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Wednesday, January 6, 2021

यात्रा ..इन्दु सिंह



यात्रा कितनी भी कर ली जाए
बहुत कुछ छूट ही जाता है।

सफ़र पर
सब जल्दी में रहते हैं
गंतव्य तक
थक चुके होते हैं।

उसने कहा
वह सफ़र पर है
वह इंतज़ार में रही
कि सफ़र कब खत्म हो।

मुझे यात्राएँ पसंद हैं लेकिन
यात्राएँ मुझे थका देती हैं।

यात्रा में लोगों के साथ
कोई वह भी होता है
जो वहाँ नहीं होता है।

बड़ी यात्रा पर निकलने से पूर्व
छोटी यात्राएँ ज़रूर करनी चाहिएँ।

यात्राएँ बहुत कुछ देती हैं
यात्राएँ बहुत कुछ ले भी लेती हैं।

मैं अपनी पर यात्रा अकेले हूँ
लेकिन यात्रा में बहुत लोग हैं।

लोगों में और यात्रा में गहरा संबंध होता है।

यात्रा के अनेक पड़ाव होते हैं
कुछ अच्छे,कुछ ठीक तो कुछ बेहद बुरे।

पड़ाव न हों तो यात्री थकान से भर जाएँगे।

पड़ाव यात्रा के चलते रहने के लिए आवश्यक हैं।

कभी-कभी अप्रत्याशित पड़ाव
यात्रा को बाधित कर देते हैं।

कुछ लोग आपको धकेल कर
यात्रा में आगे भागते हैं
आप उन्हें सर उठा कर देखते हैं।

अक्सर सहयात्रियों को लोग याद नहीं रखते
आखिर क्या-क्या याद रखा जाए।

यात्रा लंबी हो या छोटी
समतल कभी नहीं होती है।

कुछ नदियाँ लंबी यात्रा की भागीदार होती हैं।

कुछ पेड़ स्वयं चुनते हैं
अपने मार्ग और यात्रा को।

यात्रा सदैव "यात्रीगण कृपया ध्यान दें"
कहकर सचेत नहीं करती
यात्रा में सचेत रहना पड़ता है।

हवा,पानी,व्यक्ति और शब्द निरंतर यात्रा में रहते हैं।

शब्दों की यात्रा सहयात्रियों के लिए खुराक है।


-इन्दु सिंह


Friday, October 12, 2018

मन की उलझन ....इन्दु सिंह

कभी सोचता है उलझनों में घिरा मन
क्या ठहर गया है वक्त ? नहीं,
वक्त वैसे ही भाग रहा है
कुछ ठहरा है तो वो है मन,
मन ही कर देता है कम
अपनी गति को
और करता है महसूस
ठहरे हुए वक्त को
उसे नज़र आती हैं सारी
जिज्ञासायें उसी वक्त में,सारी
निराशायें उसी वक्त में
पर ठहरा हुआ मन अचानक-
हो उठता है चंचल मृगशावक सा
और करता है पीछा उस वक्त का,
जो बीत गया है।
नहीं चल पाता जब वक्त के साथ
सोचता है तब उसका
ठहरा हुआ मन,कि ये ठहराव
वक़्त का नहीं
ये तो है सिर्फ़ मन की उलझन।
-इन्दु सिंह