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Tuesday, March 17, 2020

मिलावट ..गोपाल दास नीरज


1.
मौसम कैसा भी रहे कैसी चले बयार
बड़ा कठिन है भूलना पहला-पहला प्यार
2.
भारत माँ के नयन दो हिन्दू-मुस्लिम जान
नहीं एक के बिना हो दूजे की पहचान
3. 
बिना दबाये रस न दें ज्यों नींबू और आम
दबे बिना पूरे न हों त्यों सरकारी काम
4.
अमरीका में मिल गया जब से उन्हें प्रवेश
उनको भाता है नहीं अपना भारत देश
5.
जब तक कुर्सी जमे खालू और दुखराम
तब तक भ्रष्टाचार को कैसे मिले विराम
6.
पहले चारा चर गये अब खायेंगे देश
कुर्सी पर डाकू जमे धर नेता का भेष
7.
कवियों की और चोर की गति है एक समान
दिल की चोरी कवि करे लूटे चोर मकान
8.
गो मैं हूँ मँझधार में आज बिना पतवार
लेकिन कितनों को किया मैंने सागर पार
9.
जब हो चारों ही तरफ घोर घना अँधियार
ऐसे में खद्योत भी पाते हैं सत्कार
10.
जिनको जाना था यहाँ पढ़ने को स्कूल
जूतों पर पालिश करें वे भविष्य के फूल
11.
भूखा पेट न जानता क्या है धर्म-अधर्म
बेच देय संतान तक, भूख न जाने शर्म
12.
दोहा वर है और है कविता वधू कुलीन
जब इसकी भाँवर पड़ी जन्मे अर्थ नवीन
13.
गागर में सागर भरे मुँदरी में नवरत्न
अगर न ये दोहा करे, है सब व्यर्थ प्रयत्न
14.
जहाँ मरण जिसका लिखा वो बानक बन आए
मृत्यु नहीं जाये कहीं, व्यक्ति वहाँ खुद जाए
15.
टी.वी.ने हम पर किया यूँ छुप-छुप कर वार
संस्कृति सब घायल हुई बिना तीर-तलवार
16.
दूरभाष का देश में जब से हुआ प्रचार
तब से घर आते नहीं चिट्ठी पत्री तार
17.
आँखों का पानी मरा हम सबका यूँ आज
सूख गये जल स्रोत सब इतनी आयी लाज
18.
करें मिलावट फिर न क्यों व्यापारी व्यापार
जब कि मिलावट से बने रोज़ यहाँ सरकार
-गोपालदास नीरज


Friday, October 11, 2019

स्वप्न झरे फूल से ...गोपालदास "नीरज"

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई
पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई
चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई

गीत अश्क बन गए छंद हो दफन गए
साथ के सभी दिऐ धुआँ पहन पहन गए
और हम झुके-झुके मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा
क्या जमाल था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ़ जमीन और आसमाँ उधर उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा

एक दिन मगर यहाँ ऐसी कुछ हवा चली
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली
और हम लुटे-लुटे वक्त से पिटे-पिटे
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ

हो सका न कुछ मगर शाम बन गई सहर
वह उठी लहर कि ढह गये किले बिखर-बिखर
और हम डरे-डरे नीर नैन में भरे
ओढ़कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

माँग भर चली कि एक जब नई-नई किरन
ढोलकें धुमुक उठीं ठुमक उठे चरन-चरन
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन चली दुल्हन
गाँव सब उमड़ पड़ा बहक उठे नयन-नयन

पर तभी ज़हर भरी गाज़ एक वह गिरी
पुँछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी
और हम अजान से दूर के मकान से
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।
- गोपालदास "नीरज"

Thursday, April 11, 2019

मुश्किलों में मुस्कुराना धर्म है......गोपालदास "नीरज"

जिन मुश्किलों में मुस्कुराना हो मना,
उन मुश्किलों में मुस्कुराना धर्म है।

जिस वक़्त जीना गैर मुमकिन सा लगे,
उस वक़्त जीना फर्ज है इंसान का,
लाजिम लहर के साथ है तब खेलना,
जब हो समुन्द्र पे नशा तूफ़ान का
जिस वायु का दीपक बुझना ध्येय हो
उस वायु में दीपक जलाना धर्म है।

हो नहीं मंजिल कहीं जिस राह की
उस राह चलना चाहिए इंसान को
जिस दर्द से सारी उम्र रोते कटे
वह दर्द पाना है जरूरी प्यार को
जिस चाह का हस्ती मिटाना नाम है
उस चाह पर हस्ती मिटाना धर्म है।

