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Friday, September 18, 2020

क्या जरूरत थी आपको मेरी....डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी

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दिल्लगी सिर्फ इक बहाना था।
उनका मकसद तो आज़माना था।।

मैं तो लूटा गया उन्हीं  से फिर ।
जिनसे  रिश्ता  बहुत  पुराना था ।।

तोड़  डाला   उसी  ने   दिल   देखो ।
जिसका दिल मे ही आना जाना था ।।

हो  गई  कहकशाँ में जब  साजिश ।
इक सितारे को टूट जाना था ।।

तेरी यादें भी कितनी ज़ालिम थीं ।
रात भर अश्क़ को बहाना था ।।

मौत  के  बाद  आये  हैं जिनको ।
दम निकलने से पहले आना था ।।

चार कंधे नसीब भी न हुए ।
साथ जिसके खड़ा जमाना था ।।

रिन्द प्यासा गया तेरे दर से ।
जाम कुछ तो उसे पिलाना था ।।

क्या जरूरत थी आपको मेरी ।
आसमा सर पे जब उठाना था ।।
-डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी

Thursday, September 17, 2020

चाँद की बन्दगी नहीं होती..डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी

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तुमसे गर आशिक़ी नहीं होती ।
सच  कहूँ  शाइरी  नहीं  होती ।।

तुम  अगर ख़्वाब  में नहीं आते ।
लेखनी   यूँ  चली  नहीं   होती ।।

जो न  अंजाम  तक पहुंच  पाए ।
वो  मुहब्बत  भली  नहीं  होती ।।

क़ैद ए उल्फ़त से छूट जाता मैं।
काश  नजरें  पढ़ी  नहीं  होती ।।

रोज़  जाता  हूँ  मैकदे  तक  मैं ।
पर  कोई  मयकशी नहीं  होती ।।

उनसे इज़हारे इश्क़ कर लूं मैं ।
मेरी हिम्मत कभी नहीं होती ।।

कुछ तो तुम भी क़रीब आ जाओ ।
बारहा बेबसी नहीं होती ।।

 चैन से रात भर मैं सो लेता ।
गर वो खिड़की खुली नहीं होती ।।

स्याह रातों का है असर साहिब ।
चाँद की बन्दगी नहीं होती ।।
-डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी

Sunday, August 16, 2020

ज़मीं से क्यूँ उजाला जा रहा है ...डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी

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ये किस सांचे में ढाला जा रहा है ।
मेरे हक़ का निवाला जा रहा है ।।

मुनाफ़ा जिनसे हासिल था उन्हीं का ।
निकाला अब दिवाला जा रहा है ।

अज़ब है ये तुम्हारी मीडिया भी ।
हमेशा सच को टाला जा रहा है ।।

वतन को डस लिया वो सर्प देखो ।
जिसे ग़फ़लत में पाला जा रहा है ।।

गुनाहों को छुपाने के लिए क्यूँ ।
यूँ पर्दा ख़ूब डाला जा रहा है ।।

यहाँ नीलामियों का दौर साहब ।
वतन कैसे सँभाला जा रहा है ।।

तरक़्की कर लिया है मुल्क ने अब ।
शिगूफा यह उछाला जा रहा है ।।

किसी जमहूरियत की ही जुबाँ पर।
लगाया रोज़ ताला जा रहा है ।।

फ़रेबी शम्स तू कुछ तो बता दे ।
ज़मीं से क्यूँ उजाला जा रहा है ।।

-डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

Monday, August 3, 2020

ग़म के फ़साने में उलझ जाता हूँ ...डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी

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हाले दिल सुनने सुनाने में उलझ जाता हूँ ।
मैं तेरे ग़म के फ़साने में उलझ जाता हूँ ।।

जाने कैसी है क़शिश उसकी सदा में यारो ।
बारहा उसके तराने में उलझ जाता हूँ ।।

हो शबे वस्ल कहीं मुद्दतों से है ख़्वाहिश ।
बात उनसे ये बताने में उलझ जाता हूँ ।।

कौन अपना है यहाँ कौन पराया साहब।
जुबां पे बात ये लाने में उलझ जाता हूँ ।।

वो शरर बन के गुज़रता है मेरे कूचे से ।
और मैं आग बुझाने में उलझ जाता हूँ ।।

बयां कर देती है चेहरे की शिकन जब सच को ।
मैं हक़ीक़त को छुपाने में उलझ जाता हूँ ।।

