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Sunday, June 28, 2020

अंतिम सत्य .....अनमोल तिवारी कान्हा

अंतिम सत्य ……
होनी हैं मृत्यु निश्चित
फिर मनु ………
क्यों हो तुम द्वंद्व में
देख इस प्रलय को।।

ये परिवर्तन तो  अरे!
महज थोथी कपूर हैं
जो बदल लेती हैं रूप नया,
पाकर धूप हवा का संग
और घोल देती हैं अपनी
सुगंध धरा के उपवन में!

फिर ऐसे ही निर्जीव सा
बैठा हैं तू  भला क्यों  ?
बना कोई प्रयोजन अहो!
निकाल कुछ सार अहो!
फिर  किस्मत चमकेगी तेरी
होगा जब निर्माण नया,
होगा फिर से नया सवेरा
गुंजित होगा गान नया!
- अनमोल तिवारी कान्हा
अनहद कृति

Monday, December 24, 2018

हाइकु गुलशन...अशोक बाबू माहौर

सड़क चौड़ी 
ऊबड़ खाबड़ है 
पथ दुर्गम। 

आँखें कजरी 
गाल लालिमा से हैं 
होंठ गुलाबी। 

पानी बहता 
नदी उफान भरी 
बारिश तेज़ । 

चादर फटी 
ठण्ड आफत लाती 
ओढ़ता कौन। 
-अशोकबाबू माहौर

Wednesday, August 1, 2018

ख़्वाब मेरी आँख में........डॉ. प्रेम लता चसवाल ''प्रेमपुष्प''

ख़्वाब मेरी आँख में पलते रहे हैं। 
अहर्निश हर-पल वही सजते रहे हैं।। 

मोतियों से जो सितारे आसमां में,
आँख से मेरी ही तो झरते रहे हैं। 

रेत के टीले पे जा के देखिये, वो  
कल्पना की मृगतृषा रचते रहे हैं। 

वो न इन अश्कों से भीगेंगे कभी भी,
जिनके मन पर-पीर से बचते रहे हैं।  

'प्रेम' के परवाज़ से मत पूछिए, क्यों 
हौंसले उनको हसीं लगते रहे हैं।। 
-डॉ. प्रेम लता चसवाल ''प्रेमपुष्प''

Friday, January 5, 2018

मैं उसकी माँ हूँ....रश्मि भटनागर


पहली बार जब उसे छुआ,
लगा..ओस में भींगे गुलाब को छुआ..! 
उसकी चमकती आँखों ने हर बार 
मेरी आँखों में पालते सपनों को छुआ। 

दुःख की तेज़ हवाओं में उसने 
हर बार हौले से मेरे कंधे को छुआ,
उसकी हर छुअन ने हर बार 
मेरी उड़ान और हौसले को छुआ। 

उलझी-उलझी उलझनों में सदा 
उसकी सही सोच ने मेरी समझ को छुआ। 
उसके दिल ने हर बार 
मेरे दिल की धड़कनों को छुआ। 

इसीलिए मैं अब तक ज़िंदा हूँ 
क्योंकि...वो मेरी बेटी है...और 
मैं उसकी माँ हूँ।  

-रश्मि भटनागर

Monday, April 17, 2017

बंधन .........शबनम शर्मा











हम कब, कैसे बंध 
जाते हैं 
रिश्तों की डोर में 
पता ही नहीं चलता, 
रिश्ते नहीं टूटते,
हम हो जाते ज़ार-ज़ार, 
टुकड़े-टुकड़े,
बस दिखता है हमें 
सिर्फ़ वो लम्हा, जब 
पहली बार बंधे थे हम 
उस डोर से, 
डोर, कब कच्ची हुई, 
कब धागे अलग-अलग हो गये, 
खिसक गई हमारे 
पाँव के नीचे की ज़मीन, 
चूर-चूर हो गया हमारा 
अस्तित्व और मिल गये 
हम मिट्टी में। 
-शबनम शर्मा


