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Friday, June 21, 2019

ज़माने का चलन .....डॉ. ऋचा सत्यार्थी

हर दिशा में लम्हा-लम्हा बो गया है
कह के हमसे अलविदा वह जो गया है

कर लिए सूरज से समझौते घटा ने
उजली सुबह का वादा सो गया है

इस शहर में ख़ुशनुमा है आज मौसम
यह समां रंगीन, लेकिन, खो गया है

था किनारे का हंसी मंज़र छलावा
गम के सागर में डुबो हमको गया है

दुश्मनों से प्यार, नफ़रत दोस्तों से
यह ज़माने का चलन हो गया है

-डॉ. ऋचा सत्यार्थी

Wednesday, September 17, 2014

नयी पीढ़ी का गीत......दुष्यन्त कुमार



  
जो मरुस्थल आज अश्रु भिंगो रहे हैं
भावना के बीज जिस पर बो रहे हैं
सिर्फ मृग-छलना नहीं वह चमचमाती रेत!

क्या हुआ जो युग हमारे आगमन पर मौन?
सूर्य की पहली किरण पहचानता है कौन?
अर्थ कल लेंगे हमारे आगमन का संकेत।

तुम न मानो शब्द कोई है नामुमकिन
कल उगेंगे चांद-तारे, कल उगेगा दिन,
कल फ़सल देंगे समय को, यही "बंजर खेत"।

-दुष्यन्त कुमार
....मधुरिमा से

Saturday, September 6, 2014

चाहत के हक़दार नहीं थे......................अमर मलंग





चाहत के हक़दार नहीं थे

उल्फ़त के बाज़ार नहीं थे


कैसे होती ये ग़ज़ल मुकम्मल,

शेर भी कुछ दमदार नहीं थे


बहुत तलाशा मिली न मंज़िल,

रास्ते भी हमवार नहीं थे


चमन की लूटी जिसने ख़ुशबू,

फूल ही है, वो ख़ार नहीं थे


गीत ख़शी के क्या गाते हम,

साथ हमारे वो यार नहीं थे


महफ़िल में जो घाव मिले हैं,

दुश्मन के वो वार नहीं थे


क्या हुआ जो पाई ठोकर.

अच्छे के तो आसार नहीं थे

-अमर मलंग

........... मधुरिमा से

Friday, September 5, 2014

कई ज़माने देखे..................-गोविन्द भारद्वाज






हमने कई ज़माने देखे,
दोस्त नये-पुराने देखे.

नशे मुक्त शहरों में हमने,
गली-गली मयखाने देखे

प्रेम नगर की इस बस्ती में
राह खड़े दीवाने देखे.

रपट कहां कोई लिखवाए
गुण्डो के घर थाने देखे

इन वीरानी-सी आँखों में
ख्वाब कई सुहाने देखे

बेच ज़ायदाद ब़ुज़ुर्गों की
दौलतमंद सयाने देखे

-गोविन्द भारद्वाज
 
........... मधुरिमा से

Wednesday, August 20, 2014

वो ज़िंदगी सवाल हुई...........दुष्यन्त कुमार


बहुत सम्भाल के रक्खी तो पाएमाल हुई
सड़क पे फेंक दी तो जिन्दगी निहाल हुई

बड़ा लगाव है इस मोड़ को निगाहों से
कि सबसे पहले यहीं रोशनी हलाल हुई

कोई निज़ात की सूरत नहीं रही, न सही
मगर निज़ात की कोशिश तो एक मिसाल हुई

मेरे ज़ेहन पे ज़माने का वो दबाव पड़ा
जो एक स्लेट थी वो ज़िंदगी, सवाल हुई

समुद्र और उठा, और उठा, और उठा
किसी के वास्ते ये चांदनी वबाल हुई

उन्हें पता भी नहीं है कि उनके पांवो से
वो खूं बहा है कि ये गर्द भी गुलाल हुई

मेरी ज़ुबान से निकली तो सिर्फ नज़्म बनी
तुम्हारे हाथ में आई तो एक मशाल हुई

पाएमालः रौंदी हुई
-दुष्यन्त कुमार
प्राप्ति स्रोतः मधुरिमा

Thursday, August 14, 2014

सरहद हमसे वफ़ा चाहती है............सागर 'सयालकोटी'




   सरहद हमसे क्या चाहती है
सरहद हमसे वफ़ा चाहती है

दीवारों का होना बहुत ज़रूरी है
सरहद ऐसी रज़ा चाहती है

माज़ी को अब भुलाना ही होगा
सरहद ताज़ा हवा चाहती है

मुश्तरका आसमानों से पूछो
सरहद रक़्से अदा चाहती है

अम्नों-अमां से मसाइल का हल हो
सरहद आसी फ़ज़ा चाहती है

सबके सबकी ख़ुशियां मुबारक
सरहद सबकी दुआ चाहती है

'सतलज', 'रावी', 'ब्यासा' का पानी
सरहद 'सागर' मज़ा चाहती है

-सागर 'सयालकोटी'
स्रोतः मधुरिमा

Thursday, July 17, 2014

तो घर नहीं लौटी..........ज़हीर कुरेशी

 















मैं जानता हूं कि
फिर उम्र भर नही लौटी
नदी पहाड़ से बिछुड़ी
तो घर नहीं लौटी।

लहर ने वादा किया था कि
तट को छुएगी ज़रूर,
है तट प्रतीक्षा में,
लहर नहीं लौटी।

खिले हजारों की संख्या में
फूल सूर्यामुखी,
फिर उस तरह की
कभी दोपहर नहीं लौटी।

इतना तो तय था कि
अस्मत लुटा के लौटेगी,
सुबह की भूली
अगर रात भर नहीं लौटी।

वो कर रही है परिस्कार
भूल अपनी का,
उधर से चल पड़ी थी,
इधर नहीं लौटी।

विचारने के अलावा भी
क्या किया जाए,
हमारी आँखो तलक नींद
अगर नहीं लौटी।

मनुष्य-लोक को दौड़ा
तो स्वर्ग-लोक गए,
वहां पहुंचने की
अब तक खबर नहीं लौटी।

-ज़हीर कुरेशी

स्रोतः मधुरिमा

Wednesday, July 16, 2014

सहज सरल हो गया...........इब्बार रब्बी














वर्षा में भींगकर
सहज सरल हो गया,
गल गई सारी किताबें
मैं मनुष्य हो गया।

ख़ाली-ख़ाली था
जीवन ही जीवन हो गया,
मैं भारी-भारी
हलका हो गया।

बरस रही हैं बूंदें
इनमें होकर
ऊपर को उठा
लपक कर तना।

पानी का पेड़
आसमान हो गया
वर्षा में भींगकर
मैं महान हो गया।


-इब्बार रब्बी


स्रोतः मधुरिमा