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Sunday, July 5, 2020

कैसी जलन हाय इन दिनों ...अचल दुबे

है ज़िंदगी को कैसी जलन हाय इन दिनों  है मौत के माथे पे शिकन हाय इन दिनों
है ज़िंदगी को कैसी जलन हाय इन दिनों 
है मौत के माथे पे शिकन हाय इन दिनों 

शायद मेरे ज़मीर को फ़ुर्सत न आई रास 
रहती है बेवजह सी थकन हाय इन दिनों 

रंगत रही न शोख़ियाँ, ना ख़ुशबु ना ख़ुलूस 
वीरान है हर एक अंजुमन हाय इन दिनों 

या मौला इस अज़ाब ने बरपाया क्या कहर 
होने लगी किल्लत-ए-कफ़न हाय इन दिनों 

ताज्जुब है कि इसको कोई भी टोकता नहीं 
घूमे है झूठ बे-पैरहन हाय इन दिनों 

चेहरों की जगह झूठ ही मंज़ूर था हमें 
सब ने लिया है नकाब पहन हाय इन दिनों 

ना मिलाओ हाथ किसे से, न गले मिलो ‘अचल’ 
मिलने का ये नया है चलन हाय इन दिनों 
- अचल दीप दुबे