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Tuesday, June 18, 2019

क़लम, काग़ज़, स्याही और तुम .....हरिपाल सिंह रावत

उकेर लूँ, काग़ज़ पर,
जो तू आए, 
ख़्वाबों में ए ख़्याल ।
बस...
क़लम, काग़ज़, स्याही...
और तुम,
मैं बह जाऊँ... भावों में, 
अहा!
जो तू‌ आये...

भाव... 
रचना की आत्मा से मिल,
बुन आयें, पश्मीनी... 
ख़्वाबों का स्वेटर,
ओढ़ता फिरूँ जिसे, 
दर्द की सर्द सहर में,
जो दे जाए सर्द में गरमाहट... 
दर्द में राहत, 
अहा!

क़लम, काग़ज़, स्याही और तुम

जो तू आए, 
ख़्वाबों में ए ख़्याल ।
-हरिपाल सिंह रावत

Sunday, March 18, 2018

आपको अपनी अदा की ताज़गी पर नाज़ है.....आर.पी. घायल

 
आपको  अपनी  अदा की  ताज़गी  पर  नाज़  है
हमको भी अपनी  वफा  की  सादगी पर नाज़  है

आपसे  लिपटी  हुई  पुरवाई  को  हम  क्या  कहें
आपको   पुरवाई   की   आवारगी  पर  नाज़   है

आपकी  आँखों  ने  हमसे तल्ख़ियों  में बात  की
आपको आँख की इस  नाराज़गी  पर   नाज   है

आपने दिल  के जो टुकडे कर दिये तो क्या  हुआ
हमको अपने  दिल  की इस दीवानगी पर नाज़  है

आपको  ‘घायल’   मुबारक  आपकी   संजीदगी
हमको   हँसती-खेलती  इस ज़िंदगी  पर नाज़ है

-आर.पी. घायल

Monday, December 4, 2017

ऐसी ख़ुशबू पहले कभी न थी....कुसुम सिन्हा

हवाओं में ऐसी ख़ुशबू पहले कभी न थी
ये चाल बहकी बहकी पहले कभी न थी

ज़ुल्फ़ ने खुलके उसका चेहरा छुपा लिया
घटा आसमा पे ऐसी पहले कभी न थी

आँखें तरस रहीं हैं दीदार को उनके
दिल में तो ऐसी बेबसी पहले कभी न थी

फूलों पे रख दिए हैं शबनम ने कैसे मोती
फूलों पे ऐसी रौनक पहले कभी न थी

यादों की दस्तकों ने दरे दिल को खटखटाया
आती थी याद पहले पर ऐसी कभी न थी
-कुसुम सिन्हा

Tuesday, November 28, 2017

व्यथा शब्दों की....शबनम शर्मा


आसमान के ख़्याल,
धरा की गहराई, 
रात्री का अँधेरा, 
दिन की चमक, 
शब्द बोलते हैं।

इन्सान की इन्सानियत,
हैवान की हैवानियत, 
फूल की मुस्कान, 
काँटों का ज्ञान, 
शब्द बोलते हैं।

प्रकृति का प्रकोप, 
जवान की शहादत, 
विधवा का विलाप, 
बच्चों की चीत्कार, 
शब्द बोलते हैं।

शब्दों की चोट,
मन की खोट, 
नज़रों का फेर, 
गहन अन्धेर, 
शब्द बोलते हैं।

शब्दों पर कटाक्ष, 
शब्दों पर प्रहार, 
शब्दों का दुरुपयोग, 
शब्दों का आत्मदाह, 
सिर्फ़ शब्द झेलते हैं।

- शबनम शर्मा

Wednesday, October 25, 2017

ग्यारह कहमुकरियाँ....त्रिलोक सिंह ठकुरेला


 1.
जब भी देखूँ, आतप हरता। 
मेरे मन में सपने भरता। 
जादूगर है, डाले फंदा। 
क्या सखि, साजन? ना सखि, चंदा। 

2.
लंबा क़द है, चिकनी काया।
उसने सब पर रौब जमाया।
पहलवान भी पड़ता ठंडा। 
क्या सखि, साजन? ना सखि, डंडा।