यार की शक्ल में मिलते हैं फ़रेबी मुझको ।
आजकल हाथ मिलाने में उलझ जाता हूँ ।।

जाने कैसी तेरी जुल्फों की है फ़ितरत जानां ।
मैं तेरा अक्स बनाने में उलझ जाता हूँ ।।

तोड़ जाती है कमर रोज़ यहां महँगाई ।
मैं तो परिवार चलाने में उलझ जाता हूँ ।।

-डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी

Sunday, July 19, 2020

यूँ उम्र गुज़र जाए न ...डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी

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कुछ वक्त मेरे साथ बिताने के लिए आ।
तू शमअ सरे बज़्म जलाने के लिए आ ।।

दिल पर किसी के राज चलाने के लिए आ ।
ऐ दोस्त नई मंजिलें पाने के लिए आ।।

यूँ छुप छुपा के देख रहा है तुझे ये कौन ।
शर्मो हया का पर्दा हटाने के लिए आ।।

अफ़सोस है कि आज परिंदे हैं गिरफ़्तार ।
सय्याद पे तू तीर चलाने के लिए आ ।।

माना कि तेरे साथ जमाने की दुआ है ।
दामन से मेरे दाग़ मिटाने के लिए आ ।।

टूटे न मुहब्बत का भरम तुझ से किसी का ।
इक बार ज़माने को दिखाने के लिए आ ।।

रूठा है कोई मुद्दतों के बाद भी अब तक ।
ऐ यार तू उल्फ़त को मनाने के लिए आ ।।

यूँ उम्र गुज़र जाए न रुसवाइयों के साथ ।
महबूब के दिल में तू समाने के लिए आ ।।

बाकी हैं मेरे हक़ के अभी और उजाले ।
ऐ चाँद यहाँ फ़र्ज़ निभाने के लिए आ ।।

-डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी

Monday, May 4, 2020

शवों पर काल का यह ताण्डव ...नवीन मणि त्रिपाठी


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करेगा दम्भ का यह काल भी अवसान किंचित ।
करें मत आप सत्ता का कहीं अभिमान किंचित ।।

क्षुधा की अग्नि से जलते उदर की वेदना का ।
कदाचित ले रहा होता कोई संज्ञान किंचित ।।

जलधि के उर में देखो अनगिनत ज्वाला मुखी हैं।
असम्भव है अभी से ज्वार का अनुमान किंचित।।

प्रत्यञ्चा पर है घातक तीर शायद मृत्यु का अब ।
मनुजता पर महामारी का ये संधान किंचित ।।

चयन पर आज जनता की यही स्तब्धता है ।
प्रकट कैसे अहं का आप में प्रतिमान किंचित ।।

बिकी हैं राष्ट्र की सम्पत्तियाँ और स्मिता भी ।
चुनावों तक रहेगा देश को यह ध्यान किंचित ।।

प्रकृति के मर्म के उपहास का परिणाम ही है ।
प्रलय करने चला है युद्ध का सम्मान किंचित ।।

शवों पर काल का यह ताण्डव तुम रोक लेते ।
हृदय में सृष्टि का होता कहीं स्थान किंचित ।।

विवशता की परिधि का टूटना है सत्य अंतिम ।
यहाँ करता है मानव प्रति दिवस विषपान किंचित ।।

- नवीन मणि त्रिपाठी

शब्दार्थ -
किंचित -(विशेषण )थोड़ा, कुछ, क्षणिक,
किंचित- (क्रिया विशेषण ) अल्प मात्रा में ,बहुत कम

Sunday, April 12, 2020

ख़ुदा ख़ैर करे' ...डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी

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तेरी आँखें हैं ख़ता वार ख़ुदा ख़ैर करे' ।
दिल हुआ मेरा गिरफ़्तार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

ज़मीं की तिश्नगी को देख रहा है बादल ।
आज बारिश के हैं आसार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

नाम आया है मेरा जब से सनम के लब पर ।
पूरी बस्ती हुई बेज़ार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

हर तरफ़ उनकी अदाओं पे हुआ हंगामा ।
ज़िंदगी जीना है दुश्वार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

बिजलियाँ खूब गिराते हैं नशेमन पे सनम।
सब्र की टूटे न दीवार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

