
बना के कठपुतली नचाते रहो
रखो दोनों शिराओं को तलवे के नीचे
हमारा क्या है.....
तुम कहो तो हम उठें
तुम कहो तो बैठे
चाहो तो सांस लेने के भी
समय तय कर दो
और जब भी तुम बोलो
हम बजा दें ताली,
हाँ एक रस्सी भी
बाँध दो टाँगों में
ताकि कहीं और का रूख
ना कर सकें
बिठा दो पहरे आँखों पर
तुम्हारे दिखाये के सिवा
कुछ देख ना सके,
सिल दो होंठ
कि तुम्हारे चाहे बिना
उसे हिला भी ना सकूं,
जकड़ दो पंखों को
कि लाख कोशिशों के बाद भी
स्वच्छन्द उड़ान भर ना सकूँ,
सुनो...
भले डाल दो काल-कोठारी में
बस एक झरोख़ा खुला रखना
ताकि जब निकले तुम्हारी झाँकी
झंडा फहराने को
तो जी भर उसे निहार सकूँ,
तुम्हारी जीत
और अपनी हार पे
सिर्फ़ और सिर्फ़ कुछ आँसू बहा सकूँ।

-ज्योति साह