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Tuesday, October 15, 2019

दीपक दम तोड़ रहा है..कुसुम कोठारी

चारों तरफ कैसा तूफान है
हर दीपक दम तोड़ रहा है !


इंसानों की भीड जितनी बढी है 

आदमियत  उतनी ही नदारद है !


हाथों मे तीर लिये हर शख्स है

हर नजर नाखून लिये बैठी है !


किनारों पे दम तोडती लहरें है

समंदर से लगती खफा खफा है !


स्वार्थ का खेल हर कोई खेल रहा है

मासूमियत लाचार दम तोड रही है !


शांति के दूत कहीं दिखते नही है

हर और शिकारी बाज उड रहे है !


कितने हिस्सों मे बंट गया मानव है

अमन ओ चैन मुह छुपा के रो रहा है !!


-- कुसुम कोठारी

Tuesday, December 25, 2018

पत्थरों का शहर....कुसुम कोठारी

ये क्या कि पत्थरों के शहर में 
शीशे का आशियाना ढूंढते हो!

आदमियत का पता तक नही
गजब करते हो इंसान ढूंढते हो !

यहाँ पता नही किसी नियत का
ये क्या कि आप ईमान ढूंढते हो !

आईनों में भी दगा भर गया यहां 
अब क्या सही पहचान ढूंढते हो !

घरौदें रेत के बिखरने ही तो थे
तूफानों पर क्यूं इल्जाम ढूंढते हो !

जहां बालपन भी बुड्ढा हो गया 
वहां मासूमियत की पनाह ढूढते हो!

भगवान अब महलों में सज के रह गये 
क्यों गलियों में उन्हें सरे आम ढूंढते हो। 
-कुसुम कोठारी

Tuesday, July 17, 2018

चोर कोतवाल..कुसुम कोठारी

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मईया बोली सुन मोरे लला
काम पड़्यो अति भारी
मै आऊँ तब तक तू ही
कर माखन रखवारी 
तू कहत सदा ,
ग्वाल बाल ही है माखन के चोर
चोरी करत सब ,
और मेरे लल्लन पर
डालत दोष
आज तू ही संभाल माखन मोरो,
दूंगी तूझे घनेरो
सुन मईया की बात
मनमोहन पड़्यो घणे संकट मे
माखन भरो पड़्यो कटोरो
नही चख पाऊँ मै
निगरानी मे डारयो मईया
कैसी अनीति मचाई
सच माँ तू मोसे सयानी
चोर कू ही कोतवाल बनाई 
मै तो जग को ठाकुर हूं,
पर तू मोरी भी माई।
-कुसुम कोठारी 

Thursday, June 14, 2018

एक बूंद का आत्म बोध....कुसुम कोठारी



पयोधर से निलंबित हुई
अच्युता का भान एक क्षण
फिर वो बूंद मगन अपने मे चली
सागर मे गिरी
पर भटकती रही अकेली
उसे सागर नही
अपने अस्तित्व की चाह थी

महावीर और बुद्ध की तरह
वो चली निरन्तर
वीतरागी सी
राह मे रोका एक सीप ने 
उस के अंदर झिलमिलाता
एक मोती बोला
एकाकी हो कितनी म्लान हो,
कुछ देर और
बादलों के आलंबन मे रहती
मेरी तरह स्वाती नक्षत्र मे
बरसती तो देखो
मोती बन जाती
बूंद ठिठकी
फिर लूं आलंबन सीप का !!
नही मुझे अपना अस्तित्व चाहिये
सिद्ध हो विलय हो जाऊं एक तेज मे।

कहा उसने.... 
बूंद हूं तो क्या
खुद अपनी पहचान हूं 
मिल गई गर समुद्र मे क्या रह जाऊंगी
कभी मिल मिल बूंद ही बना सागर 
अब सागर ही सागर है,बूंद खो गई
सीप का मोती बन कैद ही पाऊंगी 
निकल भी आई बाहर तो   
किसी गहने मे गूंथ जाऊंगी
मै बूंद हूं स्वयं अपना अस्तित्व
अपनी पहचान बनाऊंगी। 
-कुसुम कोठारी