अब तो मासूम दिलों पर है उसी का कब्जा ।
हुस्न की चल रही सरकार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

कास आएं तो सही आप मेरी महफ़िल में ।
बज़्म हो जाए ये गुलज़ार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

लोग उल्फ़त की तिज़ारत का तक़ाज़ा लेकर ।
खुद ब खुद आ रहे बाज़ार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

अपनी ताक़त पे जो इतरा रहे थे दुनियाँ में ।
आज वो मुल्क भी लाचार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

वो क़यामत है क़रोना की तरह छूते ही ।
दिल हज़ारों हुए बीमार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

क़ैद हूँ घर में मिलूं भी तो भला कैसे मिलूं ।
याद तड़पाये बहुत बार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

-डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी

Tuesday, March 3, 2020

ये लिक्खा पयाम किसका है ...नवीन मणि त्रिपाठी

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हमारे दिल से नया इन्तिक़ाम किसका है ।।
तुम्हारे हुस्न पे ताज़ा कलाम किसका है ।।

बिछीं हैं राह में पलकें, ज़िगर, उमीदें सब ।
सनम के वास्ते ये एहतिराम किसका है ।।

न दीन का ही पता और पता न ईमां का ।
बताऊं क्या तुझे क़ातिल अवाम किसका है ।।

मेरी क़िताब में गुल मिल रहे हैं कुछ दिन से ।
पता करो ये मुहब्बत का काम किसका है ।।

मैं मुन्तज़िर हूँ, मयस्सर कहाँ मुलाकातें ।
तुम्हारे ख़त में ये लिक्खा पयाम किसका है ।।

मिलो रक़ीब से लेकिन तुम्हें ख़बर ये रहे ।
सुकूनो चैन अभी तक हराम किसका है ।।

नज़र झुका के किया है कबूल तुमने जो ।
मेरे हबीब बताओ सलाम किसका है ।।

हयात तेरा भरोसा ही नहीं पल भर का ।
तमाम उम्र का यह इंतिज़ाम किसका है ।।

हरेक ज़र्रे में तुझको मिला ख़ुदा ज़ाहिद ।
अभी भी शक है तुझे अहतिमाम किसका है ।।

-- नवीन मणि त्रिपाठी

Sunday, February 16, 2020

आइना मत दिखाओ.... नवीन मणि त्रिपाठी


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इक ग़ज़ल गुनगुनाओ सो जाओ ।
फ़िक्र दिल से उड़ाओ सो जाओ ।।

शमअ में जल गए पतंगे सब ।
इश्क़ मत आज़माओ सो जाओ ।।

यादें मिटतीं नहीं अगर उसकी ।
ख़त पुराने जलाओ सो जाओ ।।

रात काफ़ी गुज़र चुकी है अब ।
चाँद को भूल जाओ सो जाओ ।।

उसने तुमको गुलाब भेज दिया ।
गुल को दिल से लगाओ सो जाओ ।।

उल्फ़तें बिक रहीं करो हासिल ।
दाम अच्छा लगाओ सो जाओ ।।

ख़ाब में वस्ल है मयस्सर अब ।
रुख़ से चिलमन हटाओ सो जाओ ।।

बेवफ़ा की तमाम बातों का ।
यूँ न चर्चा चलाओ सो जाओ ।।

बारहा माँगने की आदत से ।
काहिलों बाज़ आओ सो जाओ ।।

है सियासत का फ़लसफ़ा इतना ।
आग घर में लगाओ सो जाओ ।।

इतनी जल्दी भी क्या मुहब्बत में ।
तुम ज़रा सब्र खाओ सो जाओ ।।

स्याह रातों में बेसबब मुझको ।
आइना मत दिखाओ सो जाओ ।।
--नवीन मणि त्रिपाठी

Wednesday, January 1, 2020

दिल को छू जाएं अदाएं तो ग़ज़ल होती है ...नवीन मणि त्रिपाठी


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दिल को छू जाएं अदाएं तो ग़ज़ल होती है ।
रात भर यादें सताएं तो ग़ज़ल होती है ।।

हुस्न का जलवा दिखाएं तो ग़ज़ल होती है ।
रुख़ से पर्दा वो उठाएं तो ग़ज़ल होती है ।।

दर्दो गम दे के न अशआर मिलेंगे साहब ।
रोते इंसा को हंसाएं तो ग़ज़ल होती है ।।

हम तो मस्जिद में इबादत खुदा की कर लेंगे ।
आप मंदिर में जो आएं तो ग़ज़ल होती है ।।