Monday, April 10, 2017

काँटे हैं मेरे साथ बहुत........श्रीमती आशा शैली


नदी हूँ हर तरफ़ बहने की राह रखती हूँ
कोई हो रास्ता उस पर निगाह रखती हूँ

ये और बात है, काँटे हैं मेरे साथ बहुत
गुलाब हूँ मैं महक बेपनाह रखती हूँ

हरएक चीज़ से है प्यार का मेरा रिश्ता
हरएक फूल की मैं दिल में चाह रखती हूँ

तुम्हारी आँख में खटके न कहीं मेरी हँसी
दबा के होंठ मैं नीची निगाह रखती हूँ

हैं मेरे सीने में भी ग़म के कोहसार बहुत
मैं उन में नरगिसी फूलों की चाह रखती हूँ

बुलन्दियों की तरफ़ हर कदम ही चलना है
मैं आसमान पे शैली निगाह रखती हूँ
-श्रीमती आशा शैली 
मूल रचना

Sunday, April 9, 2017

जोड़-तोड़.....श्रीमती आशा शैली

बहुत गरीब थी वह, न घर न रोजग़ार। कभी दिहाड़ी-मज़दूरी मिल जाती और कभी-कभी उसमें भी नागा हो जाता। किराये के एक कमरे में ही नहाना-खाना और सोना सभी कुछ। पति का यह हाल था कि कभी कमाया, कभी घर बैठ कर दारु पी ली और माँ-बेटी को पीट दिया। माँ को मजूरी मिल गई तो जै-हरि वर्ना जो घर में हुआ उसी से काम चला लिया। पति चार दिन आ जाता और फिर गायब हो जाता। कभी-कभी माँ-बच्चों को दूसरों का दरवाज़ा भी देखना पड़ता। मायका दस घरों की दूरी पर होने के कारण उन्हें भूखा सोना नहीं पड़ता था वर्ना ऐसा होने में भी कोई कसर नहीं थी। 



ऐसे में उसका छोटा बच्चा बीमार हो गया। दर्द से छटपटाते बच्चे को लेकर वह डाक्टर के पास गई तो डाक्टर ने आप्रेशन करने को कह दिया। कुल ख़र्चा लगभग दस हज़ार बताया गया। जिस औरत के पास पैरों के लिए चप्पल ख़रीदने के पैसे न हों उसके लिए दस हज़ार आकाश-सुमन ही तो था, परंतु माँ थी वह, बच्चे को तड़पता कैसे देख सकती थी?

पूरे गाँव में इस घर से उस घर मदद माँगते उसे जब पन्द्रह दिन हो गए तो गाँव के मुखिया ने उसे सरकारी अस्पताल ले जाने की सलाह दी जहाँ बिना पैसे के बच्चे का आपरेशन हो सकता था।

बच्चे की माँ सोच रही थी कि इतना बड़ा गाँव है, यदि कुछ लोग उसे पाँच-पाँच सौ रुपये भी दे दें तो वह बच्चे के इलाज के बाद भी कुछ तो बचा ही लेगी और कुछ दिन का पेट का गुज़ारा हो जाएगा, परन्तु ऐसा नहीं होना था सो नहीं हुआ। 

पूरे गाँव में गिड़गिड़ाने के बाद भी उसे कहीं से एक पैसे की भी सहायता नहीं मिली। पंचायत प्रधान ने तरस खाकर बच्चे को सरकारी अस्पताल में भर्ती करवा दिया। 

रैडक्रास की सहायता से बच्चे का इलाज तो हो गया परन्तु उसका जोड़-तोड़ धरा का धरा रह गया। उसकी दिनचर्या घूम फिर कर उसी पुराने ढर्रे पर आ गई।

