Tuesday, September 21, 2021

किसी के समक्ष प्रिय…मत खुलना ...खेमकरण ‘सोमन’

विदा हो रहा हूँ
चाबी ने बस 
इतना ही कहा
जब तक आ न जाऊँ–


किसी के समक्ष प्रिय…मत खुलना
फिर कई चाबियाँ आईं- 
चली गईं
लेकिन न खुला ताला
न ताले का मन
यहाँ तक कि
हथौड़े की मार से टूट गया
बिखर गया
लहूलुहान हो गया
मर गया पर अपनी ओर से खुला नहीं !
पर उसके अंतिम शब्द
दुनिया के सामने खुलते चले गए–
प्रिय… तुमसे जो भी कहा, 
मैंने सुना
बस उसी कहे–सुने की 
लाज रखते हुए
विदा हो रहा हूँ!
प्रेम आकंठ डूबा हुआ
यकीनन… 
लाज रखता है
कहे–सुने गए,
अपने शब्दों की ।
-खेमकरण ‘सोमन’ 

Thursday, September 16, 2021

झूम के आई घटा, टूट के बरसा पानी ...आरज़ू लखनवी

किसने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी
झूम के आई घटा, टूट के बरसा पानी

कोई मतवाली घटा थी कि जवानी की उमंग
जी बहा ले गया बरसात का पहला पानी

टिकटिकी बांधे वो फिरते है ,में इस फ़िक्र में हूँ
कही खाने लगे चक्कर न ये गहरा पानी

बात करने में वो उन आँखों से अमृत टपका
आरजू देखते ही मुँह में भर आया पानी

ये पसीना वही आंसूं हैं, जो पी जाते थे तुम
"आरजू "लो वो खुला भेद , वो फूटा पानी

-आरज़ू लखनवी

Friday, September 3, 2021

चराग़ाँ हर एक घर के लिये ....दुष्यंत कुमार


कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये

यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये

न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये

जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये.
-दुष्यंत कुमार

मयस्सर=उपलब्ध, मुतमईन=संतुष्ट, मुनासिब=ठीक 

Thursday, September 2, 2021

मैं तुझे फिर मिलूँगी ....अमृता प्रीतम


मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं
शायद तेरे कल्पनाओं
की प्रेरणा बन
तेरे केनवास पर उतरुँगी
या तेरे केनवास पर
एक रहस्यमयी लकीर बन
ख़ामोश तुझे देखती रहूँगी
मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं

या सूरज की लौ बन कर
तेरे रंगो में घुलती रहूँगी
या रंगो की बाँहों में बैठ कर
तेरे केनवास पर बिछ जाऊँगी
पता नहीं कहाँ किस तरह
पर तुझे ज़रुर मिलूँगी

या फिर एक चश्मा बनी
जैसे झरने से पानी उड़ता है
मैं पानी की बूंदें
तेरे बदन पर मलूँगी
और एक शीतल अहसास बन कर
तेरे सीने से लगूँगी

मैं और तो कुछ नहीं जानती
पर इतना जानती हूँ
कि वक्त जो भी करेगा
यह जनम मेरे साथ चलेगा
यह जिस्म ख़त्म होता है
तो सब कुछ ख़त्म हो जाता है

पर यादों के धागे
कायनात के लम्हें की तरह होते हैं
मैं उन लम्हों को चुनूँगी
उन धागों को समेट लूंगी
मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं
मैं तुझे फिर मिलूँगी!! 
-अमृता प्रीतम


Monday, August 30, 2021

कन्हैया ...पुष्पा कुमारी "पुष्प"

