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Sunday, March 22, 2020

हालात .....नादिर खान

नियम/अनुशासन
सब आम लोगों के लिए है
जो खास हैं
इन सब से परे हैं
उन पर लागू  नहीं होते
ये सब
ख़ास लोग तो तय करते हैं
कब /कौन/ कितना बोलेगा
कौन सा मोहरा
कब / कितने घर चलेगा
यहाँ शह भी वे ही देते हैं 
और मात भी
आम लोग मनोरंजन करते हैं 
आम लोगों का रेमोट
ख़ास लोगों के हाथों में होता है 
वे नचाते हैं
आम लोग नाचते हैं.....
मगर हालात
हमेशा एक जैसे नहीं होते
और न ही बदलने में वक़्त लगता
बस !! एक हल्का सा झटका
और खिसकने लगती है
पैरों के नीचे से ज़मीन
फिर जैसे मुट्ठी से रेत
जितना ज़ोर लगाओ
उतनी ही तेजी से फिसलते हैं हालात.....

Friday, May 19, 2017

दो क्षणिकाएँ..... नादिर खान












तुम अक्सर कहते रहे
मत लिया करो
मेरी बातों को दिल पर
मज़ाक तो मज़ाक होता है
ये बातें जहाँ शुरू
वहीं ख़त्म ....
और एक दिन
मेरा छोटा सा मज़ाक
तार –तार कर गया
हमारे बरसों पुराने रिश्ते को
न जाने कैसे.........













  



घर की मालकिन ने
घर की नौकरानी को
सख्त लहजे में चेताया
आज महिला दिवस है
घर पर महिलाओं का प्रोग्राम है
कुछ गेस्ट भी आयेंगे
खबरदार !
जो कमरे से बाहर आई
टांगें तोड़ दूँगी........
-नादिर खान 

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Tuesday, November 22, 2016

रिश्ते ऐसे क्यों मै निभाऊँ....नादिर खान

दुखड़ा अपना किसको सुनाऊँ
का पहनूँ मै, और का खाऊँ

जब दामों में आग लगी हो
क्या सौदा बाज़ार से लाऊँ

मंहगाई अब मार रही है
कैसे इससे पिंड छुड़ाऊँ

खुद अपना ही बोझ बना मै
कैसे घर का बोझ उठाऊँ

विद्यालय की फीस बहुत है
अब बच्चों को कैसे पढ़ाऊँ

पैसों से हैं, बनते बिगड़ते
रिश्ते ऐसे क्यों मै निभाऊँ

हैं झूठी तारीफ के भूखे
अब इनको मै क्या समझाऊँ 

-नादिर खान

Thursday, November 3, 2016

पिता.........नादिर खान















वो छुपाते रहे अपना दर्द
अपनी परेशानियाँ
यहाँ तक कि
अपनी बीमारी भी….

वो सोखते रहे परिवार का दर्द
कभी रिसने नहीं दिया
वो सुनते रहे हमारी शिकायतें
अपनी सफाई दिये बिना ….

वो समेटते रहे
बिखरे हुये पन्ने
हम सबकी ज़िंदगी के …..

हम सब बढ़ते रहे
उनका एहसान माने बिना
उन पर एहसान जताते हुये
वो चुपचाप जीते रहे
क्योंकि वो पेड़ थे
फलदार
छायादार ।









-नादिर खान

Thursday, September 22, 2016

मुझे दिल से पुकारा उसने.........नादिर खान


मुद्दतों बाद मुझे दिल से पुकारा उसने
धीरे धीरे ही सही खुद में उतारा उसने 

मुझको हर मोड़ पे हर रोज़ सँवारा उसने
ख़ाक था मै तो, किया मुझको सितारा उसने 

बुझ रही आग को इस दिल में जलाने के लिए
दर्द का घूँट मेरे दिल में उतारा उसने

वो तो हर  हाल में हालात से लड़ सकता था
जाने क्या बात हुयी, खुद को ही हारा उसने 

ये न मालूम था, वो इतना बादल जाएगा
बस पलटते ही मेरी पीठ पे मारा उसने

दफ्न कर बैठे थे जिस आग को बरसों पहले
फिर से सुलगा दी मुझे करके इशारा उसने

आग तो आग है इन्सां को जला देती है
बदले की आग में, बस खुद को ही मारा उसने

खेल में दाँव तो उसके थे, हर इक बार मगर
बारहा मुझको अखाड़े में उतारा उसने

उसकी आवाज़ पे लब्बैक कहा है हरदम
आज़माने के लिए जब भी पुकारा उसने

ज़ख्म ही ज़ख्म दिये हमने ज़मीं को लेकिन
अपनी बाहों का दिया सबको सहारा उसने

उसकी बातों का असर ऐसा हुआ है जैसे
मेरे अन्दर कोई सैलाब उतारा उसने

पुछल्ला

फिर जगाने के लिए सोयी हुयी गैरत को
इक नया दर्द मेरे दिल में उतारा उसने


http://nadirahmedkhan.blogspot.in/2016/03/blog-post.html