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Wednesday, August 2, 2017

‘छाँव तो कर दे’....पीयूष शिवम


कब  से चल रहा हूँ धूप में तेरी,
ज़िन्दगी इस दोपहर में छाँव तो कर दे।

याद धुंधली हो गई गर्दिश में गहरा कर,
इक दफ़ा मेरे शहर को गाँव तो कर दे।

ख़ून देखा है नहीं अपना बहुत दिन से,
ख़ंजर-ए-हालात के कुछ घाव तो कर दे।

ये तसल्ली है कि तूफाँ में भी तिनका है,
ये इरादा है कि इसको नाव तो कर दे।

बीतने को है यहाँ अरसा बहार आए,
इस तरफ इक बार अपने पाँव तो कर दे।

आज निकला 'शिवम्' औक़ात जानने,
और को दे छोड़, खुद का भाव तो कर दे।

Friday, July 28, 2017

‘अम्मा’....पीयूष शिवम


रो रहा था मैं करूँगा क्या अंधेरा हो गया,
ज्यों छिपाया माँ ने आँचल में सवेरा हो गया।

मिल्कियत सारे जहाँ की छान ली कुछ न मिला,
गोद में जाकर गिरे माँ की, बसेरा हो गया।

इस फ़रेब-ओ-झूठ  की दुनिया की नज़र न लगे,
माँ की बाँहों में गया, ममता का घेरा हो गया।

दिल कहे क्यों हिचकियाँ आतीं तुझे इतनी बता,
इस नज़र के सामने अम्मा का चेहरा हो गया।

माँ वही, अंगना वही, चूल्हा वही, मिट्टी वही,
याद आई तो शहर भी गाँव-खेड़ा हो गया।

तू ख़ज़ाने की दुआ करता रहा सारी उमर,
ले ख़ज़ाना दुआ का 'पीयूष' तेरा हो गया।