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Sunday, January 5, 2020

पूरब की हूँ - श्यामल सी..... मीना चोपड़ा

"साँझ में शामिल रंगों को ओढ़े
नज़र में बटोर के मचलते मंज़र
ढलते हुए दिन के चेहरे में
मुट्ठी भर उजाला ढूँढ़्ती हूँ।
पूरब की हूँ - श्यामल सी
सूरज को अपने
गर्दिशों में ज़मीं की ढूढ़्ती हूँ।
पहन के पैरों में पायल
बहकती हवाओं की
फ़िज़ाओं के सुरीले तरन्नुम में
गुनगुनाहटें ज़िन्दगी की ढूढ़्ती हूं

पूरब की हूँ - श्यामल सी
सूरज को अपने
गर्दिशों में ज़मीं की ढूढ़्ती हूँ।

उठती निगाहों में
भर के कायनात का काजल
दूर कहीं छोर पर उफ़क के
टिमटिमाता वो सितारा ढूढ़्ती हूं

पूरब की हूँ - श्यामल सी
सूरज को अपने
गर्दिशों में ज़मीं की ढूढ़्ती हूँ।

शोख फूलों को
घूंट मस्ती के पिलाकर
चहकती धूप को आंगन में बिछाकर
ओस की बूंद में अम्बर को ढूँढ़्ती हूँ

पूरब की हूँ - श्यामल सी
सूरज को अपने
गर्दिशों में ज़मीं की ढूढ़्ती हूँ।"

Thursday, January 2, 2020

सर्द सन्नाटा ....मीना चोपड़ा

सर्द सन्नाटा ...
सुबह  के  वक़्त  
आँखें  बंद कर के देखती हूँ जब  
तो यह जिस्म के कोनो से
ससराता हुआ निकलता जाता  है
सूरज की किरणे गिरती  हैं
जब भी इस पर
तो खिल उठता है  यह
फूल बनकर
और मुस्कुरा देता है
आँखों में मेरी झांक कर



कभी यह जिस्म के कोनो में
ठहर भी जाता है  
कभी गीत बन कर
होठों पर रुक जाता है
और कभी
गले के सुरों को पकड़ 
गुनगुनाता है 
फिर शाम के 
रंगीन अंधेरों  में घुल कर
सर्द रातों में गूंजता है अक्सर  
सर्द सन्नाटा

मेरे करीब आजाता है बहुत
मेरा हबीब
सन्नाटा
-मीना चोपड़ा

Friday, October 25, 2019

कौन थी वह ...मीना चोपड़ा

कौन थी वह
जो एक बिन्दु-सी
सो रही थी पल-पल --  
मीठी-सी नींद को
आँखों में भरकर
कोख की आँच में
माँ की सर रखकर।

चाहती थी वह
इस नये संसार में
खुलकर भ्रमण करना
एक नये वजूद को
पहन कर तन पर
ज़िन्दगी की चोखट पर
पहला कदम रखना
और फिर
इन जुड़ते और टूटते पलों
से बनी रिश्तों की सीढ़ी पर
लम्हा-लम्हा चढ़ना।
क्या था यही
जन्म को अपने
सार्थक करना?

कौन थी वह
जो एक बिन्दु-सी
सो रही थी पल-पल  ......
-मीना चोपड़ा
मूल रचना

Thursday, October 24, 2019

पूरब की हूँ - श्यामल सी ....मीना चोपड़ा

शाम में शामिल रंगों को ओढ़े
नज़र में बटोर के मचलते मंज़र
ढलते हुए दिन के चेहरे में
मुट्ठी भर उजाला ढूँढ़्ती हूँ।
पूरब की हूँ - श्यामल सी

सूरज को अपने
गर्दिशों में ज़मीं की ढूढ़्ती हूँ।
पहन के पैरों में पायल
बहकती हवाओं की
फ़िज़ाओं के सुरीले तरन्नुम में
गुनगुनाहटें ज़िन्दगी की ढूढ़्ती हूं
पूरब की हूँ - श्यामल सी

सूरज को अपने
गर्दिशों में ज़मीं की ढूढ़्ती हूँ।
उठती निगाहों में
भर के कायनात का काजल
दूर कहीं छोर पर उफ़क के
टिमटिमाता वो सितारा ढूढ़्ती हूं
पूरब की हूँ - श्यामल सी

सूरज को अपने
गर्दिशों में ज़मीं की ढूढ़्ती हूँ।
शोख फूलों को
घूंट मस्ती के पिलाकर
चहकती धूप को आंगन में बिछाकर
ओस की बूंद में अम्बर को ढूँढ़्ती हूँ
पूरब की हूँ - श्यामल सी

सूरज को अपने
गर्दिशों में ज़मीं की ढूढ़्ती हूँ।"
-मीना चोपड़ा