-श्रीमती आशा शैली 

Friday, March 17, 2017

दुनिया बदली खुद भी बदलो.........सुखमंगल सिंह



हृदय द्वार बंद हों खोलो,
प्रेम सरोवर दुबकी ले लो।
घिरे प्रलय की घोर घटाएं,
शान्ति दीप निज धरा सजा दो।

लोकहित में हठता हृद छोडो,
बदले समाज निजता तोड़ो।
चादर मैली शुद्धिकरण करा लो,
दुनिया बदली खुद भी बदलो।

भरा पिटारा सौगातों का,
बंद अमृतघट 'मंगल' खोलो।
सडांध से भरा जो कुनबा,
सरयू में आ कर मुख धो लो।।

-सुखमंगल सिंह

Sunday, December 4, 2016

बेटी ही बेटा है..शबनम शर्मा

छुट्टियों के बाद स्कूल में मेरा पहला दिन था। नीना को सामने से आता देख मुझे अचम्भा सा हुआ। वह स्कूल की पी.टी. अध्यापिका है। पूरा दिन चुस्त-दुरुस्त, मुस्काती, दहाड़ती, हल्के-हल्के कदमों से दौड़ती वह कभी भी स्कूल में देखी जा सकती है। 
आज वह, 
वो नीना नहीं कुछ बदली सी थी। उसने अपने सिर के सारे बाल मुंडवा दिये थे। 
काली शर्ट व पैंट पहने कुछ उदास-सी लग रही थी। कुछ ही समय में पता चला कि इन छुट्टियों में उसके पापा की मृत्यु हो गई थी। 
सुनकर बुरा लगा। शाम को मैं करीब चार बजे उसके घर गई। उसने मुझे बैठक में बिठाया। पानी लाई व मेरे पास बैठ गई। 

पूछने पर पता चला कि उसके पिता की मृत्यु हृदय गति रूकने के कारण हुई थी। रात का समय था, वह उन्हें अस्पताल ले गई जहाँ डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। 

घर आकर उसने अपने रिश्तेदारों को पिता जी की मृत्यु की सूचना दे दी। सुबह पूरा जमघट लग गया। सवाल कि संस्कार पर कौन बैठेगा? 
चाचा के 3 बेटे थे। तीनों खिसक लिये। समय का अभाव था। नीना की दो बड़ी बहनें शादीशुदा थी, उनके बच्चे व पति भी व्यस्त थे। 

वह 10 दिन बैठ नहीं सकते थे। लाश को उठाने से पहले यह कानाफूसी नीना तक पहुँच गई। वह माँ के पास बैठी थी। उसने आँसू पोंछे व पिछवाड़े वाले ताऊजी से कहा जो रात से उनके साथ थे, ‘‘ताऊजी, मैं करूँगी पिताजी का अन्तिम संस्कार, मैं बैठूँगी सारी पूजा पर।’’ 

सबके दाँतों तले अंगुली आ गई। पर नीना ने किसी की परवाह न की। कंधे पर सफ़ेद कपड़ा रख कर, सबसे पहले अपने पापा की लाश को कंधा दिया व शमशान तक पूरी विधिपूर्वक सब कार्य किया। 

बताते-बताते उसकी आँखें कई बार नम हुई। बोली, ‘‘मैडम, मेरे पापा अक्सर कहते थे मेरी दो बेटियाँ, एक बेटा है। मुझे क्या पता था कि आज...........
’’ मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, ‘‘नीना, मुझे तुझ पर गर्व है।’’
-शबनम शर्मा

Thursday, December 1, 2016

उलटफेर भरी दुनिया......कश्मीर ठाकुर


हर दम
रूआंसा रहता हूँ 
ताज्जुब!
मुझे रोना आता नहीं

उदासियों के
बबंड़र में
फंसा-धंसा हूँ
आश्चर्य!
मुझे ग़मगीन होना आता नहीं। 

ये उलटफेर श्री
है
सारी की सारी दुनिया
जीना चाहता हूँ 
मगर
मरना आता नहीं!
-कश्मीर ठाकुर 