Friday, June 8, 2018

कभी न कभी....कुसुम कोठारी

मन की दहलीज पर
स्मृति का चंदा उतर आता
यादों के गगन पर,

सागर के सूने तट पर
फिर लहरों की हलचल
सपनो का भूला संसार
फिर आंखों में ,

दूर नही सब
पास दिखाई देते हैं
न जाने उन अपनो के
दरीचों मे भी कोई
यादों का चंदा
झांकता हो कभी,

हां भूला सा कल सभी को
याद तो आता ही होगा
यादों की दहलीज पर
कोई मुस्कुराता ही होगा
कभी न कभी 
-कुसुम कोठारी 

Friday, May 18, 2018

ठंडी बयार का झोंका....कुसुम कोठारी

मां को काट दोगे
माना जन्म दाता नहीं है
पर पाला तुम्हें प्यार से
ठंडी छांव दी प्राण वायु दी
फल दिये
पंछिओं को बसेरा दिया
कलरव उनका सुन खुश होते सदा

ठंडी बयार का झोंका
जो लिपटकर उस से आता
अंदर तक एक शीतलता भरता
तेरे पास के सभी प्रदुषण को 
निज मे शोषित करता

हां, काट दो बुड्ढा भी हो गया
रुको!! क्यों काट रहे बताओगे? 
लकडी चहिये हां, तुम्हें भी पेट भरना है
काटो पर एक शर्त है
एक काटने से पहले
कम से कम दस लगाओगे।
ऐसी जगह कि फिर किसी
 विकास की भेट ना चढूं मै
समझ गये तो रखो कुल्हाड़ी

पहले वृक्षारोपण करो
जब वो कोमल सा विकसित होने लगे
मुझे काटो मै अंत अपना भी
तुम पर बलिदान करुं
तुम्हारे और तुम्हारे नन्हों की
आजीविका बनूं

और तुम मेरे नन्हों को संभालना
कल वो तुम्हारे वंशजों को जीवन देगें
आज तुम गर नई पौध लगाओगे
कल तुम्हारे वंशज 
फल ही नही जीवन भी पायेंगे।
-कुसुम कोठारी

एक पेड काटने वालों 
पहले दस पेड़ लगाओ 
फिर हाथ में आरी उठाओ

Saturday, May 12, 2018

किया "इजहारे" मुहब्बत....कुसुम कोठारी


शाहजहां ने बनवाकर ताजमहल
याद मे मुमताज के, 
डाल दिया आशिकों को परेशानी मे।

आशिक ने लम्बे "इंतजार" के बाद 
किया "इजहारे" मुहब्बत

"नशा" सा छाने लगा था दिलो दिमाग पर 
कह उठी महबूबा अपने माही से
कब बनेगा ताज हमारे सजदे में
डोल उठा! खौल उठा!! बोला
ये तो निशानियां है याद में 
बस जैसे ही होगी आपकी आंखें बंद
बंदा शुरू करवा देगा एक उम्दा महल

कम न थी जानेमन भी
बोली अदा से लो कर ली आंखें बंद
बस अब जल्दी से प्लाट देखो
शुरू करो बनवाना एक "ख्वाब" गाह
जानु की निकल गई जान
कहां फस गया बेचारा मासूम आशिक
पर कम न था बोला

एक मकबरे पे क्यों जान देती हो
चलो कहीं और घूम आते हैं
अच्छे से नजारों से जहाँ भरा है,
बला कब टलने वाली थी
बोली चलो ताज नही एक फ्लैट ही बनवादो
चांद तारों से नही" गुलाबों" से ही सजा दो 
"उसे पाने की कोशिशें तमाम हुई सरेआम हुई" 
अब खुमारी उतरी सरकार की बोला
छोड़ो मैं पसंद ही बदल रहा हूं
आज से नई गर्लफ्रेंड ढूंढता हूं

मुझमे शाहजहां बनने की हैसियत नही
तुम मुमताज बनने की जिद पर अड़ी रहो
देखता हूं कितने और ताजमहल बनते हैं
हम गरीबों की "वफा" का माखौल उडाते है
जीते जी जिनके लिए सकून का
एक पल मय्यसर नही
मरने पर उन्हीं के लिये ताज बनवाते हैं।
 -कुसुम कोठारी 

