मगर अश्क ख़ामोश फिर भी बहेंगे
मुहब्बत तेरी फ़क्त थी इक दिखावा
बहुत पाक थी तू, सभीसे कहेंगे
नहीं आह लब से उठेगी कभी भी
सितम वास्ते हम तेरे सब सहेंगे
मिला आज अंजाम उल्फ़त का ऐसा
मुहब्बत कभी फिर नहीं कर सकेंगे
रहे तू सलामत नई जिंदगी में
ख़ुदारा ख़लिश अब नहीं हम मिलेंगे.
-महेशचन्द्र गुप्त 'ख़लिश'