लघुकथा
....
"सुनो!.तुम मुन्ना को कन्हैया बना उसे लेकर जन्माष्टमी के पंडाल में चली जाना।"
अपना मोबाइल और गाड़ी की चाबी उठा वह चलने को हुआ लेकिन पत्नी ने टोक दिया..
"आप किसी जरूरी काम से कहीं जा रहे हैं क्या?"
"मेरे दोस्त ने कॉकटेल पार्टी रखा है!.मैं वहीं जा रहा हूंँ।"
"आपसे एक बात कहनी थी।"
"क्या?"
"मुन्ना ने कन्हैया बनने से इनकार कर दिया है।"
"क्यों? कल ही तो उसके लिए इतना महंगा कन्हैया वाला ड्रेस लाया हूंँ!.उसे वह ड्रेस पसंद नहीं आया क्या?"
"कह रहा है कि,.मैं कन्हैया हो ही नहीं सकता!"
"क्यों नहीं हो सकता?..मेरा राजा बेटा है वो!"
लगभग पांच-छ: वर्ष के अपने इकलौते बेटे की हर ख्वाहिश पूरी करने वाला हैरान हुआ क्योंकि वह कई बार प्यार से उसे कन्हैया ही तो बुलाता था।
"कहता है कि,.कन्हैया तो दूध-छाछ पीने वाले नंद बाबा का पुत्र था!.शराब पीने वाले का नहीं।"
पति पत्नी के बीच कुछ देर के लिए एक गहरा सन्नाटा छा गया और उस सन्नाटे को भंग करते हुए उसने गाड़ी की चाबी वापस रख दी।

-पुष्पा कुमारी "पुष्प"  

काश कि चित्रकार होती ....निधि सक्सेना

काश कि चित्रकार होती
तो इन चरणकमलों को अपनी कूची से उकेरती
यूँ खो जाती इनमें..
काश कि मूर्तिकार होती
तो मूर्ति गढ़ती
यूँ नाता जोड़ती इनसे..
काश कि कवि होती
काव्य रचती
यूँ सुख पाती ..
परन्तु मैं अकिंचन
न रंग न शब्द न छैनी
केवल भावनाएं हैं
वो भी कभी उफनती किलकती
कभी लड़खड़ाती
वही अर्पित करती हूं श्रीहरि
अपने अंक लगाए रखना
तुममें ही डूबूं तिरुं
प्रेम की अलख जगाए रखना...
-निधि सक्सेना

Tuesday, August 24, 2021

गांधारी के श्राप के कारण अफगानिस्तान का हुआ है ये हाल, इतिहास दे रहा है इस बात की गवाही

 गांधारी के श्राप के कारण अफगानिस्तान का हुआ है ये हाल,
इतिहास दे रहा है इस बात की गवाही



अफगानिस्तान पर अब तालिबान का कब्जा हो चुका है. अफगानिस्तान में चारो तरफ खून खराबा और हाहाकार मचा हुआ है. तालिबान अब अपना असली चेहरा दिखा रहा है. उसकी क्रूरता बढ़ती जा रही है. दूसरे देश और खुद अफगानिस्तान के लोग अब वहां एक पल भी रहना नहीं चाहते हैं. अफगानिस्तान में तालिबान का ये आतंक देख गांधारी का वो श्राप याद आ रहा है, जो उन्होंने अपने भाई शकुनी को दिया था. इस समय गांधारी के उस श्राप की फिर से चर्चा बढ़ गई है. तो चलिए हम आपको बताते हैं क्या है गांधारी से भारत का कनेक्शन और क्या था गांधारी का श्राप.

महाभारत काल के श्राप की वजह से जल रहा है अफगानिस्तान

महाभारत की प्रभावशाली महिला पात्रों जब बात आती है तो उसमें गांधारी का नाम भी लिया जाता है. गांधारी हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र की पत्नी और दुर्योधन की मां थी. शकुनि गांधारी का भाई था. गांधारी का संबंध गांधार से था जिसे आज कंधार कहा जाता है. जो अफगानिस्तान में स्थित है. गांधारी के पिता का नाम सुबल था. गांधार राज्य से संबंध होने के कारण ही गांधारी कहा जाता था. राजा धृतराष्ट्र के अंधे होने के कारण विवाहोपरांत ही गांधारी ने भी आंखों पर पट्टी बांध ली थी. गांधारी पतिव्रता स्त्री थीं.
महाभारत के युद्ध में कौरवों की पराजय हुई थी. महाभारत के युद्ध में गांधारी के सभी 100 पुत्रों की मृत्यु हो गई थीं. महाभारत का युद्ध जब समाप्त हुआ है और महल में जब गांधारी ने अपने सभी पुत्रों के शवों को देखा तो वह क्रोध में आ गईं. गांधारी ने शकुनि को श्राप दिया था कि जिस तरह से तुमने मेरे 100 पुत्रों को मरवा दिया उसी तरह से तुम्हारे देश में कभी शांति नहीं होगी.