3.
उससे सटकर, मैं सुख पाती।
नई ताज़गी मन में आती।
कभी न मिलती उससे झिड़की।
क्या सखि, साजन? ना सखि, खिड़की।

4.
जैसे चाहे वह तन छूता।
उसको रोके, किसका बूता।
करता रहता अपनी मर्ज़ी। 
क्या सखि, साजन? ना सखि, दर्ज़ी। 

5.
कभी किसी की धाक न माने। 
जग की सारी बातें जाने।
उससे हारे सारे ट्यूटर। 
क्या सखि, साजन? ना, कंप्यूटर।

6.
यूँ तो हर दिन साथ निभाये।
जाड़े में कुछ ज़्यादा भाये।
कभी कभी बन जाता चीटर।
क्या सखि, साजन? ना सखि, हीटर। 

7.
देख देख कर मैं हरषाऊँ।
खुश होकर के अंग लगाऊँ।
सीख चुकी मैं सुख-दुख सहना। 
क्या सखि, साजन? ना सखि,गहना। 

8.
दिन में घर के बाहर भाता। 
किन्तु शाम को घर में लाता। 
कभी पिलाता तुलसी काढ़ा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, जाड़ा। 

9.
रात दिवस का साथ हमारा।
सखि, वह मुझको लगता प्यारा।
गाये गीत कि नाचे पायल।
क्या सखि, साजन? ना, मोबाइल।

10.
मन बहलाता जब ढिंग होती।
ख़ूब लुटाता ख़ुश हो मोती। 
फिर भी प्यासी मन की गागर।
क्या सखि, साजन? ना सखि, सागर।

11.
बार बार वह पास बुलाता।
मेरे मन को ख़ूब रिझाता।
ख़ुद को उस पर करती अर्पण।
क्या सखि, साजन? ना सखि, दर्पण। 

