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Friday, June 29, 2018

मौन शोध.....डॉ. इन्दिरा गुप्ता


मौन तोड़ क्यूँ बात करें 
पुनि घात और प्रतिघात करें 
बेहतर थोड़ा सा चुप रह कर 
मन से मन की बात करें !

चिंतन और मनन की संतति 
मौन सुपुत्र सा ही साजे 
रार प्रतिकार उसे नहीं भाता 
हर मन का संताप हरे !

मौन विधा अति सुन्दर सुथरी 
कभी ना कोई अहित करें 
ना दूजे का ना ही खुद का 
मौन  रहे बस शोध करे !

-डॉ. इन्दिरा गुप्ता  ✍

Sunday, May 20, 2018

आदत बुरी है ...डॉ. इन्दिरा गुप्ता


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उनकी नजरों मैं हमने देखा 
बला की चाहत छुपी हुई है 
छलक के आँसू निकल के बोला 
यही तो आदत बड़ी बुरी है ! 

चलते चलते मुंडे अचानक 
तिरछी नजर से जो हमको देखा 
भीगे से लब मुस्कुरा के बोले 
कहके ना जाना आदत बुरी है ! 

आंखों मैं आँसू हँसी लबों पे 
दुआ ये किसके लिये हुई है 
किसकी किस्मत मैं हाजरीनो
ये कयामत की बानगी है ! 

रुके या जाये नजर ये बोले 
लफ्जों में क्या खूब तासीर सी है 
बिन कहे ही गजल सी कह गये 
यही तो उनकी मौसकी है ! 

डॉ. इन्दिरा ✍

Friday, March 30, 2018

उदय और विलय है....डॉ. इन्दिरा गुप्ता


मन आँगन 
भाव गौरैय्या 
कैसा ये उदगम है 
दाना चुगना 
कलरव करना 
नित्य प्रति चिंतन है ! 

द्विगणित भाव 
सजे निर्मल से 
कृति समान चिन्हित है 
प्रसुन सरीखे 
पल्लवित -पुष्पित 
अमि कलश पावन है ! 

तृप्त भावना -तृप्त साधना 
तृप्ति ही 
वैभव है 
प्रणव -ओम प्रभु 
निराकार सा 
उदय और विलय है ! 

भावों की 
सम्पूर्ण अवस्था 
सहज और सरल है 
हिय मै बहती 
चिर अभिलाषा 
शाँत चित्त मनन है ! ! 

-डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍

Saturday, February 17, 2018

सहज गति बन जाये...डॉ. इन्दिरा गुप्ता


जीवन गहन गहर सम लागे 
जितनो जीते जाओ
गहराई त्यों त्यों बढ़े 
जितनो वामें समाओ! 

दिव्य रोशनी ज्ञान की 
रस्सी वाय बनाओ 
पकड़ रास फिर उतरो गहरे 
तनि ना घबराओ !

एकत्व रहे यदि भाव बिच
सहज गति बन जाये
भाव बने तब एक अनंता
सफल -सफलतम हो जाओ ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता

Thursday, February 15, 2018

इश्क-ए - रवायत भारी है...डॉ. इन्दिरा गुप्ता

रात अकेली चाँद अकेला 
गुजर रहा हें  सन्नाटा 
चँद्र किरण जल बीच समाई 
जल उतरा जो चाँद ज़रा सा ! 
लहर चंदनिया  झुला रही है 
एहसास -ए - दिल भी डोल रहा 
चिर - चिर  झींगुर सा सन्नाटा 
बन्द द्वार सब खोल रहा ! 
तट - तरनी जल शाँत बह रहा 
चीड़ वृक्ष है दम साधे 
लो आज भी रजनी चल दी 
लिये अरमान प्यासे - प्यासे ! 
रोज आस बँधती टूटती 
सिलसिला आज भी जारी हें 
नहीँ आस छूटती फिर भी 
इश्क-ए - रवायत  भारी  है ! 

-डॉ. इन्दिरा गुप्ता✍

Saturday, January 13, 2018

पुरानी हुई कहानी...डॉ. इन्दिरा गुप्ता

ज़िंदगी का फलसफा 
कुछ इस तरह समझा रही 
उम्र की क्या बिसात जो रोके 
जब हिम्मते जवानी छा गई !  

पोपली मुस्कान देखो 
हँस के यू फरमा रही 
जोश कब रोके रुका है 
हमको भी इबारत आ गई !  

जर्जर  बँधन खोल रही है 
अब ये वृद्ध जवानी 
घर से हमको बेघर करदे 
ये ....पुरानी हुई कहानी ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता

Saturday, December 30, 2017

कैसे किसको होश रहे.....डॉ. इन्दिरा गुप्ता

नख से शिख तक भई सिंदूरी 
लाजवंती सी नार 
आयेगे वो आय रहे है 
सुनकर हुई गुलनार ! 

आवन को संदेशो ऐसो 
सुर छेड़े मन माही 
सरगम की सी सांसै है गई 
कानो में धड़कन पड़े सुनाई ! 

नयन मूँद निरखे मन माही 
लब स्मित मुस्कान सजे 
ऐसे मै गर आये साजन 
कैसे किसको होश रहे ! 

सात हाथ का घूँघट ओढ़ा 
उस पर लाल चुनरिया 
शर्म से लाल रुखसार हो गये 
लालम लाल बहुरिया ! 

- डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍

Friday, December 29, 2017

त्राहिमाम.....डॉ. इन्दिरा गुप्ता


हाय विधाता कलम क्या कहे 
त्राही- त्राही मच रही यहाँ 
जीवित को खा रहे हो भक्षक 
कलम मौन ना रहे  वहाँ ! 