Saturday, May 5, 2018

इंतजार की बेताबी............ कुसुम कोठारी

अंधेरे से कर प्रीति
उजाले सब दे दिये 
अब न ढूंढना
उजालो में हमें कभी।

हम मिलेंगे सुरमई
शाम  के   घेरों में 
विरह का आलाप ना छेड़ना
इंतजार की बेताबी में कभी।

नयन बदरी भरे
छलक न जाऐ मायूसी में 
राहों पे निशां ना होंगे
मुड के न देखना कभी।

आहट पर न चौंकना
ना मौजूद होंगे हवाओं मे 
अलविदा भी न कहना
शायद लौट आयें कभी।

-कुसुम कोठारी 

Thursday, April 26, 2018

अस्तित्व..... और अस्मिता बचाने की लडाई......कुसुम कोठारी


अस्तित्व..... 
और अस्मिता बचाने की लडाई
खूब लडो जुझारू हो कर लड़ो
पर रुको 
सोचो ये सिर्फ 
अस्तित्व की लड़ाई है या 
चूकते जा रहे 
संस्कारों की प्रतिछाया... 

जब दीमक लगी हो नीव मे
फिर हवेली कैसे बच पायेगी 
नीव को खाते खाते
दिवारें हिल जायेगी
एक छोटी आंधी भी
वो इमारत गिरायगी
रंग रौगन खूब करलो
कहां वो बच पायेगी।

नीड़ तिनकों के तो सुना
ढहाती है आंधियां
घरौंदे माटी के भी 
तोडती है बारिशें
संस्कारों की जब
टूटती है डोरिया
उन कच्चे धागों पर कैसे
शामियाने  टिक पायेंगे।

समय ही क्या बदला है 
या हम भी हैं बदले बदले
नारी महान है माना
पर रावण, कंस भी पोषती है
सीता और द्रोपदी
क्या इस युग की बात है
काल चक्र मे सदा ही
विसंगतियां पनपती है।

पर अब तो दारुण दावानल है
जल रहा समाज जलता सदाचरण है
क्या होगा अंत गर ये शुरूआत है
केशव तो नही आयेंगे ये निश्चित है
कुछ  ढूंढना होगा इसी परिदृश्य मे 
अस्मिता का युद्ध स्वयं लड़ना होगा
संयम और संस्कारों को गढ़ना होगा।
 - कुसुम कोठारी

Thursday, April 12, 2018

मेरे मन का डर.....कुसुम कोठारी


आजकल डर के कारण
सांसे कुछ कम ले रही  हूं 
अगली पीढ़ी के लिये
कुछ प्राण वायु छोड़ जाऊं, 
डरती हूं क्या रहेगा
उनके हिस्से
बिमार वातावरण
पानी की कमी
दूषित खाद्य पदार्थ
डरा भविष्य
चिंतित वर्तमान
जीने की जद्दोजहद
झूठ, फरेब
बेरौनक जिंदगी
स्वार्थ
अविश्वास
धोखा फरेब 
अनिश्चित जीवन
वैर वैमनस्य
फिर  से दिखता
आदम युग
यह भयावह
चिंतन मुझे डराता है
सोचती हूं अभीसे
पानी की
एक एक बूंद का
हिसाब रखूं
कुछ तो सहेजू
उनके लिये
कुछ अच्छे संस्कार
दया कोमल भाव
सहिष्णुता
मजबूत नींव
धैर्य आदर्श 
कि वो अपने
पूर्वजों को कुछ
आदर से याद करें
चैन से जी सके
और अपनी अगली पीढ़ी को 
 कुछ अच्छा देने की सोचें....
-कुसुम कोठारी

Thursday, April 5, 2018

उड़ान..........कुसुम कोठारी


उड़ान जान ले बड़ी कठिन है
कोई तेरे साथ नही है 
इन राहों में धूप गरम है
दूर तक कोई छांव नही है
सहारे की भी उम्मीद ना रखना 
निज हौसलों पर तू उड़ना
अपनी राह तुम स्वयं बनाना
अपने आप को पाना हो जो
बनी राह पर ना तू चलना 
कितनी भी कठिनाई हो 
बस तू हरदम आगे बढ़ना
तेरी राहें स्वयं बनेगी 
दरिया ,बाधा सब निपटेंगी
तूं अपना नूर जगाये रखना 
रोक ना पाये कोई तुझ को
यह निश्चय बस ठान के चलना
उड़ान जान ले......
कुसुम कोठारी 
(चित्र सौजन्य गूगल)
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Saturday, March 24, 2018

