
सांस गई पहचान गई है
अब कोई पहचान नहीं
टैग लगाकर मुझे लिटाया
जब से मुझ में जान नहीं
बड़ा ऐंठता फिरता था मैं
भरकर सदा जुनून से
अब तो मेरा तन भी
खाली है मेरे ही खून से
साथ सभी थे जीवन भर जो
वो भी अब ना साथ हैं
अब ना कुछ भी पास में मेरे
खाली दोनों हाथ हैं
रंग बिरंगे कपड़े पहने
सदा रहा मैं क्यूँ इतराता
आखिर मैंने पाया कफन
जो सबको पहनाया जाता
बड़ी कमाई दौलत जो थी
वो भी अब ना पास है
दो गज मिले जमीं अब तो
या कुछ लकड़ी की आस है
-कल्पना सक्सेना