हर ओर बढ़ रहा है अनजस 
मन भी कुंद रहे भारी 
कलम भरी मसि लिख ना पाये 
क्या क्या गिनाऊँ में व्यभिचारी !  

शेष नाग अब सागर छोडो 
जग नागों के साथ रहो 
विषधर से भी अधिक विषैले 
नाग घूमते यहाँ देखो ! 

 साँसो पर पहरे है  देखो 
गिद्दों जैसे इंसा है 
नर भक्क्षो की चाहत देखो 
लाशो पर ही जिंदा है ! 

जीवित रहा ना जीवित जैसा 
मरने से पहले मर जाता 
टूट रहा प्रभु धैर्य अब तो 
और  सहा नहीँ जाता ! 

प्रभु ज़ी अब तो आसन छोड़ो 
हर ओर मची त्राही - त्राही 
जीवित रहना अब दुष्कर है 
कलम द्रवित सी हो आई ! 

कैसे चुप रहूँ में हाये 
कवि मन तो चीत्कार करे 
अति भीषण पीडा होती है 
कब तक  लेखनी मूक रहे ! 

हे मधुसूदन हे बनवारी 
हे गुणाकार हे जग पालक 
दया धर्म का नाश हो रहा 
त्राहिमाम हे गोपालक ! 

ज़रा नेत्र खोल कर देखो 
क्या थे हम क्या हो गये यहाँ 
एक बार तो सुध लो स्वामी 
धरा लोक जो तूने गढ़ा ! 

क्या प्रलय हुऐ पर आओगे
तब आकर क्या कर पाओगे 
वचन टूट जायेगा तेरा 
बस मन माही पछताओगे ! 

अति सदैव वर्जित है प्रभु ज़ी 
प्रभु तेरी हो या मेरी हो 
अति से पहले आओ गिरधर 
अब आस बची बस तेरी हो ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍

Thursday, December 28, 2017

मेरा पता बता दिया....डॉ. इन्दिरा गुप्ता

दस्तकें आहट से वो कुछ 
इस कदर झुँझला गया 
कौन है , किसने , किसी को 
मेरा पता बता दिया ! 

चैन से सोया हुआ था 
तन्हाई की चादर तान के 
बेवक्त सन्नाटे मै किसने 
शोर सा बरपा दिया ! 

वो नहीँ उनकी थी यादैं 
लिपट कर सोई हुई 
यहाँ भी सताने आ गये 
रूहे चैन गवाँ दिया ! 

जिये किस मानिंद अब तो 
सदाकत चिढ़ाने सी लगी 
ख्वाब , ख्याल , ख्वाहिशो पर 
तीशा किसने चला दिया ! 

राह्तेतलब कहाँ सुकूँ है 
सिर्फ जीना है गुनाह 
इश्किया चौसर पे समझो 
हमने दाँव लगा दिया ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता .✍

Tuesday, December 26, 2017

ठण्डी भीगी ऋतु....डॉ. इन्दिरा गुप्ता

ठण्डी भीगी ऋतु आवन से 
गोरी मन गर्माये 
दरीचों से झाँक रही है 
सूनी सूनी राहें ! 

चाँद अकेला रात है तन्हा 
शीतलता बरसाये 
हिये फफोले से पड़े 
चंदनिया जली जाये ! 

कतरा कतरा शबनम बहे 
दस्तक देती जाय 
इंद्रधनुष से ख्वाब रंगीले 
कब सुरमई हो पाय ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍

Saturday, December 23, 2017

शीत के बाण.......डॉ. इन्दिरा गुप्ता


जाड़ा चाबुक पीठ पर 
धाँय धाँय बरसाये 
निर्धनता बेबस होकर 
बिलख बिलख रही जाये ! 

झीनी सी ये गुदड़ी 
कब तक ठण्ड बचाय 
सर्दी भूख और गरीबी 
सदा झगड़ती जाय ! 

कोहरा भर गया झोपड़ी 
गला रहा है हाड 
दिन दूनों रात चौ गुनो 
लहू जमातों जाय ! 

जाड़ा बैरी दरिद्र को 
शीत लहर तड़पाय 
जर्रा जर्रा कोमल काया 
जाड़े से थर्राये ! 

इत ओढ़ रजाई धुँध की 
सो गया है दिनकर भी 
धूप से कुछ मिलती गर्मी 
शीत मिटाती तनि सी ! 

निर्धन का नहीँ कोई सहाई 
ईश्वर ना इन्सान 
समय ऐसा विकट है 
बदली सबकी चाल ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍


Friday, November 24, 2017

कान्हा घूंघर पैर धरे हैं ....डॉ. इन्दिरा गुप्ता

ठुमकि ठुमकि गईया के बाड़े 
कान्हा घूंघर पैर धरे हैं 
कमर कछनियाँ खुलि खुलि जाये 
लटपटाय कर गिरत उठत है ! 

आधी कछनिया फँसी कमर मै 
आधी भूमि पर लहराये 
नाय सुधि कछु कान्हा को वाकी 
चाहे खुली के गिर ही जाये ! 

जकड़ पाँव गईया मय्या को 
एक हाथ पुनि थन पकड़त है 
काचौ दूध पिये है पचि पचि 
नैकु ना बछड़े से डरपत है ! 

गय्या अति नेह के खातिर 
पूछ से खुद सूत दूर हटाये 
कान्हा दूध पी ले पेट भर 
ममत्व भाव थन भरि भरि आये ! 

ना दूध की इच्छा कोई 
नाय कछनिया ध्यान 
गय्या के प्रति नेह का 
कान्हा कर रहे प्रतिदान ! ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