आदत पड़ी हो भूल जाने की जिसे
हर दम उसी का नाम हो हर सांस पर
उसकी खबर में ही सफ़र सारा कटे
जो हर नजर से हर तरह हो बेखबर
जिस आँख का आखें चुराना काम हो
उस आँख से आखें मिलाना धर्म है।

जब हाथ से टूटे न अपनी हथकड़ी
तब मांग लो ताकत स्वयम जंजीर से
जिस दम न थमती हो नयन सावन झड़ी
उस दम हंसी ले लो किसी तस्वीर से
जब गीत गाना गुनगुनाना जुर्म हो
तब गीत गाना गुनगुनाना धर्म है।
-गोपालदास "नीरज"

Wednesday, July 25, 2018

एक दुनिया का उजड़ना है....गोपालदास "नीरज"


सड़क विस्तार के लिए 
सारे पेड़ों के कटने के बाद 
बस बचे हैं एक नीम और बरगद 
जो अस्सी साल के साथ में 
शोकाकुल हैं पहली बार 

नीम बोला 
परसों जब हरसिंगार कटा था 
तो बहुत रोया बेचारा 
सारे पक्षियों ने भी शोर मचाया 
गिरगिट ने रंग बदले  
गिलहरयां फुदकी 
मगर कुल्हाड़ी नहीं पसीजी 
और फिर वो मेरे से दो पौधे छोड़कर 
जब शीशम कटा ना 
तो लगा कि मैं भी रो दूँगा 
चिड़िया के घौसलो से अंडे गिर गए
गिलहरियों को तो मैंने जगह दे दी 
मगर तोते के बच्चे कोटर से गिरते ही मर गए

बरगद कराहा 
वो मेरे पास में आम, गुंजन और महुआ थे ना 
बेचारे गिड़गिड़ाए कि
हमारी सड़क वाली तरफ की टहनियां काट दो 
सारे पक्षियों ने भी 
चीं-चीं कर गोल-गोल चक्कर काटकर गुज़ारिश की 
कि मत छीनो हमारा घर 
पर पता नहीं ये आदमलोग 
कौनसी ज़बान समझते हैं 
धड़ाम करके कटकर ये नीचे गिरे 
तो ज़मीन कंपकंपाई 
मानो अपनी छाती पीट रही हो 

नीम और बरगद बोले आपस में 
ख़ैर जो हुआ सो हुआ 
अब हम दोनों ही सम्भालेंगे 
पक्षियों से लेकर 
छाया में रूकने वालों को 

अचानक बरगद बोला 
ये विकास करने वाले फिर लौट आए 
कहीं हमें तो नहीं काटेंगे
कहकर बरगद ने जोर से झुरझरी ली 
नीम ने भरोसा दिलाया 
अरे, ऐसे ही आए होंगे 
सड़क तो बन गई है ना 
अब भला क्यों काटेंगे हमें

थोड़ी देर में निशान लगने लगते हैं 
आदमलोग कह रहे हैं 
कि बसस्टॉप के लिए यही सबसे सही जगह हैं 
इन दोनों को काट देते हैं 
छोटा-सा शेड लग जाएगा 
लिख देंगे प्रार्थना बस-स्टैंड 

नीम चिल्लाया 
अरे, मत काटो 
हमारी छाया में बेंच लगा दो 
हवा दे देंगे हम टहनियां हिलाकर 
निम्बोली भी मिलेगी 
और अच्छा लगेगा पक्षियों को देखकर 

बरगद ने हामी भरी 
सारे पक्षी आशंकित से नीचे ताकने लगे 
आर्तनाद बेकार गया 
पहले नीम की बारी आई
आँख में आँसू भर नीम ने टहनियाँ हिलाई
बरगद ने थामा क्षण भर नीम को 
गलबहियाँ डाली दोनों ने 
और धड़ाम से ख़त्म हो गया एक संसार 
अब बरगद देख रहा है 
उन्हें अपने पास आते 
सिकुड़ता है 
टहनियां हिलाता है 
कातर नज़रों से ताकता है इधर-उधर 
पक्षी बोलते-डोलते हैं 
मगर नाशुक्रे आरी रखते हैं 
और फिर सब ख़त्म 

ये नीम और बरगद का क़त्ल नहीं है 
एक दुनिया का उजड़ना है 
बेज़ुबान जब मरते हैं 
तो बदले में 
बहुत कुछ दफ़न हो जाता है !!

-गोपालदास "नीरज"

अंतिम कविता