-त्रिलोक सिंह ठकुरेला

Friday, October 13, 2017

मुक्तक.............नरेंद्र श्रीवास्तव


क़िस्मत
~~~~~
किसान के दिन
परेशानियों ने लादे
आसमान से
ओले मिले
नेताओं से वादे।
....

प्यासे
~~~~
वे
अच्छे अच्छों को
पानी पिलाते हैं
बाक़ी
प्यासे रह जाते हैं
*
प्रशंसक
~~~~~
एक नेता ने
कमाल कर दिखाया
उन्होंने
खिलौने में 
प्लास्टिक का
कुत्ता खरीदा
प्रशंसक दौड़कर
प्लास्टिक के
बिस्किट ले आया।
*
चमत्कार
~~~~~~
उनका
कुरता पायजामा
चमत्कार
दिखलाता है
काम बनाता है।
*
गड्ढे
~~~
सड़क के गड्ढे
उनके
बड़े काम आते हैं
जेब भर जाते हैं।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव

Saturday, February 18, 2017

बादशाह पर जुर्माना...डॉ. रश्मि शील

एक बार रात्रि के समय बादशाह औरंगज़ेब सोने ही जा रहे थे कि शाही घंटी बज उठी। बादशाह शयनकक्ष से बाहर आये। उन्हें एक दासी आती दिखाई दी। वह बोली, ''हुज़ूरे आलम! क़ाज़ी साहब आलमपनाह से मिलने के लिए दीवान खाने में तशरीफ़ लाये हैं और आपका इन्तज़ार कर रहे हैं।"
औरंगज़ेब फ़ौरन दीवानखाने पहुँचे। क़ाज़ी ने उन्हें बताया, "जहांपनाह, गुजरात जिले के अहमदाबाद शहर के एक मुहम्मद मोहसीन ने उन पर पाँच लाख रुपयों का दावा ठोंका है। अतः कल आपको दरबार में हाज़िर होना होगा।" क़ाज़ी के चले जाने पर औरंगज़ेब विचार करने लगा कि उसने तो किसी से पाँच लाख रुपए उधार नहीं लिए हैं। स्मरण करने पर भी उसे याद नहीं आया। इतना ही नहीं, मुहम्मद मोहसीन नामक व्यक्ति को भी वह न पहचानता था।
दूसरे दिन दरबार लगा और मुज़रिम के रूप में औरंगज़ेब हाज़िर हुआ। सारा दरबार खचाखच भरा हुआ था और तिल रखने को भी जगह न थी। औरंगज़ेब को उसके जुर्म का ब्यौरा पढ़कर सुनाया गया।
बात यह थी कि औरंगज़ेब के भाई मुराद को गुजरात जिला सौंपा गया था। शाहजहां जब बीमार पड़ा तो उसने स्वयं को ही गुजरात का शासक घोषित कर दिया। उसे स्वयं के नाम के सिक्के जारी करने के लिए धन की ज़रूरत हुई तब उसने मुहम्मद मोहसीन से पाँच लाख रुपए उधार लिए थे। इस बीच औरंगज़ेब ने हिकमत करके शाहजहां को क़ैद कर लिया तथा अपने तीनो भाइयों- मुराद, दारा और शुजा को क़त्ल कर उन तीनो की संपत्ति अपने ख़ज़ाने में जमा कर ली। इस तरह मोहसीन से लिया गया धन भी उसके ख़ज़ाने में जमा हो गया।
औरंगज़ेब ने अपने अपराध के प्रति अनभिज्ञता ज़ाहिर की। मोहसीन ने अपने पास मौज़ूद दस्तावेज़ दिखाया। औरंगज़ेब ने जुर्म क़ुबूल कर लिया और शाही ख़ज़ाने से पाँच लाख रुपए निकलवा कर जुर्माना अदा किया।


-डॉ. रश्मि शील

Saturday, February 11, 2017

वो चूल्हा.............शबनम शर्मा










घर में दूध की ज़रूरत 
रात का समय 
सोचा घूम भी आऊँ
व जुम्मन काका के 
घर से ले आऊँ लोटा भर दूध, 

पहुँची वहाँ, खटखटाया बाहर 
का दरवाज़ा, 
छोटी बालिका ने खोला, 
लिवा गई मुझे अन्दर 
बड़े से आँगन में,
देख मुझे जुम्मन काका खड़े हुए 
कारण पूछ आने का, कर 
इशारा बेगम को मेरे पास 
बैठ गये 

हैरान थी मैं देख, 
सब बैठे थे चूल्हे के इर्द-गिर्द,
बच्चे चबा रहे थे दाने, 
भून रहे थे आलू, 
बुजुर्ग सेंक रहे थे आग, 