इक मुलाकात का करके वो इशारा हम से ।
और नज़रों को चुराएं तो ग़ज़ल होती है ।।

बेख़ुदी इतनी गुज़र जाए हदों से उनकी ।
वो दरीचों से बुलाएं तो ग़ज़ल होती है ।।

राजे उल्फ़त पे लगाकर कोई पर्दा वो जब ।
बारहा इश्क़ छुपाएं तो ग़ज़ल होती है ।।

दर्द ज़ाहिर न हो देखे न ज़माना हम को ।
अश्क़ आँखों में सुखाएं तो ग़ज़ल होती है ।।

किसी मुफ़्लिश की गरीबी की दास्ताँ से हम ।
सुब्ह तक चैन गंवाएं तो ग़ज़ल होती है ।।

तेरी रानाइयों का यार तसव्वुर करके ।
लफ्ज़ होटों पे आ जाएं तो ग़ज़ल होती है ।।

बह्र व रुक्न रदीफ़ेन या क्वाफ़ी ही नहीं ।
आप मफ़हूम निभाएं तो ग़ज़ल होती है ।।

- नवीन मणि त्रिपाठी

Saturday, October 26, 2019

लुटे न देश कहीं आज ...नवीन मणि त्रिपाठी

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लुटे न देश कहीं आज लंतरानी में ।
लगा रहे हैं मियां आग आप पानी में।।

खबर है सबको किधर जा रही है ये कश्ती ।
जनाब जीते रहें आप शादमानी में ।।

अजीब शोर है खामोशियों के बीच यहाँ ।
बहें हैं ख़्वाब भी दरिया के इस रवानी में ।।

सवाल जब से तरक़्क़ी पे उठ रहा यारो ।।
चुरा रहे हैं नज़र लोग राजधानी में ।।

लिखेगा जब भी कोई क़त्ल की सियासत को ।
तुम्हारा जिक्र तो आएगा हर कहानी में ।।

किसे है फिक्र यहां उनकी बदनसीबी की ।
कटोरे ले के जो निकले हैं इस जवानी में ।।

ऐ नौजवां तू जरा मांग हक़ की रोटी को ।
बहुत है जादू सुना उनकी मिह्रबानी में ।।

यकीन हम भी न करते अगर खबर होती ।
मिलेंगे ज़ख्म बहुत प्यार की निशानी में ।।

- नवीन मणि त्रिपाठी

Tuesday, October 1, 2019

जहाँ की दुश्मनी कबूल है .....डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी

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शराब जब छलक पड़ी तो मयकशी कुबूल है ।

ऐ रिन्द मैकदे को तेरी तिश्नगी कुबूल है ।



नजर झुकी झुकी सी है हया की है ये इंतिहा ।
लबों पे जुम्बिशें लिए ये बेख़ुदी कुबूल है ।।


गुनाह आंख कर न दे हटा न इस तरह नकाब ।
जवां है धड़कने मेरी ये आशिकी कबूल है ।।


यूँ रात भर निहार के भी फासले घटे नहीं ।
ऐ चाँद तेरी बज़्म की ये बेबसी कुबूल है ।।


न रूठ कर यूँ जाइए मेरी यही है इल्तिजा ।
मुझे हुजूऱ अपकी तो बेरुख़ी कुबूल है ।।


ये सुन के मुस्कुरा रहा चराग़ स्याह रात में ।
शलभ ने जब कहा यही ये रोशनी कुबूल है ।।


उसी को ज़ख्म हैं मिले उसी को हर सज़ा मिली ।
जिसे तेरे लिए जहाँ की दुश्मनी कबूल है ।।


बिना रदीफ़ बह्र के लिखी थी मैंने जो कभी ।
मेरे विसाले यार को वो शायरी कुबूल है ।।


ऐ रब जरा बता मुझे कदम कदम की मुश्किलें ।
तेरी ही ज़ुस्तजू में तेरी रहबरी कुबूल है ।।


- नवीन मणि त्रिपाठी

Saturday, July 6, 2019

जब बताता है तुझे तेरा मुक़द्दर आइना.....डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी


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अब न चहरे की शिकन कर दे उजागर आइना ।
देखता रहता है कोई छुप छुपा कर आइना ।।

