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Tuesday, July 7, 2015

क्यों न हुए.......ठाकुर दास 'सिद्ध'



बेखबर मिलता तो वो,बनाते बेवकूफ
बाखबर मिला तो कहते, बेखबर क्यों न हुए

फैली जब-जब आग नफरत की,तो इनके घर जले
पर कभी लपटों की जद में,उनके घर क्यों न हुए 

शैतानियत का हर हुनर, अब सीखने की होड़ है
इंसान की इन्सानियत के, कुछ हुनर क्यों न हुए

भरपूर होता दिख रहा है, हर बुराई का असर
नेक बातें भी हैं पर, उनके ऊपर असर क्यों न हुए

जो जमाने को कुचलने के, लिए हसरत खड़े हैं
इस समय की ओखली में, उनके सर क्यों न हुए

इसको जाना था जहां, उसको भी जाना वहीं था
एक  थी मंजिल तो फिर,वो हमसफर क्यों न हुए

'सिद्ध' ये चक्का समय का, बिन थमें चलता निरन्तर
थे उस पहर जो-जो मजे, वो इस पहर क्यों न हुए

-ठाकुर दास 'सिद्ध'
सुभाष नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

Wednesday, August 28, 2013

उमड़ते आते हैं शाम के साये..........इब्ने इंशा


उमड़ते आते हैं शाम के साये
दम-ब-दम बढ़ रही है तारीकी
एक दुनिया उदास है लेकिन
कुछ से कुछ सोचकर दिले-वहशी
मुस्कराने लगा है- जाने क्यों ?
 
वो चला कारवाँ सितारों का
झूमता नाचता सूए-मंज़िल
वो उफ़क़ की जबीं दमक उट्ठी
वो फ़ज़ा मुस्कराई, लेकिन दिल
डूबता जा रहा है - जाने क्यों ?

-इब्ने इंशा
उफ़क़=क्षितिज; जबीं=मस्तक 

इब्ने इंशा
जन्म: 15 जून,1927, फ़िल्लौर, जिला जालंधर, पंजाब
निधन: 11 जनवरी,1978, लन्दन, यू के


कुछ प्रमुख कृतिः    
इस बस्ती के एक कूचे में, चाँद नगर, दुनिया गोल है, 
उर्दू की आख़िरी किताब

ये रचना सौजन्यः रसरंग, दैनिक भास्कर
 

Thursday, August 8, 2013

जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी.........नज़ीर अकबराबादी


है आबिदों को त‘अत-ओ-तजरीद की ख़ुशी
और ज़ाहिदों को जुहाद की तमहीद की ख़ुशी
रिन्द आशिकों को है कई उम्मीद की ख़ुशी
कुछ दिलबरों के वल की कुछ दीद की ख़ुशी
आबिद=उपासक; त‘अत=उपासना; तजरीद=एकान्त;
ज़ाहिद=धर्मोपदेशक; जुहद की तमहीद=धार्मिक बात का आरम्भ


ऐसी न शब-ए-बरात न बक़रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

पिछले पहर से उठ के नहाने की धूम है
शीर-ओ-शकर सिवईयाँ पकाने की धूम है
पीर-ओ-जवान को नेम‘तें खाने की धूम है
लड़कों को ईद-गाह के जाने की धूम है
पीर=बूढ़े; नेम‘तें=पकवान

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

कोई तो मस्त फिरता है जाम-ए-शराब से
कोई पुकारता है कि छूटे अज़ाब से

कल्ला किसी का फूला है लड्डू की चाब से
चटकारें जी में भरते हैं नान-ओ-कबाब से
अज़ाब=पीड़ा,कठिनाई; कल्ला=गाल

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

क्या है मुआन्क़े की मची है उलट पलट
मिलते हैं दौड़ दौड़ के बाहम झपट झपट
फिरते हैं दिल-बरों के भी गलियों में गट के गट
आशिक मज़े उड़ाते हैं हर दम लिपट लिपट
मुआनिक़=आलिंगन; गट=भीड़

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

\काजल हिना ग़ज़ब मसी-ओ-पान की धड़ी
पिशवाज़ें सुर्ख़ सौसनी लाही की फुलझड़ी
कुर्ती कभी दिखा कभी अंगिया कसी कड़ी
कह “ईद ईद” लूटें हैं दिल को घड़ी घड़ी
पिशवाज़=घाघरा

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

रोज़े की ख़ुश्कियों से जो हैं ज़र्द ज़र्द गाल
ख़ुश हो गये वो देखते ही ईद का हिलाल
पोशाकें तन में ज़र्द, सुनहरी सफेद लाल
दिल क्या कि हँस रहा है पड़ा तन का बाल बाल
रोज़ा=उपवास; हिलाल=ईद का चाँद

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

जो जो कि उन के हुस्न की रखते हैं दिल से चाह
जाते हैं उन के साथ ता बा-ईद-गाह
तोपों के शोर और दोगानों की रस्म-ओ-राह
मयाने, खिलोने, सैर, मज़े, ऐश, वाह-वाह

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

रोज़ों की सख़्तियों में न होते अगर अमीर
तो ऐसी ईद की न ख़ुशी होती दिल-पज़ीर
सब शाद हैं गदा से लगा शाह ता वज़ीर
देखा जो हम ने ख़ूब तो सच है मियां ‘नज़ीर‘
दिल-पज़ीर=दिल पर समायी हुई; गदा=गरीब

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

--नज़ीर अकबराबादी

सौजन्यः साहित्य कुंज