पर सब ख़ुश,
बतिया रहे थे, 
कि इक ख़्याल ने मुझे 
झकझोर दिया, 

कितनी ताक़त है इस 
चूल्हे में,
इसने जोड़ा है मुन्नी 
से दादा तक इक ही 
डोर में सबको।
-शबनम शर्मा
shabnamsharma2006@yahoo.co.in

Tuesday, November 8, 2016

अनुराग...........डॉ. गुलाम मुर्तज़ा शरीफ़


वामना की कामना में
पुरोधिका का त्याग,
क्या यही है अनुराग!

वदतोव्याघात करते हो,
वाग्दंड देते हो,
दावा है पुरुषश्रेष्ट का,
कैसा निभाया साथ!!
क्या यही है अनुराग!!

पुष्प का पुष्पज लेकर,
मधुकर जताता प्यार,
गुनगुना कर, मन रिझाकर,
चूस लेता पराग!!
क्या यही है अनुराग!!

चारूचंद्र की चारूता,
मधुबाला की मादकता,
मधुमती की चपलता,
तजकर सब का प्यार,
क्यों लेते हो वैराग!!
क्या यही है अनुराग!!
-डॉ. गुलाम मुर्तज़ा शरीफ़

वामना = अप्सरा (सुन्दर परी)
कामना = अभिलाषा (ख्वाहिश)

पुरोधिका = सुशील स्त्री (नेक औरत)

Friday, October 21, 2016

काश..............दिव्या माथुर













काश कि उस मनहूस सुबह
मैं सीढ़ी से गिर जाती
मेरी तीमारदारी में तुम्हें
दफ़्तर की देर हो जाती
हलका सा दिल का दौरा
या तुम्हें सुबह पड़ जाता
आराम करो पूरा ह्फ़्ता
डाक्टर साग्रह कह जाता
‘स्कूल छोड़कर आओ पापा’
रघु ही उस दिन ज़िद करता
लाडली तुम्हारी गोद में चढ़
गंदा कर देती सूट नया
सजधज के मेनका सी मैं
काश कि पाती तुम्हें रिझा
काश तुम्हारा मचलके दिल 
द्फ़्तर जाने को न करता
काश कि सूरज देर से उगता
काश अलारम न बजता
काश सुबह हम देर से उठते
काश ये घर न उजड़ता।

-दिव्या माथुर

Sunday, October 2, 2016

बस ख़्याले बुनता रहूँ............सुशील यादव



अँधेरे में दुआ करूँ, ऐ ख़ुदा परछाई दे
बेख़्याली में निकले, जो नाम सुनाई दे

करवट न बदलूँ, कोई ख़्वाब न देखूँ
नीद से उठते तेरी, याद जुम्हाई दे

क़समों का क़सीदा हो, कहीं वादों का हो ताना
ख़्याले बुनता रहूँ, बस यूँ तन्हाई दे

उजड़े गुलशन में, सब्ज़-शजर देखूँ
हो तब्दील क़िस्मत, जन्नत ख़ुदाई दे

रिश्तों की अदालत, बेजान हलफ़नामे
या मुझे ज़िंदा रख, या मेरी रिहाई दे

-सुशील यादव
sushil.yadav151@gmail.com

Saturday, October 1, 2016

अहसास!.........अशोक परुथी "मतवाला"









मुझे 
उनकी यह बात 
बहुत अखरती है,

मुझे...
समय से पहले 
बूढ़ा करती हैं 
मेरी ...
आत्मा को,
झँझोड़ती है 
जब...
कुछ हम-उम्र महिलायें,
दो-तीन बच्चों वाली अम्मायें
मुझे... 
अंकल-अंकल करती हैं!

-अशोक परुथी "मतवाला"
ashok77901@yahoo.com

Wednesday, September 21, 2016

अपनी पहचान ढूँढता हूँ.......श्यामल सुमन



 तेरे प्यार में अभी तक मैं जहान ढूँढता हूँ
दीदार हो सका न क्यूँ निशान ढूँढता हूँ

जब मतलबी ये दुनिया रिश्तों से क्या है मतलब
इन मतलबों से हटकर इन्सान ढूँढता हूँ

खोया है इश्क़ में सब आगे है और खोना
ख़ुद को मिटाने वाला नादान ढूँढता हूँ

एहसास उनका सच्चा गिरकर जो सम्भलते जो
अनुभूति ऐसी अपनी पहचान ढूँढता हूँ

कभी घर था एक अपना जो मकान बन गया है
फिर से सुमन के घर में मुस्कान ढूँढता हूँ
-श्यामल सुमन
shyamalsuman@yahoo.co.in

Wednesday, September 7, 2016