गांधारी ने दिया था शकुनी और गांधार को श्राप

आपकों बता दें कि कहा जाता है कि भीष्म ने गांधारी से धृतराष्ट्र की शादी के लिए सुबल के परिवार को नष्ट कर दिया था, जब पिता की मृत्यु के बाद शकुनी राजा बना तो उसने भीष्म के परिवार से बदला लेने के लिए चाल चली और कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत का युद्ध कराया, जिसमे भीष्म सहित उनका पूरा परिवार नष्ट हो गया और सिर्फ पांडव ही जीवित बचे, ऐसे में गांधारी ने शकुनी को श्राप दिया कि “मेरे 100 पुत्रो को मरवाने वाले गांधार नरेश तुम्हारे राज्य में कभी भी शांति नहीं रहेगी.”

Monday, April 5, 2021

जो एक डोर से बंधे है ...सुरेन्द्रनाथ कपूर


क्या चाहता है मन ?
क्यों इतना उदास है?
वह मिल के नहीं मिलते
जिनसे 
मिलने की प्यास है!
अपने को खोजता है 
किसी और की छाया में
रहता है खुद से दूर
मगर  गैरों के पास है!
खुशियों के सारे पल
इसी
वहशत में गुज़र जाते है
साध अधूरी रहने का सोग
हम रोज़ ही मनाते हैं!
इतना 
समझना काफी है
जो भी होता है
आकस्मिक नहीं ,
निर्धारित है।
हर चीज़ का  समय है
किसी सूत्र से 
संचालित है।
मौसम भी रंग बदलते हैं
चाँद सूरज भी 
रोज़ ढलते हैं
कुछ लोग चले जाते हैं
कुछ मीत नए मिलते है!
जो बेगाने है 
तुम्हारे थे ही नहीं,
खुद ही चले जायेंगे।
जो
एक डोर से बंधे है
वह
जाकर भी लौट आयेगे।
अपना चाहा
हो जाये तो बहुत अच्छा,
न हो ,तो उससे बेहतर।
शाश्वत सत्य है,
यकीन कर लो तो सोना है
वर्ना  गर्द से भी बदतर!
- सुरेन्द्रनाथ कपूर


Friday, February 12, 2021

मै भारत-भूमि ! ...मंजू मिश्रा

मै भारत-भूमि !
ना जाने कब से
ढूंढ रही हूँ
अपने हिस्से की
रोशनी का टुकड़ा….
लेकिन पता नहीं क्यो
भ्रष्ट अवव्यस्था के ये अँधेरे
इतने गहरे हैं
कि फ़िर फ़िर टकरा जाती हूँ
अंधी गुफा की दीवारों से…
बाहर निकल ही नहीं पाती
इन जंजीरों से,
जिसमे मुझे जकड़ कर रखा है
मेरी ही संतानों ने

उन संतानों ने
जिनके पूर्वजों ने
लगा दी थी
जान की बाज़ी
मेरी आत्मा को
विदेशियों की चंगुल से
मुक्त कराने के लिए

हँसते हँसते
खेल गए जान पर
शहीद हो गये
माँ की आन पर
एक वो थे
जिनके लिए
देश सब कुछ था
देश की आजादी
सबसे बड़ी थी
एक ये हैं
जिनके लिए
देश कुछ भी नहीं
देश का मान सम्मान
कुछ भी नहीं
बस कुछ है तो
अपना स्वार्थ,
अपनी सम्पन्नता और
अपनी सत्ता ……

-मंजू मिश्रा


Thursday, February 11, 2021

मैं अदना नारी .....नीलम गुप्ता

मैं अदना नारी
सब कहते है कैसे लिख लेती हो
कितना हुनर है
मैं मुस्करा जाती हूं
और तुम्हें एक राज बताती हूं
लिखने को हुनर नही दिल चाहिए
शब्द नही समझ चाहिए
कोई कहानी नहीं
बस दर्द चाहिएं
कोई बनावट नही
असलियत चाहिएं

