सफेद बोरियां

राजमार्ग पर चलते हुए
जब दिख जाती है उन्हें
किसी गोलगप्पे
या चाट वाले की रेहड़ी पर
उमड़ी भीड़
तो चल पड़ते हैं उनके कदम
स्वतः ही उस ओर
अपनी जिव्हा का स्वाद
मिटाने नहीं
बल्कि खाली पड़ी किसी
पानी या कोल्ड ड्रिंक की बोतल
या इसी तरह के किसी
दुसरे सामान की
आस में

ये लडकियां किशोरियां हैं
सत्रह – अठरह बर्ष के करीब की
सड़क के एक ओर चलते
मिल ही जाती हैं सुनने को
किसी ट्रक ड्राइवर की फब्तियां
या मोटर साइकिल पर जाते
मनचलों के बोल
जिन्हें कर देती हैं वे अनसुना
याद कर
पारिवारिक जरूरतों की
प्राथमिकताओं को ।

चहक उठती हैं वे
शैक्षणिक भ्रमण पर निकली
उस बस को देखकर
जिसमें बैठीं हैं
उनकी ही उम्र की छात्राएं
जो हिला देती हैं हाथ
उन्हें देखकर
अभिवादन स्वरुप
क्या उन्हें नहीं होगा शौक
बन – संवरकर
अच्छा दिखने का
या किसी महंगे मोबाइल से
सेल्फी खींचने का ?

वे कबाड़ उठातीं लडकियां
चिढ़ाती हैं
आज भी
इकीसवीं सदी के विकास को
और साथ ही
प्रति व्यक्ति आय में हुए
इजाफा दर्शाने वाले
अर्थशास्त्रियों के आंकड़ों को
और संविधान के उन
अनुच्छेदों को भी
जिनमें दर्ज हैं
उनको न मिल सके
कई मौलिक अधिकार

वे मेहनतकश बेटियाँ हैं
अपने माँ – बाप के आँगन में खिले
सुंदर फूल हैं
जिम्मेदारियां उठाकर
परिवार का भरण - पोषण करते हुए
जो बन गई हैं माताओं की तरह
इस उम्र में ही
और जूझ रही हैं
मूलभूत आवश्यकताओं की
उहापोह में
-मनोज चौहान,

Saturday, April 8, 2017

ऐसा कुछ गुमान था.............प्रतिभा चौहान


अपनी हकीकत पर मुझे इत्मिनान था
क्योंकि मेरी नजरों में  आसमान था

खुली फिजा में होंगी राहत की बस्तियां
भटकती राहों को ऐसा  कुछ गुमान था

मंजिल यूं ही नहीं मिली इन नुमाइंदों  को
कई रतजगे, कई मशवरे ,कड़ा इम्तिहान था

उगा डाली सूखी दरारों में नमी की पत्तियाँ
पत्थरों में कहाँ  ऐसा  हौसला - ईमान था....
-प्रतिभा चौहान 

Friday, April 7, 2017

सियासत........पंकज शर्मा


ज़र्रा ज़र्रा दहक उठता है,
जब बेबात अदावत होती है।

हर कोना कोना रिसता है..
जब कोई शहादत होती है।

कुछ बड़ी मीनारें झुक जावे
कुछ ठंडे छींटे दे जावे..
कुछ देर सलामी होती है।

दम घुट घुट के रह जाता है,
जब शहीदों पे सियासत होती है।
-पंकज शर्मा 

Thursday, March 30, 2017

टूटी है वो टुकड़ों-टुकड़ों में....आकांक्षा यादव

Akanksha Yadav : आकांक्षा यादव
न जाने कितनी बार
टूटी है वो टुकड़ों-टुकड़ों में
हर किसी को देखती
याचना की निगाहों से
एक बार तो हाँ कहकर देखो
कोई कोर कसर नहीं रखूँगी
तुम्हारी जिन्दगी संवारने में
पर सब बेकार
कोई उसके रंग को निहारता
तो कोई लम्बाई मापता
कोई उसे चलकर दिखाने को कहता
कोई साड़ी और सूट पहनकर बुलाता
पर कोई नहीं देखता
उसकी आँखों में
जहाँ प्यार है, अनुराग है
लज्जा है, विश्वास है।
-आकांक्षा यादव

ई-मेल:  akankshay1982@gmail.com  
ब्लॉगः http://shabdshikhar.blogspot.in/

Saturday, March 18, 2017

उस रात.....डॉ भावना












उस रात
जब बेला ने खिलने से मना कर दिया था
तो ख़ुशबू उदास हो गयी थी

उस रात
जब चाँदनी ने फेर ली अपनी नज़रें
चाँद को देखकर
तो रो पड़ा था आसमान

उस रात
जब नदी ने बिल्कुल शांत हो
रोक ली थी अपनी धाराएँ
तो समन्दर दहाड़ने लगा था

उस रात
जब बेला ने मना कर दिया पेड़ के साथ
लिपटने से
तो ......
पहली बार 
पेड़ की शाखाएँ
झुकने लगी थीं
और बेला ने जाना था अपना अस्तित्व

पहली बार
बेला को नाज़ हुआ था अपनी सुगंध पर
चाँदनी कुछ और निखर गयी थी
नदी कुछ और चंचल हो गयी थी

पहली बार
प्रकृति हैरान थी
बहुत कोशिश की गयी
बदलाव को रोकने की
परंपरा -संस्कृति की दुहाई दी गयी
धर्म -ग्रंथों का हवाला दिया गया
पर ..... स्थितियां बदल चुकी थीं
-डॉ भावना

Thursday, March 16, 2017

सकारात्मक सोच.......मल्लिका मुखर्जी













मुद्दत के बाद,
आज अचानक
चलते-चलते
नज़र पड़ी
धरती का सीना चीरकर
निकलने वाली
उन हरी-हरी कोपलों पर !

सोच रही हूँ,
यह प्रकृति की उदारता है,
मेह का स्नेह है
या
बीज का साहस
जो धरती की गोद में छिपकर
राह तक रहा था
सही समय का ?
-मल्लिका मुखर्जी 

Tuesday, March 14, 2017

क्या कहूंगा,,,,,,,,केशव शरण
















क्या मैं कह सकूंगा
मालिक ने अच्छा नहीं किया
अगर किसी ने
मेरे सामने माइक कर दिया

क्या मैं भी वही कहूंगा
जो सभी कह रहे हैं
बावजूद सब दुर्दशा के
जो वे सह रहे हैं
और मैं भी

क्या मैं भी यही कहूंगा
कि आगे बेहतरीन परिवर्तन होगा
मालिक की हालिया कठोर नीतियों से
भविष्य में हमारा सुखमय,सरल जीवन होगा
-केशव शरण