ये दुनिया किसी के बगैर अधूरी नहीं होती...डॉ. विजय कुमार सुखवानी



इन्सान की हर ख्वाहिश पूरी नहीं होती
हर अर्ज़ी की किस्मत में मंजूरी नहीं होती

कौन कहता है फ़ासले दूरी से होते हैं
फ़ासले वहीं होते हैं जहाँ दूरी नहीं होती

दुनियादारी के फैसले तो ज़ेहन से होते हैं
इनमें दिल की रजामंदी ज़रूरी नहीं होती

बेवफ़ाई कुछ लोगों की फितरत होती है
हर बेवफ़ाई के पीछे मजबूरी नहीं होती

वो लोग नाकाम रहते हैं दुनिया में अक्सर
जिनसे मेहनत तो होती है जीहजूरी नहीं होती

ये भरम है कि हमीं से मुकम्मल है दुनिया
ये दुनिया किसी के बगैर अधूरी नहीं होती
-डॉ. विजय कुमार सुखवानी

Saturday, September 3, 2016

जिसकी है नमकीन ज़िन्दगी............श्यामल सुमन



जो दिखती रंगीन ज़िन्दगी
वो सच में है दीन ज़िन्दगी

बचपन, यौवन और बुढ़ापा
होती सबकी तीन ज़िन्दगी

यौवन मीठा बोल सके तो
नहीं बुढ़ापा हीन ज़िन्दगी

जीते जो उलझन से लड़ के
उसकी है तल्लीन ज़िन्दगी

वही छिड़कते नमक जले पर
जिसकी है नमकीन ज़िन्दगी

दिल से हाथ मिले आपस में
होगी क्यों ग़मगीन ज़िन्दगी

जो करता है प्यार सुमन से
वो जीता शौकीन ज़िन्दगी

-श्यामल सुमन
shyamalsuman@yahoo.co.in

Friday, September 2, 2016

मंजिल मिले न मिले...विजय कुमार सुखवानी



न मिली छांव कहीं, यूँ तो कई शज़र मिले
वीरान ही मिले सफ़र में जो भी शहर मिले

मंजिल मिले न मिले, मुझे काई परवाह नहीं
मुझे तलाश है मंज़िल की, मंज़िल को ख़बर मिले

हर गुनाह इंसान के चेहरे पर दर्ज रहता है
देखना अगर किसी रोज़ आईने से नज़र मिले

छोटी - सी बात का लोग फ़साना बना देते हैं
अब कैसे यहां लोग किसी से कोई खुलकर मिले

सबको मिला कुछ न कुछ ख़ास क़ुदरत से
फूलों को मिली ख़ुशबू परिन्दो को पर मिले

बहुत मुश्किल से मिलता है कोई चाहने वाला
खोना मत तुम्हें कोई शख़्स ऐसा अगर मिले

कहां हूँ किस हाल में हूँ कोई बताए मुझे
एक मुद्दत हुई मुझे अपनी ही खबर मिले

-विजय कुमार सुखवानी
v_sukhwani@rediffmail.com

Tuesday, July 26, 2016

सावन बहका है...........रजनी मोरवाल


लो, सावन बहका है 
बूँदों पर है खुमार, मनुवा भी बहका है। 

बागों में मेले हैं
फूलों के ठेले हैं,
झूलों के मौसम में
साथी अलबेले हैं।

कलियों पर है उभार, भँवरा भी चहका है।

ऋतुएँ जो झाँक रहीं 
मौसम को आँक रहीं,
धरती की चूनर पर
गोटे को टांक रहीं।

उपवन पर हो सवार, अंबुआ भी लहका है।

कोयलिया टेर रही
बदली को हेर रही,
विरहन की आँखों को 
आशाएँ घेर रही। 

यौवन पर है निखार, तन-मन भी दहका है।
रजनी मोरवाल
rajani_morwal@yahoo.com

Tuesday, July 19, 2016

अरेंज्ड मैरिज....अवधेश कुमार झा

 "बधाई हो आप बाप बनने वाले हैं।"

सुनकर उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा उमेश ने उत्साह से पूछा, "कब?"

डॉक्टर मुस्कुराते हुए बोली, "बस चार महीने और इंतज़ार।"
उसकी ख़ुशी जाती रही उसने धीरे से पूछा, "अगर हम अभी न चाहें तो?"

"सॉरी अब बच्चा बड़ा हो चुका है और माँ काफ़ी कमज़ोर है; उसकी जान को बहुत ख़तरा हो सकता है।"