कौन क्या लिखता
कैसे लिखता
मैं नही जानती
बस दिल ने जो कहा
मैं बस वहीं  मानती 

कोई जादू नहीं है ये
ना कोई काबिलियत हैं ये
बस जज्बात से भरा दिल हैं
जिसे आपके समझ में उभारती
बिना जज्बात के बात नहीं बनती
बात बिन कायनात नही रचती

फिर मैं तो कलमकार हूं दोस्तों
जज्बात बिन मेरी
कलम भी ना हिलती
कुछ अनकहे ख्याब
कुछ सबके विचार
कुछ नादानियां
कुछ खामोशियां
कुछ अधूरा प्यार
कभी मां का दुलार
तो कभी हसीं की बौछार ले आती हूं
और अंदर तक भाव भिवोर हो जाती हूं

मैं एक अदना सी नारी
लिख कर कुछ जज़्बात
खुशियां बिखेर देती हूं
आपके संग संग
अपने अधरों पर भी
एक मुस्कान सहेज लेती हूं....

स्वरचित

©नीलम गुप्ता 

Wednesday, February 10, 2021

किसी का दिल ना तोड़ों तुम ...सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

निज टूटे हुए दिल ले, सभी मेरे पास आते हैं।
हम जोड़ेगे इसे ठीक से, लिए विश्वास आते हैं।

भरी है टोकरी दिल के, टुकड़े से यहां देखो,
इन्हीं टुकड़ों को ले मायुस, बड़ी उदास आते हैं।

जुटाकर दिल के टुकड़े को,सजाये हैं करीने से,
न कोई उल्टा-सीधा हो, यही एहसास आते हैं।

इसे रख सामने अपने, मरम्मत करने बैठे हैं,
मगर ये तो बड़े घायल,गुमे-हवास आते हैं।

लगाते हम हैं जब टांके,लहू इनसे टपकते हैं,
जो इनसे गिरते हैं लोहू, नहीं हमें रास आते हैं।

जोड़े ये नहीं जुटते ,भला कैसे इन्हें छोड़े,
खुदा भी हैं, तो क्या हैं हम,हो निराश जाते हैं।

अगर जुटते ये हमसेे,तो हम भी जोर कुछ करते ,
सभी जाते खुशी मन से,जो हो उदास आते हैं।

मनुज तुझसे है मिन्नत अब, किसी का दिल नहीं तोड़ो,
तुम अपने दिल में यह सोचो,ये मुद्दे खास आते हैं।

-सुजाता प्रिय 'समृद्धि' 

Tuesday, February 9, 2021

तुम मसीहा थे जानिब था हर फैसला तेरा ..पावनी जानिब

शर्म थी वो तुम तो शर्म कर ही सकते थे
दामन में उसके इज्जतें भर भी सकते थे।

माना के बेबसी में वो बदन बेचती रही
समझौता हालातों से तुम कर भी सकते थे।

लाज शर्म की उसने तुम्हें पतवार सौंप दी
रहमो करम की उसपे नजर कर भी सकते थे।

रिश्ता बनाके उसका तुम हाथ थाम लेते
कोठा कहते हो उसे घर कर भी सकते थे।

उसका गुनाह न अपना गिरेबां भी झांकिए
इंसान बनके तुम खुदा से डर भी सकते थे।

तुम मसीहा थे जानिब था हर फैसला तेरा
आंचल उढ़ाके तुम बदन को ढक भी सकते थे।

-पावनी जानिब सीतापुर 

Wednesday, January 27, 2021

याद के पहरों में जीते हैं ...अस्तित्व "अंकुर"

तुम्हारे साथ गुज़री याद के पहरों में जीते हैं,
हमें सब लोग कहते हैं कि हम टुकड़ों में जीते हैं,

हमें ताउम्र जीना है बिछड़ कर आपसे लेकिन,
बचे लम्हों की सौगातें चलो कतरों में जीते हैं,

वही कुछ ख्वाब जिनको बेवजह बेघर किया तुमने,
दिये उम्मीद के लेकर मेरी पलकों पे जीते हैं,

तुम्हारी बेरुखी पत्थर से बढ़कर काम आती है,
मेरे अरमान फिर भी काँच के महलों में जीते हैं,

जमाने की नज़र में हो चुके हैं खाक हम लेकिन,
हमें मालूम है हम आपकी नज़रों में जीते हैं,

