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Thursday, September 30, 2021

चढ़ती उम्र के साथ .....नीलम गुप्ता

 

चढ़ती उम्र के साथ
बुढ़ापे की तरफ
जब राह हो जाती
अपनी औलाद ही
जब आंखे दिखाती
तब पतियों को
बदलते देखा है
पत्नियों की कदर
करते देखा है।

सारी दुनिया घूम ली जब
कोई रिश्ता सगा ना दिखा
भाई बहन सब रुठ गएं
मां, बाप के हाथ छूट गएं
तब जीवनसाथी का हाथ
सड़क पे पकड़े देखा है।

जवानी जब बीत गई
कमाने की इच्छा भी ना रही
भागने का जब दम ना बचा
घुटनों का दर्द जब बढ़ गया
तब पत्नी के घुटनों में
बाम लगातें देखा हैं।

पार्क में जब
किसी का दर्द सुन लिया
साथी किसी का गुजर गया
उसकी आंख का आंसू देख
घर आकर,जीवन साथी को 

हिलते हाथों से
गजरा लगाते देखा है।
चढ़ती उम्र के साथ
प्यार को भी चढ़ते देखा है।

Monday, October 5, 2020

अगर चाँद मर जाता ... त्रिलोचन शास्त्री










अगर चाँद मर जाता
झर जाते तारे सब
क्या करते कविगण तब?
खोजते सौन्दर्य नया?
देखते क्या दुनिया को?
रहते क्या, रहते हैं
जैसे मनुष्य सब?
क्या करते कविगण तब?
प्रेमियों का नया मान
उनका तन-मन होता
अथवा टकराते रहते वे सदा
चाँद से, तारों से, चातक से, चकोर से
कमल से, सागर से, सरिता से
सबसे
क्या करते कविगण तब?
आँसुओं में बूड़-बूड़
साँसों में उड़-उड़कर
मनमानी कर- धर के
क्या करते कविगण तब
अगर चाँद मर जाता
झर जाते तारे सब
क्या करते कविगण तब

- त्रिलोचन शास्त्री  

Friday, September 21, 2018

तृष्णा...वन्दना सिंह


अकेलेपन की मुझको आदत नही
पर अकेले रहना बन गई है फितरत मेरी

भीड़ से बचने का चाहत नहीं
पर तन्हाइयाँ मुझको भाने लगी है

रिश्तों की ज़िन्दगी में कमी नहीं
पर सबका प्यार मेरे नसीब में नहीं

ख़ुशियाँ तो बहुत मिली ज़िन्दगी में
पर गम भी मुझसे ज़ुदा नहीं


हर ख़्वाहिश को मंजिल मिली
पर अधूरी तमन्नाओँ की कमी नहीं

पूरी हुई है हर ख़्वाहिश
पर मन की तृष्णा बुझी नहीं

ज़िन्दगी में दोस्त तो अनगिनत मिले
पर नकाबपोश़ दुश़्मनों की कमी नहीं

लुभाती है ज़िन्दगी की रंगीनियाँ
पर श्वेत-श्याम बन गई है मेरी संगिनियाँ

हसींन लगती है सपनों की दुनिया
पर मेरी दुनियावालोंं का अपना एक जहां है

रास्ते की मुश्किलों को पारकर खुश होता है मन मेरा
पर दुविधाओँ से बचने को जी चाहता है मेरा
-वन्दना सिंह