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Wednesday, June 5, 2019

उगाने होंगे अनगिन पेड़.....रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

आज पर्यावरण दिवस पर विशेष
मत काटो तुम ये पेड़
हैं ये लज्जावसन
इस माँ वसुन्धरा के।
इस संहार के बाद
अशोक की तरह
सचमुच तुम बहुत पछाताओगे; 
बोलो फिर किसकी गोद में
सिर छिपाओगे? 
शीतल छाया
फिर कहाँ से पाओगे ? 
कहाँ से पाओगे फिर फल? 
कहाँ से मिलेगा? 
सस्य श्यामला को 
सींचने वाला जल? 
रेगिस्तानों में
तब्दील हो जाएँगे खेत
बरसेंगे कहाँ से 
उमड़-घुमड़कर बादल? 
थके हुए मुसाफ़िर
पाएँगे कहाँ से
श्रमहारी छाया? 
पेड़ों की हत्या करने से 
हरियाली के दुश्मनों को
कब सुख मिल पाया? 
यदि चाहते हो –
आसमान से कम बरसे आग
अधिक बरसें बादल, 
खेत न बनें मरुस्थल, 
ढकना होगा वसुधा का तन
तभी कम होगी
गाँव–नगर की तपन।
उगाने होंगे अनगिन पेड़
बचाने होंगे
दिन-रात कटते हरे-भरे वन।
तभी हर डाल फूलों से महकेगी
फलों से लदकर
नववधू की गर्दन की तरह
झुक जाएगी
नदियाँ खेतों को सींचेंगी
सोना बरसाएँगी
दाना चुगने की होड़ में
चिरैया चहकेगी
अम्बर में उड़कर
हरियाली के गीत गाएगी
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

Tuesday, May 14, 2019

खड़े जहाँ पर ठूँठ.....रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

खड़े जहाँ पर ठूँठ
कभी वहाँ
पेड़ हुआ करते थे।
सूखी तपती
इस घाटी में कभी
झरने झरते थे।

छाया के 
बैरी थे लाखों
लम्पट ठेकेदार,
मिली-भगत सब 
लील गई थी
नदियाँ पानीदार।
अब है सूखी झील 
कभी यहाँ 
पनडुब्बा तिरते थे।

बदल गए हैं 
मौसम सारे
खा-खा करके मार
धूल-बवण्डर
सिर पर ढोकर 
हवा हुई बदकार 
सूखे कुएँ,
बावड़ी सूखी
जहाँ पानी भरते थे।
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

Saturday, May 11, 2019

श्रृंगार है हिन्दी ....रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

खुसरो के हृदय का उद्‌गार है हिन्दी।
कबीर के दोहों का संसार है हिन्दी॥

मीरा के मन की पीर बन गूँजती घर-घर।
सूर के सागर - सा विस्तार है हिन्दी॥

जन-जन के मानस में, बस गई जो गहरे तक।
तुलसी के 'मानस' का विस्तार है हिन्दी॥

दादू और रैदास ने गाया है झूमकर।
छू गई है मन के सभी तार है हिन्दी॥

'सत्यार्थप्रकाश' बन अँधेरा मिटा दिया।
टंकारा के दयानन्द की टंकार है हिन्दी॥

गाँधी की वाणी बन भारत जगा दिया।
आज़ादी के गीतों की ललकार है हिन्दी॥

'कामायनी' का 'उर्वशी’ का रूप है इसमें।
'आँसू’ की करुण, सहज जलधार है हिन्दी॥

प्रसाद ने हिमाद्रि से ऊँचा उठा दिया।
निराला की वीणा वादिनी झंकार है हिन्दी॥

पीड़ित की पीर घुलकर यह 'गोदान' बन गई।
भारत का है गौरव, श्रृंगार है हिन्दी॥

'मधुशाला' की मधुरता है इसमें घुली हुई।
दिनकर के 'द्वापर' की हुंकार है हिन्दी॥

भारत को समझना है तो जानिए इसको।
दुनिया भर में पा रही विस्तार है हिन्दी॥

सबके दिलों को जोड़ने का काम कर रही।
देश का स्वाभिमान है, आधार है हिन्दी॥
रामेश्वर काम्बोज
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

Wednesday, May 8, 2019

मेरी माँ ....रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

ढिबरी के नीम उजाले में
पढ़ने मुझे बिठाती माँ।

उसकी चक्की चलती रहती
गाय दूहना, दही बिलोना
सब कुछ करती जाती माँ।

सही वक़्त पर बना नाश्ता
जी भर मुझे खिलाती माँ।
घड़ी नहीं थी कहीं गाँव में
समय का पाठ पढ़ाती माँ।

छप्पर के घर में रहकर भी
तनकर चलती–फिरती माँ।
लाग–लपेट से नहीं वास्ता
खरी-खरी कह जाती माँ।

बड़े अमीर बाप की बेटी
अभाव से टकराती माँ।
धन–बात का उधार न सीखा
जो कहना कह जाती माँ

अस्सी बरस की इस उम्र ने
कमर झुका दी है माना।
खाली बैठना रास नहीं
पल भर कब टिक पाती माँ।

गाँव छोड़ना नहीं सुहाता
शहर में न रह पाती माँ।
वहाँ न गाएँ, सानी-पानी
मन कैसे बहलाती माँ।

कुछ तो बेटे बहुत दूर हैं
कभी-कभी मिल पाती माँ।
नाती-पोतों में बँटकर के
और बड़ी हो जाती माँ।

मैं आज भी इतना छोटा
है कठिन छूना परछाई।
जब–जब माँ माथा छूती है
जगती मुझमें तरुणाई।

माँ से बड़ा कोई न तीरथ
ऐसा मैंने जाना है।
माँ के चरणों में न्योछावर
करके ही कुछ पाना है।
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'