मेरे हर शेर पर “अंकुर” यहाँ कुछ दिल धड़कते हैं,
यहाँ सब ज़िंदगी को हो न हो खतरों में जीते हैं,

-अस्तित्व "अंकुर"

 

Tuesday, January 26, 2021

काव्य ककहरा ....डॉ. अंशु सिंह


काव्य ककहरा जिससे सीखा
भूल गई उन हाथों को
स्वार्थ सिद्धि के खातिर अपनी
तोड़ दिया सब नातों को
कलम पकड़ना नहीं जानती
शब्द शब्द सिखलाये थे
हर पल हर क्षण साथ निभाकर
अक्षर ज्ञान कराये थे
जब-जब उसने काव्य रचा
वो पल पल साथ निभाये थे
शब्द शब्द को सदा सुधारे
अतुलित नेह दिखाये थे
मान दिया समकक्ष सुता के
गुरु सम ज्ञान सिखाये थे
स्वागत किया बहन सा घर में
सारा फ़र्ज़ निभाये थे
प्रथम बार जब मान वो पाई
गर्व सहित मुसुकाये थे
जिन गीतों में मान मिला था
वो भी वही सिखाये थे
फिर भी छोड़ चली चुपके से
दर्द से अति सकुचाये थे
काश वो हमसे कह कर जाती
हम ही समझ न पाये थे
बहुरूपिया के संग गई वो
कुछ भी न कर पाये थे
कह कर अपना सिक्का खोटा 
बहुत बहुत पछताये थे 

-डॉ. अंशु सिंह 

Monday, January 25, 2021

मैं अच्छी नहीं हूं ...पूजा गुप्ता


मैं अच्छी नहीं हूं
मुझे मेहँदी लगानी नहीं आती।
ना ही रंगोली बनानी आती।
मैं बंद बोतल के ढक्कन जैसी।
मुझे दही जमानी नहीं आती।
ना कभी व्रत की पति के लिए।
ना कभी बेटा के लिए।
मैं सब जैसी औरत नहीं।
मुझे गढ़ी कहानी नहीं आती।
मुझे ढोल बजाना नहीं आता।
ना नाचना गाना आता।
मैं अल्हड़ सी मस्तानी हूँ।
कोई हुनर जमाना नहीं आता।
लोगो के हँसी का पात्र हूँ।
मुझे अंदाज में रहना नहीं आता।
मैं बंद बोतल के ढक्कन जैसी।
मुझे दही जमाना नहीं आता।
सब कहते हैं भजन करो।
पर मुझे पुण्य कमाना नहीं आता।
मैं अल्हड़ सी मस्तानी हूँ।
कोई हुनर जमाना नहीं आता।
कुछ खूबी हो तो मैं लिखूँ।
मुझे अच्छा बन जाना नहीं आता।
घर की लक्ष्मी हूँ मैं।
पर मुझे नारायण को मनाना नहीं आता।
साधारण हूँ बेबाक भी हूँ मैं।
मुझे किसी को जलाना नहीं आता।
अंतर्मन की अंतर्वेदना हूँ मैं।
मुझे मजाक बनाना नहीं आता।
मैं बंद बोतल के ढक्कन जैसी।
मुझे दही जमाना नहीं आता।
मैं अल्हड़ सी मस्तानी हूँ।
कोई हुनर जमाना नहीं आता।
[स्वरचित]
-पूजा गुप्ता  

मिर्ज़ापुर (उत्तर प्रदेश) 

Friday, January 22, 2021

मरने की चाहत होती जाती है ...अँजू डोकानिया

मुहब्बत क्या हुई  जैसे  इबादत होती जाती है|
कि सजदे में झुकने की आदत होती जाती है||

चलाओ तीर कितने भी सितम चाहे करो जितने|
जो उल्फत हो गई इक बार तो बस  होती जाती है ||

वृहद सरिता  प्रेम मेरा लहर सा इश्क़ है तेरा|
जो उतरोगे तले इसके कयामत होती जाती है||

मैं मुजरिम हूँ करो पेशी मेरी इश्क़ ए अयानत में|
किया है जुर्म उल्फत का ये तोहमत होती जाती है||

मुहब्बत नाम है "अँजू" शिद्दत का, वफाओं का|
चले जो इस डगर मरने की चाहत होती जाती है||