Tuesday, November 29, 2016

मेरे बच्चों से महकता है......कवियत्री सीमा गुप्ता


इनकी ख़ुशबू से मुअत्तर है ये गुलशन मेरा,
मेरे बच्चों से महकता है नशेमन मेरा।

खेलते देखती हूँ जब भी कभी बच्चों को,
लौट आता है ज़रा देर को बचपन मेरा।

मुझको मालूम है दरअस्ल है दुनिया फ़ानी,
मोहमाया में गुज़र जाए न जीवन मेरा।

तू जो आ जाए तो बरसात में भीगें दोनों,
सूखा-सूखा ही गुज़र जाए न सावन मेरा।

खो गई कौन सी दुनया में न जाने 'सीमा',
आ तरसता है तेरे वास्ते आँगन मेरा।

-कवियत्री सीमा गुप्ता 

Monday, November 28, 2016

उड़ कर दिखा दे...........दिव्या भसीन



बन जा मिट्टी
या मिट्टी बना दे,

बंद कर ले पिंजरा, अंदर से, 
या उड़ कर दिखा दे। 

सीख जा तैरना, उलटी दिशा में
या लहरों को दिशा बदलना सिखा दे। 

बन जा पतंगा, जल जा 
या बन लौ और सबको जला दे। 

बन राहों का पत्थर, खा ठोकरें 
या बन मूरत सबको झुका दे। 

ले फैसला, कुछ तो कर 
बदल जा
या बदलाव ला दे। 

-दिव्या भसीन

Sunday, November 27, 2016

समझदार बहू.........शबनम शर्मा


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शाम को गरमी थोड़ी थमी तो मैं पड़ोस में जाकर निशा के पास बैठ गई। उसकी सासू माँ कई दिनों से बीमार है। सोचा ख़बर भी ले आऊँ और बैठ भी आऊँ। मेरे बैठे-बैठे उसकी तीनों देवरानियाँ भी आ गईं। 

‘‘अम्मा जी, कैसी हैं?’’ शिष्टाचारवश पूछ कर इतमीनान से चाय-पानी पीने लगी। फिर एक-एक करके अम्माजी की बातें होने लगी। सिर्फ़ शिकायतें,  ‘‘जब मैं आई तो अम्माजी ने ऐसा कहा, 
वैसा कहा, ये किया, वो किया।’’ 
आध घंटे बाद सब यह कहकर चली गईं कि उन्होंने 
शाम का खाना बनाना है। बच्चे इन्तज़ार कर रहे हैं। 
कोई भी अम्माजी के कमरे तक न गया। 

उनके जाने के बाद मैं निशा से पूछ बैठी, ‘‘निशा अम्माजी, आज 1 साल से बीमार हैं और तेरे ही पास हैं। तेरे मन में नहीं आता कि कोई और भी रखे या इनका काम करे, माँ तो सबकी है।’’ 

उसका उत्तर सुनकर मैं तो जड़-सी हो गई। वह बोली, ‘‘बहनजी, ये सात बच्चों की माँ है। इसने रात-रात भर गीला रहकर सबको पाला। ये जो आप देख रही हैं न मेरा घर, पति, बेटा, शानो-शौकत सब इसकी है। अपनी-अपनी समझ है। मैं तो सोचती हूँ इन्हें क्या-क्या खिला-पिला दूँ, कितना सुख दूँ, मेरा बेटा, इनका पोता सुबह-शाम इनके पास बैठती हैं, ये मुस्कराती हैं, इन्हें ठंडा पिलाता है तो दुआएँ देती हैँ। जब मैं इनको नहलाती, खिलाती-पिलाती हूँ, तो जो संतुष्टि मेरे पति को मिलती है, देखकर मैं धन्य हो जाती हूँ और वह बड़े ही उत्साह से बोली, एक बात और है ये जहाँ भी रहेंगी, घर में खुशहाली ही रहेगी, 
ये तो मेरा तीसरा बच्चा बन चुकी हैं।’’ और ये कहकर वो रो पड़ी।