गिर गया ईमान उसका खो गये सारे उसूल ।
क्या दिखायेगा उसे अब और कमतर आइना ।।

सच बताने पर सजाए मौत की ख़ातिर यहां ।
पत्थरो से तोड़ते हैं लोग अक्सर आइना ।

आसमां छूने लगेंगी ये अना और शोखियां ।
जब दिखाएगा तुझे चेहरे का मंजर आइना ।।

अक्स तेरा भी सलामत क्या रहेगा सोच ले ।
गर यहां तोड़ा कभी बनके सितमगर आइना ।।

आरिजे गुल पर तुम्हारे है कोई गहरा निशान ।
अब दिखायेगा ज़माना मुस्कुरा कर आइना ।।

खुद के बारे में बहुत अनजान होकर जी रहा ।
आजकल रखता कहाँ इंसान बेहतर आइना ।।

तोड़ देंगे आप भी यह हुस्न ढल जाने के बाद ।
एक दिन बेशक़ चुभेगा बन के निश्तर आइना ।।

कुछ तो उसकी बेक़रारी का तसव्वुर कीजिये ।
जो सँवरने के लिए देखा है शब भर आइना ।।

हैं लबों पर जुम्बिशें क्यूँ इश्क़ के इज़हार पर ।
जब बताता है तुझे तेरा मुक़द्दर आइना ।।

-डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी

Monday, June 24, 2019

मुहब्बत का श्री गणेश.....नवीन मणि त्रिपाठी

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हुस्न का बेहतर नज़ारा चाहिए ।
कुछ तो जीने का सहारा चाहिए ।।

हो मुहब्बत का यहां पर श्री गणेश ।
आप का बस इक इशारा चाहिए ।।

हैं टिके रिश्ते सभी दौलत पे जब ।
आपको भी क्या गुजारा चाहिए ।।

है किसी तूफ़ान की आहट यहां ।
कश्तियों को अब किनारा चाहिए ।।

चाँद कायम रह सके जलवा तेरा ।
आसमा में हर सितारा चाहिए ।।

फर्ज उनका है तुम्हें वो काम दें ।
वोट जिनको भी तुम्हारा चाहिए ।।

अब न लॉलीपॉप की चर्चा करें ।
सिर्फ हमको हक़ हमारा चाहिए ।।

कब तलक लुटता रहे इंसान यह ।
अब तरक्की वाली धारा चाहिए ।।

जात मजहब।से जरा ऊपर उठो ।
हर जुबाँ पर ये ही नारा चाहिए ।।

अम्न को घर में जला देगा कोई ।
नफरतों का इक शरारा चाहिए ।।
- नवीन मणि त्रिपाठी
शब्दार्थ - शरारा - चिंगारी 


Monday, March 11, 2019

मौत से जो निक़ाह कर बैठे......डॉ.नवीन मणि त्रिपाठी

खूब सूरत गुनाह कर बैठे ।
हुस्न पर वो निगाह कर बैठे ।।

आप गुजरे गली से जब उनकी ।
सारी बस्ती तबाह कर बैठे ।।

कुछ असर हो गया जमाने का ।
ज़ुल्फ़ वो भी सियाह कर बैठे ।।

देख कर जो गए थे गुलशन को ।
आज फूलों की चाह कर बैठे ।।

जख्म दिल का अभी हरा है क्या ।
आप फिर क्यों कराह कर बैठे ।।

किस तरह से जलाएं मेरा घर ।
लोग मुझसे सलाह कर बैठे ।।

लोग नफरत की इस सियासत में ।
आपको बादशाह कर बैठे ।।

दुश्मनी जब चले निभाने हम ।
वो हमें खैरख्वाह कर बैठे ।।

उस जमीं का उदास मंजर था ।
हम जिसे ईदगाह कर बैठे ।।

वो तो सरकार की सियासत थी ।
आप क्यूँ आत्मदाह कर बैठे ।।

अब तस्सल्ली उन्हें मुबारक़ हो ।
मुल्क जो कत्लगाह कर बैठे ।।

उन शहीदों को है सलाम मेरा ।
मौत से जो निक़ाह कर बैठे ।।

सिर्फ पहुँचे वही खुदा तक हैं ।
इश्क़ जो बेपनाह कर बैठे ।।

-डॉ.नवीन मणि त्रिपाठी 
मौलिक अप्रकाशित