एक एहसास अनछुआ सा.....कुसुम कोठारी


झील के शांत पानी मे
शाम की उतरती धुंधली उदासी
कुछ और बेरंग
श्यामल शाम का सुनहरी टुकडा

कहीं क्षितिज के क्षोर पर पहुंच   
काली कम्बली मे सिमटता
निशा के उद्धाम अंधकार से  
एकाकार हो
जैसे पर्दाफाश  करता
अमावस्या के रंग हीन
बेरौनक आसमान का
निहारिकाऐं जैसे अवकाश पर हो

चांद के साथ कही सुदूर प्रांत मे 
ओझल कहीं किसी गुफा मे विश्राम करती
छुटपुट तारे बेमन से टिमटिमाते
धरती को निहारते मौन
कुछ कहना चाहते,
शायद धरा से मिलन का
कोई सपना हो
जुगनु दंभ मे इतराते
चांदनी की अनुपस्थिति मे
स्वयं को चांद समझ डोलते

चकोर व्याकुल कहीं
सरसराते अंधेरे पात मे दुबका
खाली सूनी आँखों मे
एक एहसास अनछुआ सा
अदृश्य से गगन को
आशा से निहारता
शशि की अभिलाषा मे
विरह मे जलता
कितनी सदियों
यूं मयंक के मय मे
उलझा रहेगा
इसी एहसास मे
जीता मरता रहेगा
उतरती रहेगी कब तक
शांत झील मे शाम की उदासियां।

-कुसुम कोठारी

Monday, February 12, 2018

स्याही से नहीं रुहानी लिखना.....कुसुम कोठारी

कोरे पन्ने पे कोरी कहानी लिखना
स्याही से नहीं रुहानी लिखना 

उछल के समंदर से जो आया वो पानी लिखना
उस रुके पानी में फिर रवानी लिखना

किताबों मे जो गुलाब थे वो निशानी लिखना
उन सुखे फूलों की खुशबू  सुहानी लिखना

क्षितिज पर मिलते धरती आसमान लिखना
मन आकाश को छूती गजल सुहानी लिखना ।

-कुसुम कोठारी 

Thursday, February 1, 2018

एक इंद्रधनुषी स्वप्निल रंगीला बचपन....कुसुम कोठारी

ख्वाबों के दयार पर एक झुरमुट है यादों का
एक मासूम परिंदा फुदकता यहाँ वहाँ यादों का ।

सतरंगी धागों का रेशमी इंद्रधनुषी शामियाना
जिसके तले मस्ती में झूमता एक भोला बचपन ।

सपने थे सुहाने उस परी लोक की सैर के 
वो जादुई रंगीन परियां जो डोलती इधर उधर।

मन उडता था आसमानों के पार कहीं दूर 
एक झूठा सच, धरती आसमान है मिलते दूर ।

संसार छोटा सा लगता ख्याली घोड़े का था सफर 
एक रात के बादशाह बनते रहे संवर संवर ।

दादी की कहानियों मे नानी थी चांद के अंदर 
सच की नानी का चरखा ढूढते नाना के घर ।

वो झूठ भी था सब तो कितना सच्चा था बचपन
ख्वाबों के दयार पर एक मासूम सा बचपन।

एक इंद्रधनुषी स्वप्निल रंगीला  बचपन। 

-कुसुम कोठारी।

Thursday, January 18, 2018

सवाल बेशुमार लिये बैठें हैं.....कुसुम कोठारी

जो फूलों सी जिंदगी जीते कांटे हजार लिये बैठे हैं
दिल मे फरेब और होटो पे झूठी मुस्कान लिये बैठे हैं। 

खुला आसमां ऊपर,ख्वाबों के महल लिये बैठें हैं
कुछ, टूटते अरमानो का ताजमहल लिये बैठें हैं। 

सफेद दामन वाले भी दिल दागदार लिये बैठे हैं
क्या लें दर्द किसी का कोई अपने हजार लिये बैठें हैं। 

हंसते हुए चहरे वाले दिल लहुलुहान लिये बैठे हैं
एक भी जवाब नही, सवाल बेशुमार लिये बैठें हैं। 

