उम्मीद-ए-वफ़ा की फितरत से शर्मिंदा हूँ मैं,
ग़ज़ब कि दगा के हादसों के बाद ज़िंदा हूँ मैं,
मुहब्बत से ऐतबार उठ गया अच्छे-अच्छों का,
शिकस्त से हौसले आज़माने वाला चुनिंदा हूँ मैं,
बिक गए ईमान जहाँ और गिरवी पड़ी ज़िन्दगी,
चकाचौंध वाले शहर का अदना बाशिंदा हूँ मैं,
इक पाक-साफ़ रूह की मलकियत रखता हूँ,
ज़हनी लाशों के शहर का वहशी दरिंदा हूँ मैं,
शोहरत के आसमानों में वो परवाज़ दूर तलक,
ख़्वाबों के पंख समेटे ज़मीं पे उतरा परिंदा हूँ मैं,
मासूम इतना नहीं की तन्हाइयों में ग़ुम हो जाऊँ,
बचपन से अम्मी कहती आफतों का पुलिंदा हूँ मैं,
'दक्ष' सोने दो अब तो, इक उमर का उनिंदा हूँ मैं,
साँसों से चलने वाली इस मशीन का कारिंदा हूँ मैं
- विकास शर्मा 'दक्ष'