उसके बदले रुख से डॉक्टर भी हैरान हो गई लेकिन वो क्या बताता कि शादी को तीन महीने ही हुए हैं।
रिपोर्ट और पत्नी को लेकर चुपचाप निकल लिया। 

गाड़ी में भी ख़ामोशी छायी रही। बहुत हिम्मत करके पत्नी की तरफ़ देखा, "कौन था?" 
"क्या फ़ायदा शादी की रात ही वो सुसाईड कर चुका है।"

थोड़ी देर चुप रहने के बाद धीरे से बोला, "दुनियाभर के मेडिकल सॉल्यूशन भी तो होते हैं।"

"उसके विजातीय होने से घर में इतना बवाल मचा था कि अपने शरीर की तरफ़ ध्यान ही नहीं गया, फिर शादी और यहाँ नई बहू की रस्में। सच पूछो तो अपने बारे में सोचने का मौक़ा ही नहीं मिला," कहते हुए उसने सर झुका लिया।

"ये पत्थर जीवन भर सीने पर रखकर जीना होगा?"
"यही जीवन है मैं भी तो एक मौत का कारण बनकर जी रही हूँ न," 
रूखा सा जबाब देकर उसने मुँह फेर लिया।

"लड़कियाँ बहुत बहादुर होती हैं," 
कहकर दरवाज़ा खोला उसने और चलती गाड़ी से 
पुल के नीचे छलाँग लगा दी।











-अवधेश कुमार झा

awdheshkumar.jha@gmail.com

Tuesday, June 28, 2016

आँखों में है चाँदनी, होठों पर अब गान




आँखों में है चाँदनी, होठों पर अब गान।
मन से मन है मिल गया, त्यागा जब अभिमान ।।1।।

तुलसी चौरा सिंचती, देती संध्या दीप।
माँ के मन में प्रार्थना, सब जन रहें समीप।।2।।

जीवन रैना ढल रही, पाया कभी न चैन।
मिल जाये अब एक छवि, तरसें कोरे नैन।।3।।

सूखे पत्ते टूटकर, करते हैं अफ़सोस।
लब पर उनके भी कभी, ठहरी थी ये ओस।।4।।

आँखों से पानी बहे, हिये विरह की आग।
जीवन भर मिटता नहीं, दामन से ये दाग़।।5।।

मन के तार बजा गई, पायल की झनकार।
रुनझुन रुनझुन जब सुनी, भूल गए तकरार।।6।।


बेटी घर की लाड़ली, बाँटे सबको प्यार।
कौन करे बेटी बिना, रिश्तों की मनुहार।।7।।

कहने को तो हो गए, हर ग़म से आज़ाद।
फिर क्यों है पसरा हुआ, घर घर में अवसाद।।8।।

बाबूजी गुमसुम हुए, पसरा घर में मौन।
सींचे अम्मा के बिना, तुलसी चौरा कौन।।9।।

अमराई सूनी पड़ी, कोयल धारे मौन।
कौओं की चौपाल में, मीठा बोले कौन।।10।।

बोल तुम्हारे बन गए, जीवन का नासूर।
लम्हा था जो ले गया, हमको तुमसे दूर।।11।।

विधना भारी छल करे, नाम दिया है प्रीत।
जीवन भर गाते रहे, होठ विरह के गीत।।12।।

समय सदा गढ़ता रहा, कर दुःखों के वार।
हँसकर हम सहते रहे, तब पाया सत्कार।।13।।

अब मुझको होता नहीं, दूरी का अहसास।
देखा आँखें मूँद कर, पाया हरदम पास।।14।।

मन धरती पर हैं उगे, संदेहों के झाड़।
जब छोटी सी बात भी, बनती तिल से ताड़।।15।।

मर्म धर्म का खो गया, खोया आपस का लाड़
अब आगन्तुक को मिलें, घर के बंद किवाड़।।16।।

बच्चे परदेसी बने, पथ देखें माँ-बाप।
सब कोई हैं भोगते, सुविधाओं का शाप।।17।।

मेघ पीटते रह गए, आश्वासन के ढोल।
सूखा धरती का हलक, गुम हैं मीठे बोल।।18।।

सावन की बदली लगे, आँखों का अनुवाद। 
डूब जहाँ आकण्ठ हम , भूले हैं प्रतिवाद।।19।।

धवल- ज़र्द चाँदनी, गई झील में झाँक।
पल-पल वो छवि बदलती, रही रूप को आँक।।20।।

आँख तरेरे दुपहरी, मारे जेठ दहाड़।
राही तरसें छाँव को, सूख गए हैं हाड़।।21।।

-अनिता मंडा
सुजानगढ़, राजस्थान
anitamandasid@gmail.com