मैं इस ज़माने में उसकी यह समझदारी देखकर हैरान थी और मन ही मन उसे सराह रही थी।

-शबनम शर्मा

Monday, August 8, 2016

आओ उन्हें मीठे सपने उधार दे दें......पुष्प राज चसवाल
















आओ उन्हें 
मीठे सपने उधार दे दें, 
जो अपनी ही आँखों में 
गिर गए थे 
बहुत दिन पहले। 

आओ उन्हें 
मुक्त करायें,
जो कुंठाओं में कैद 
ग्रंथियों से घिरे, 
अपना अस्तित्व 
खोने ही वाले हैं।

आओ उन्हें 
सुबह का 
स्वप्न दें,
अदृश्य जिन्हें 
अँधेरे में, जब वे 
स्वप्निल लोक में खोए रहते 
निगलना ही चाहता है। 
    
-पुष्प राज चसवाल

Saturday, July 16, 2016

क्यों फ़रिश्तों की झुक गई आँखें...आबिद आलमी



जब कहा मैंने कुछ हिसाब तो दे। 
क्यों फ़रिश्तों की झुक गई आँखें।। 

इतने ख़ामोश क्यों हैं शहर के लोग।
कुछ तो पूछें, कोई तो बात करें॥ 

अजनबी शहर और रात का वक़्त।
अब सदा दें तो हम किसको दें॥ 

कौन आता है इतनी रात गए।
अब तो दरवाज़ा उठ के बंद करें॥ 

बहस चारागरों से क्या, लेकिन। 
सिर्फ़ इतना है मुझको जाने दे॥ 

एक लम्हा फ़सील पर 'आबिद'।
कब तलक़ शहर का तवाफ़ करे॥

-आबिद आलमी

Wednesday, November 11, 2015

दीप मेरे जल अकंपित घुल अचंचल..महादेवी वर्मा


सिंधु का उच्छवास घन है 
तड़ित तम का विकल मन है 
भीति क्या नभ है व्यथा का 
आँसुओं में सिक्त अंचल 

स्वर अकम्पित कर दिशाएँ 
मोड़ सब भू की शिराएँ 
गा रहे आँधी प्रलय 
तेरे लिए ही आज मंगल 

मोह क्या निशि के चरों का 
शलभ के झुलसे परों का 
साथ अक्षय ज्वाल सा 
तू ले चला अनमोल संबल 

पथ न भूले एक पग भी 
घर न खोए लघु विहग भी 
स्निग्ध लौ की तूलिका से 
आंक सब की छांह उज्ज्वल 

हो लिए सब साथ अपने 
मृदुल आहटहीन सपने 
तू इन्हें पाथेय बिन चिर 
प्यास के मधु में न खो चल 

धूप में अब बोलना क्या 
क्षार में अब तोलना क्या 
प्रात: हँस रो कर गिनेगा 
स्वर्ण कितने हो चुके पल 
दीप मेरे जल अकंपित घुल अचंचल 

-महादेवी वर्मा

परिचय: 
::महादेवी वर्मा:: 
आधुनिक युग की मीरा 
हिन्दी के साहित्याकाश में छायावादी युग के प्रणेता 'प्रसाद-पन्त-निराला' की अद्वितीय त्रयी के साथ-साथ अपनी कालजयी रचनाओं की अमिट छाप छोड़ती हुई अमर ज्योति-तारिका के समान दूर-दूर तक काव्य-बिम्बों की छटा बिखेरती यदि कोई महिला जन्मजात प्रतिभा है 
तो वह है ''महादेवी वर्मा''

रचना साभार अनहद कृति
(प्रस्तोता : पुष्पराज चसवाल)