तौक़ीर ओ ऐतबार ओ इस्मत हो या हो 'माँ का प्यार'
ये वो दौलत है , जो फिर ना मिले उम्र भर कमाने से
ए दिल चल के ढूंढें नया और कोई ज़ख़्म ज़माने में
उकताहट सी हो गयी है मुझे अब इक ही फ़साने से
अब तो वो याद भी नही के जलाए दिल ओ जाँ मेरी
फितरती दर्द ही रह-रह के आना चाहता है बहाने से
सुना है कुछ ख़ास तू भी नही नाम - ए - आमाल में
होता गर , तुझे फुर्सत मिलती कभी मुझे सताने से
तजस्सुम-ओ -कारगाहे हस्ती में यूँ फंसी है 'ज़ोया'
कई दिनों से वक़्त ही नही शिकायत का ज़माने से !!
-- VenuS "ज़ोया"

