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Tuesday, March 31, 2020

मन के पलाश ...निशा माथुर

एक सुरमई भीगी-भीगी शाम, 
ओढ़कर चुनर चांदनी के नाम।

सुनो, तुम जरा मेरे साथ तो आओ,
कुछ मौसमों को भी बुला लाओ।
मैं ...... मैं बादल ले आऊं,
और इस भीगी-भीगी शाम में,
गुलमोहरी मधुमास चुराऊं।  

सुनो, तुम आज कुछ बिगड़ो, कुछ बनो, 
और आंधियां भी संग ले आओ।
मैं........मैं चिराग बन जाऊं,
और इस आंधी संग जल-जल के,
अपना विश्वास आजमाऊं।

सुनो, तुम कुछ पल पहाड़ बन जाओ, 
और सन्नाटे से लहरा जाओ।
मैं........मैं धुंधला के सांये-सी मचलूं, 
सन्नाटे में तुम्हारा नाम पुकारूं।

सुनो, तुम आज वक्त बन जाओ,
और मेरे लिए थोड़े ठहर जाओ।
मैं............मैं फिर स्मृतियां छू लूं,
दर्पण में अनुरागी छवियां निहार लूं।

सुनो, तुम आज मेरा आंगन बन जाओ,
और मेरा सपना बनकर बिखर जाओ।
मैं...मैं मन के पलाश-सी खिल जाऊं, 
अनुरक्त पंखुरी-सी झर-झर जाऊं।

सुनो, फिर एक सुरमई भीगी-भीगी शाम, 
ओढ़कर चुनर चांदनी के नाम ।
मैं........तुम्हारी आंखों के दो मोती चुराऊं
और उसमें अपना चेहरा दर्ज कराऊं।

-निशा माथुर

Tuesday, August 7, 2018

राह तकती, वो दो आंखे....निशा माथुर



दरवाजे की चौखट पर
राह तकती, वो दो आंखे, 
मन में आंशकाओं के उठते हुये बवंडर,
दिल मायूसी में डूबा, जैसे कोई खंडहर।
किसी भी अनहोनी को
कर अस्वीकार, 
दिमाग जा पहुंचा संभावनाओं के द्वार।
वो हर एक पल का अब जीना मरना,
कब आयेगा
उसका वो अपना... ???

दरवाजे की चौखट पर
राह तकती, वो दो पुतलियां, 
जो भीगी हैं, अहसासों की बारिश से,
जो जाग रही हैं, ममता की ख्वाहिश से।
अकुलाहट में अपनी
पलक पावड़े बिछाए ,
प्रतीक्षा की हर आहट पर देवी-देवता मनाए।
असमंजस के क्षण-क्षण को
गिनता वक्त होगा,
जाने किस हाल में उसका लाड़ला होगा ???

दरवाजे की चौखट पर
राह तकती, 
वो दो मासूम नजरें, 
वो तुतलाती-सी बोली, भाव नयन में थमे-थमे से,
वो सीने से उठता ज्वार, खड़े पांव जमे-जमे से।
छाया देता कल्पवृक्ष,
गोदी का आश्वासित बचपन,
जीवट था उसका नायक,
सवाल पूछता भोला मन।
उसके कंधों पर चढ़कर, चांद को छूने जाना है,
बता दे मेरी मां, मेरे जीवनदाता को कब आना है ???

दरवाजे की चौखट पर
राह तकती, वो दो निगाहें, 
अपनी सिलवटों का दर्द बयां कर रही है,
हर लम्हा पदचाप की सुधियां तलाश रही हैं।

कलेजा हथेली पर, सांसे घूमी-फिरी सी,
तारीखें मौन पसराए,आशाओं में झुरझुरी सी।
सूखे आंसू और दिलहाहाकार कर रोता है,
जब तिरगें में लिपटा, 
किसी जवान का जनाजा होता है !!!

-निशा माथुर

Monday, December 26, 2016

दिसंबर का महीना............ निशा माथुर 










वो अटके से ठहरे-ठहरे से जज्बात,
लबों पे रूकते लफ्जों की बंदिश।
दिल में खलिश-सी तेरी मौजूदगी और.....
उफ ! ये दिसंबर का महीना।  

कोहरे की चादर में लिपटे कुछ ख्याल, 
धुंध में धुंधलाता सर्द-सा तेरा अक्स।
बिछुड़े को ढूंढता पागल दिल और.....
उफ ! ये दिसंबर का महीना।

वो कुनमुनी धूप में आंखों से झरते मोती,  
पलकों के कोरों से समेटती कुछ आहें।
बदन पे लपेटे तेरी खुश्बू का लिबास और.....
उफ ! ये दिसंबर का महीना।  

तेरी यादों की वो जानलेवा अंगड़ाई, 
तुझे ही सोचना, लिखना और गुनगुनाना।
चांदनी-सी खिलती कमसिन हंसी और.....
उफ ! ये दिसंबर का महीना।  

तेरी बातों-बातों में आंचल की नरमी, 
कानों को छूकर निकलता रूहानी स्पर्श।
रंगीन हो जाते स्याही के स्याह रंग और
उफ ! ये दिसंबर का महीना।  

तेरी निगाहों की मीठी-सी शरारत,
मेरे चेहरे से उलझती जाती-सी नजर।
फिर तेरा नेह बनकर यूं बरसना और.....
उफ ! ये दिसंबर का महीना।  

वो बर्फ-सी जम-जम जाती सांसें, 
पिघलती-सी ठहरी-ठहरी शमा-सी मैं।
कंपकपाता, ठिठुरता-सा रोम-रोम और, 
उफ ! ये दिसंबर का महीना।

तेरी चाहतों का ओढ़ कर आसमान,
अपने अरमानों का सुलगा कर अलाव।
सेंक लूं वेणी में गुंथी हुई कुछ उम्मीदें और.....
उफ ! ये दिसंबर का महीना। 

-निशा माथुर    

Wednesday, November 23, 2016

पीले पत्ते............. निशा माथुर


शाख के पीले पत्ते रंग बदलते हुए
सांस-सांस टहनी पर गंवा देते हैं 

उम्मीदें दामन को कसके पकड़े हुए,
आंधियों की औकात को हवा देते है

भोर के भानु-सी मुस्कान सजा देते हैं
अंबर के बदरवा को देख नाच लेते हैं

स्पंदन के संचार पर गा लिया करते हैं
सप्त लहरी संगीत के स्वर सजा देते हैं

बहारों में शजर को बाखूब सजा देते हैं,
करारी धूप में खुद को भी जला लेते हैं  

जानते हैं ये दिन लौटकर नहीं आते है
इंतजार में कितने मधुमास गंवा देते है

नई-नई कोंपलों को भी जीवन देते हैं
आंख से मोती बनके टूट बिखर जाते हैं  

कुछ ऐसा जिंदगी का इम्तेहान देते हैं
मर के अपनी हस्ती को हौंसला देते है

जब कभी शजर का साथ छोड़ देते हैं
वजूद को लोगों के पैरों में दबा देते है

-निशा माथुर