-अँजू डोकानिया 

Thursday, January 21, 2021

लड़की और चांद ...ज्याति खरे


चाँद
चुपके से 
खिड़की के रास्ते 
कमरे में
रोज आता है 
लड़की 
अपने करीब आता देख
मुस्कुराती है
देखती है देर तक 
छू लेती है
मन ही मन उसे
चाँद 
लड़की से कुछ कहने का
साहस नहीं जुटा पाता
लड़की 
संकोच की जमीन पर
चुपचाप बैठी रहती है
चाँद और लड़की
युगों युगों से
ऐसे ही मिलते हैं
खिड़की के रास्ते
प्रेम
ऐसा ही खूबसूरत होता है
-"ज्योति खरे " 



Tuesday, January 19, 2021

रंगों का मौसम ...मंजू मिश्रा

रंगों का मौसम 

पतंगों का मौसम 

तिल-गुड़ की सौंधी मिठास का मौसम 

लो शुरू हुआ नया साल  ।१।


मौसम का मिज़ाज बदला

हवा का अन्दाज़ 

और बदली सूर्य की चाल 

लो शुरू हुआ नया साल ।२।


उड़ती पतंगें यूँ लगें 

मानो आसमाँ पे बिछ गयी 

रंगों की तिरपाल 

लो शुरू हुआ नया साल ।३।

-मंजू मिश्रा

Monday, January 18, 2021

रज़ा ...डॉ. नवीनमणि त्रिपाठी


जिनको तेरी रज़ा नहीं मिलती ।
आशिक़ी को हवा नहीं मिलती ।।
इश्क़ गर बेनक़ाब होता तो।
हिज्र की ये सज़ा नहीं मिलती ।।
ज़ीस्त है जश्न की तरह यारो ।
ज़िन्दगी बारहा नहीं मिलती ।।
कितनी बदली है आज की दुनिया ।
आंखों में अब हया नहीं मिलती ।।
नेकियाँ डाल दे तू दरिया में ।
बेवफ़ा से वफ़ा नहीं मिलती ।।
कुछ तो महफ़िल का रंग बदला है ।
घुँघरुओं की सदा नहीं मिलती ।।
मैं ख़तावार तुझको कह देता ।
क्या करूँ जब ख़ता नहीं मिलती ।।
छोड़ हर काम बस इबादत हो ।
यूँ ख़ुदा की दया नहीं मिलती ।।
वक्ते रुख़सत जहाँ हो तय साहब ।
माँगने पर क़ज़ा नहीं मिलती ।।
कब से क़तिल हुआ ज़माना ये ।
जुल्म की इब्तिदा नहीं मिलती ।।
वो तो नाज़ुक मिज़ाज थी शायद ।
आजकल जो खफ़ा नहीं मिलती ।।
- डॉ.नवीनमणि त्रिपाठी

2122 1212 22 

Sunday, January 17, 2021

स्त्री विमर्श ...निधि सक्सेना

एक युवा पुरुष को
अलग अलग उम्र की स्त्रियां
अलग अलग स्वरूप में देखेंगी..
नन्ही बच्ची उसे पिता या भाई सा जानेगी..
युवा होगी तो झिझकेगी सकुचायेगी
उसमें सखा या मित्र खोजेगी..
प्रौढ़ा होगी तो उसे अनायास ही वो अपने पुत्र सा दिखाई देगा..
और वृद्धा हुई तो उसे देखते ही उसका पोपला मुख कह उठेगा
बिल्कुल मेरे पोते सा है ..
परंतु एक युवा स्त्री
अलग अलग उम्र के पुरुषों को
केवल एक स्वरूप में दिखाई देगी
स्त्री स्वरूप में
विशुद्ध स्त्री स्वरूप...
कि स्त्रियां उम्र के हिसाब से परिपक्व होना जानती हैं..
- निधि सक्सेना

