ये नहीं कि दिल की ख़लिश पिघल गई।
रोने से तबियत ज़रूर थोड़ी संभल गई।।
वही मैं, वही तुम, वही है दोस्ती हमारी,
फ़ासले से कैफ़ियत ज़रूर थोड़ी बदल गई।
पहले से जानते थे कि ना आओगे मगर,
बहाने से तबियत ज़रूर थोड़ी बहल गई।
उन्हें झूठ कहने का कोई इरादा तो ना था,
जुबां से हक़ीक़त ज़रूर थोड़ी फिसल गई।
दीदार-ए-यार की आरज़ू में बेख़ुद ना थे ,
उम्मीद से हसरत ज़रूर थोड़ी मचल गई।
खुशमिजाज़ रहे दौर-ए-आज़माइश में भी,
मुस्कराने से मुसीबत ज़रूर थोड़ी टल गई।
'दक्ष' को अब भी है अपने दोस्तों पे ऐतबार,
ज़माने से शराफ़त ज़रूर थोड़ी निकल गई।
-विकास शर्मा "दक्ष"