टूटी कश्ती वाले हौसलों की पतवार लिये बैठे हैं
डूबने से डरने वाले साहिल पर नाव लिये बैठे हैं।
-कुसुम कोठारी


Wednesday, December 20, 2017

विराने समेटे.......कुसुम कोठारी

विराने समेटे कितने पद चिन्ह
अपने हृदय पर अंकित घाव
जाता हर पथिक छोड छाप
अगनित कहानियां दामन मे
जाने अन्जाने राही छोड जाते
एक अकथित सा अहसास
हर मौसम गवाह बनता जाता
बस कोई फरियादी ही नही आता
खुद भी साथ चलना चाहते हैं
पर बेबस वहीं पसरे रह जाते हैं
कितनो को मंजिल तक पहुंचाते
खुद कभी भी मंजिल नही पाते
कभी किनारों पर हरित लताऐं झूमती
कभी शाख से बिछडे पत्तों से भरती
कभी बहार , कभी बेरंग मौसम
फिर भी पथिक निरन्तर चलते
नजाने कब अंत होगा इस यात्रा का
यात्री बदलते  रहते निरन्तर
राह रहती चुप शांत बोझिल सी।
विराने समेटे..
- कुसुम कोठारी 

Friday, December 8, 2017

ये जर जर हवेली.....कुसुम कोठारी


जर जर हवेलियां भी
संभाले खडी है
प्यार की सौगातें
कभी झांका था
एक नन्हा अंकुर
दिल की खिडकी खोल
संजोये रखूंगी प्यार से
जब तक खुद न डह जाऊंगी 
ये जर जर हवेली
ना भूलेगी कभी
वो कोमल छुवन
वो नरम पवन
जो छू के उसे
छूती थी उसे
एक नन्हे के
कोमल हाथों जैसा
अहसास ना भूलेगी
ये जर जर हवेली ।
-कुसुम कोठारी 

Sunday, December 3, 2017

शबनम की माला....कुसुम कोठारी

Photo
सुबह धुंध से
धोई सी 
शबनम की माला
पोई सी 
गजल अभी तक
सोई सी 
आंख है क्यों कुछ
रोई सी 
यादें यादों मे
खोई सी 
गूंजी कानो मे
सरगोई सी
मन वीणा से
झंकृत हो
शब्दों की लड़ियां
संजोई सी ।

- कुसुम कोठारी 

Saturday, December 2, 2017

फिर यादें मचली .....कुसुम कोठारी

सूनी मुंडेरें
ये शाम की तन्हाई
कहां हो गुम। 
:: :: ::
सूरज डूबा
क्षितिज है रंगीन 
घिरी उदासी। 
:: :: ::
परछाई से
निकली यादें पुरानी
बनी दास्तान । 
:: :: ::
निस्तब्ध मन
इंतजार करता
होले होले से।
:: :: :: 
दूर आसमां 
एक सूरत दिखी
शायद तुम्ही। 
:: :: ::
फिजा श्यामल 
लहराया रात का
नीला आंचल। 
:: :: ::
शमाऐं जली
फिर यादें मचली 
कब आवोगे।
:: :: ::
चांद निकला
शमा हुआ रौशन
फिर भी कमी।
:: :: ::
रात खमोश
तारे हैं झिलमिल
फिजा उदास।
:: :: ::
ढली रजनी
धीरे धीरे मन की
आस भी टूटी।

-कुसुम कोठारी 

Thursday, November 30, 2017

हर दीपक दम तोड़ रहा है...कुसुम कोठारी

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चारों तरफ कैसा तूफान है
हर दीपक दम तोड़ रहा है

इंसानों की भीड जितनी बढी है
आदमियत उतनी ही नदारद है

हाथों मे तीर लिये हर शख्स है
हर नजर नाखून लिये बैठी है

किनारों पे दम तोडती लहरें है
समंदर से लगती खफा खफा है

स्वार्थ का खेल हर कोई खेल रहा है
मासूमियत लाचार दम तोड रही है

शांति के दूत कहीं दिखते नही है
हर और शिकारी बाज उड रहे है

कितने हिस्सों मे बंट गया मानव है
अमन ओ चैन मुह छुपा के रो रहा है।
-कुसुम कोठारी