Saturday, January 16, 2021

बहुत कमा लिया .....नीलम गुप्ता

बहुत कमा लिया
सब कहते है
कितना लिखती हो?
इतना क्यों लिखती हो?
लिख कर क्या कमा लिया?
कौन सा खेत उखाड़ लिया?
शायद सच ही कहते होंगे
ये उनके तजुर्बे होंगे
हर चीज में नफा
नुकसान देखते है
हर किसी को
तराजू में तोलते है
तो बता दूं हमनें भी बहुत
दौलत रख ली
जेबें दुआओं से भर लीं
कितनों के चेहरे पर मुस्कान ला दी
कितनो की जिंदगी दुहरा दीं
कितनों के दिल में बस गई
उनको मेरी आदत सी लग गई
कविता ही मेरी, जिंदगी हो गई
अब ये असल में मायने हो गई
जिस दिन दुनिया से जाऊंगी
कुछ दुआएं भी ले जाऊंगी
लोग कमा लिए इतने
कि कुछ तो मेरे जाने
से गमगीन रहेंगे
मेरी कविता को ही
मेरे लिए गुनगुना देंगे
स्वरचित

-नीलम गुप्ता 

Friday, January 15, 2021

क्या फायदा......डॉ. अंशु सिंह

 
बोझ लगता हो ग़र जिंदगी मे कोई 
यादें उसकी सजाने से क्या फ़ायदा 

चुभ रहा हो जो बन करके तीखा सुआ 
प्यार उस पर लुटाने से क्या फ़ायदा 

जिसको पल भर मे बाहर किया झाड़ के 
कविता उस पर बनाने से क्या फ़ायदा 

कच्चा धागा ही था , टूट पल में गया 
प्यार को फिर बढ़ाने से क्या फ़ायदा 

अर्थ समझे न जब ज़िन्दगी के कभी 
व्यर्थ  जीवन गँवाने  से क्या फ़ायदा 

मित्र बन मोल आँसू के समझो कभी 
बात केवल बनाने से क्या फ़ायदा 

सार जीवन के तुम यदि समझ न सके 
स्वप्न गिरवी रखाने से क्या फ़ायदा 

जिसने जीवन की निस्सारता जान ली 
त्याग कर उसको जाने से क्या फ़ायदा 

मोह माया ही जब जग के रिश्ते अगर 
जग के रिश्ते  निभाने से क्या  फ़ायदा 

जग को मानो ना मानो ख़ुशी आपकी 
जग से ग़ुस्सा दिखाने से क्या फायदा .
-डॉ. अंशु सिंह

Thursday, January 14, 2021

बदलाव..... संजय भास्कर

घर से दफ्तर के लिए
निकलते समय रोज छूट
जाता है मेरा लांच बॉक्स और साथ ही
रह जाती है मेरी घड़ी
ये रोज होता हो मेरे साथ और
मुझे लौटना पड़ता है उस गली के
मोड़ से
कई वर्षो से ये आदत नहीं बदल पाया मैं
पर अब तक मैं यह नहीं
समझ पाया
जो कुछ वर्षों से नहीं हो पाया
वह कुछ महीनो में कैसे हो पायेगा
अखबार के माध्यम से की गई
तमाम घोषणाएं
समय बम की तरह लगती है
जो अगर नहीं पूरी हो पाई
तो एक बड़े धमाके के साथ
बिखर जायेगा सबकुछ......!!
- संजय भास्कर

Wednesday, January 13, 2021

हम भी कहां सुधरते हैं .....मेजर (डॉ.)शालिनी सिंह

वो नहीं बदलता तो हम भी कहां सुधरते हैं
वो घात करता है तो हम ऐतबार करते हैं
उकता गये हैं अब उन्हीं पुराने जख्मों से
तुम नया वार करो हम नईं आह भरते हैं
उसकी हर चाल में कई चाल छुपी होती हैं
समझते हैं हम पर कहां बचाव करते हैं
ठगे जाते हैं हर बार इक ही तरीके से
कमाल उसका है या हम कमाल करते हैं
राज़ जान लेते हैं उसकी आंखें पढ़ कर
फिर क्यूं उससे फिजूल सवाल करते हैं
हर फसाद की जड़ है जिद्दी यह दिल मेरा
लौटा लाता है जब भी उससे तौबा करते हैं
झूठे इकरार की फितरत है या फिर लत उसको
हर किसी से कहता है सिर्फ तुमसे प्यार करते हैं
काश आ जाये दर्द महसूस करने की सलाहियत उसे
समझ जायेगा खुद कि आखिर मुहब्बत किसे कहते हैं
- मेजर (डॉ.)शालिनी सिंह