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Tuesday, March 31, 2020

मन के पलाश ...निशा माथुर

एक सुरमई भीगी-भीगी शाम, 
ओढ़कर चुनर चांदनी के नाम।

सुनो, तुम जरा मेरे साथ तो आओ,
कुछ मौसमों को भी बुला लाओ।
मैं ...... मैं बादल ले आऊं,
और इस भीगी-भीगी शाम में,
गुलमोहरी मधुमास चुराऊं।  

सुनो, तुम आज कुछ बिगड़ो, कुछ बनो, 
और आंधियां भी संग ले आओ।
मैं........मैं चिराग बन जाऊं,
और इस आंधी संग जल-जल के,
अपना विश्वास आजमाऊं।

सुनो, तुम कुछ पल पहाड़ बन जाओ, 
और सन्नाटे से लहरा जाओ।
मैं........मैं धुंधला के सांये-सी मचलूं, 
सन्नाटे में तुम्हारा नाम पुकारूं।

सुनो, तुम आज वक्त बन जाओ,
और मेरे लिए थोड़े ठहर जाओ।
मैं............मैं फिर स्मृतियां छू लूं,
दर्पण में अनुरागी छवियां निहार लूं।

सुनो, तुम आज मेरा आंगन बन जाओ,
और मेरा सपना बनकर बिखर जाओ।
मैं...मैं मन के पलाश-सी खिल जाऊं, 
अनुरक्त पंखुरी-सी झर-झर जाऊं।

सुनो, फिर एक सुरमई भीगी-भीगी शाम, 
ओढ़कर चुनर चांदनी के नाम ।
मैं........तुम्हारी आंखों के दो मोती चुराऊं
और उसमें अपना चेहरा दर्ज कराऊं।

-निशा माथुर

Tuesday, November 12, 2019

आहट जो तुमसे होकर मुझ तक आती है ...स्मृति आदित्य


रिश्तों की बारीक-बारीक तहें
सुलझाते हुए
उलझ-सी गई हूं,
रत्ती-रत्ती देकर भी
लगता है जैसे
कुछ भी तो नहीं दिया,
हर्फ-हर्फ
तुम्हें जानने-सुनने के बाद भी
लगता है
जैसे अजनबी हो तुम अब भी,

हर आहट
जो तुमसे होकर
मुझ तक आती है
भावनाओं का अथाह समंदर
मुझमें आलोड़‍ित कर
तन्हा कर जाती है।

एक साथ आशा से भरा,
एक हाथ विश्वास में पगा और
एक रिश्ता सच पर रचा,

बस इतना ही तो चाहता है
मेरा आकुल मन,
दो मुझे बस इतना अपनापन...
बदले में
लो मुझसे मेरा सर्वस्व-समर्पण....
-स्मृति आदित्य 'फाल्गुनी'
वेब दुनिया से


Thursday, October 11, 2018

उलझन.....देवेन्द्र सोनी

उलझन रहती है
सदा ही हमारे आसपास।

हर उलझन का होता है 
हल भी वहीं-कहीं
पर हमारा वैचारिक द्वंद्व 
करता है देर, इन्हें सुलझाने में।

उलझन का हमारी जिंदगी से
गहरा नाता है 
सुलझती है एक तो 
रहती है दूसरी हर दम तैयार।

उलझन, 
उपजाती है मन में नैराश्य 
पर सुलझते ही इसके 
प्रफुल्लित हो जाता है मन।

कई तरह की होती हैं
उलझनें
जो कई बार होती हैं
हमारे सोच के दायरे से बाहर।

अनायास उपजी इन उलझनों को 
सुलझाने का सरल उपाय 
यही लगता है मुझे -
बनें वैचारिक स्तर पर मजबूत
छोड़ें न धैर्य, दें दिलासा 
जूझते मन और तन को, क्योंकि -
उलझने करती हैं परेशान और
देती हैं कष्ट हमारे अंतस को।

सुलझ तो जाती ही हैं ये 
कभी न कभी पर 
ले लेती हैं हमारे आत्मबल की 
परीक्षा भी, ये उलझनें।

जब कभी हो जीवन में 
उलझनों से सामना हमारा
रखें धैर्य, न छोड़ें आत्म विश्वास।

जानते ही हैं यह हम 
सुलझ तो जाएंगी ही सभी उलझनें 
क्योंकि होती ही है ये - 
बहुधा सुलझने के लिए ।
-देवेन्द्र सोनी 

Tuesday, August 7, 2018

राह तकती, वो दो आंखे....निशा माथुर



दरवाजे की चौखट पर
राह तकती, वो दो आंखे, 
मन में आंशकाओं के उठते हुये बवंडर,
दिल मायूसी में डूबा, जैसे कोई खंडहर।
किसी भी अनहोनी को
कर अस्वीकार, 
दिमाग जा पहुंचा संभावनाओं के द्वार।
वो हर एक पल का अब जीना मरना,
कब आयेगा
उसका वो अपना... ???

दरवाजे की चौखट पर
राह तकती, वो दो पुतलियां, 
जो भीगी हैं, अहसासों की बारिश से,
जो जाग रही हैं, ममता की ख्वाहिश से।
अकुलाहट में अपनी
पलक पावड़े बिछाए ,
प्रतीक्षा की हर आहट पर देवी-देवता मनाए।
असमंजस के क्षण-क्षण को
गिनता वक्त होगा,
जाने किस हाल में उसका लाड़ला होगा ???

दरवाजे की चौखट पर
राह तकती, 
वो दो मासूम नजरें, 
वो तुतलाती-सी बोली, भाव नयन में थमे-थमे से,
वो सीने से उठता ज्वार, खड़े पांव जमे-जमे से।
छाया देता कल्पवृक्ष,
गोदी का आश्वासित बचपन,
जीवट था उसका नायक,
सवाल पूछता भोला मन।
उसके कंधों पर चढ़कर, चांद को छूने जाना है,
बता दे मेरी मां, मेरे जीवनदाता को कब आना है ???

दरवाजे की चौखट पर
राह तकती, वो दो निगाहें, 
अपनी सिलवटों का दर्द बयां कर रही है,
हर लम्हा पदचाप की सुधियां तलाश रही हैं।

कलेजा हथेली पर, सांसे घूमी-फिरी सी,
तारीखें मौन पसराए,आशाओं में झुरझुरी सी।
सूखे आंसू और दिलहाहाकार कर रोता है,
जब तिरगें में लिपटा, 
किसी जवान का जनाजा होता है !!!

-निशा माथुर

Tuesday, July 24, 2018

किस्मत से हम नहीं...देवेन्द्र सोनी

अक्सर ही हम
रोना रोते रहते हैं
अपनी फूटी किस्मत का
चाहे हमको मिला हो
कितना भी, अधिक क्यों न !

नही होता आत्म संतोष
कभी भी हमको
चाहते ही हैं -
और अधिक, और अधिक ।

ये कैसी चाहत है, सोचा है कभी !
मिलता है जितना भी हमको
वह सदा ही होता है
हमारी सामर्थ्य के अनुरूप।

मानना होगा इसे और
करना होगा संतोष
क्योंकि - वक्त से पहले और
किस्मत से ज्यादा नहीं मिलता
किसी को भी, कभी भी कुछ।

किस्मत भी बनाना पड़ता है -
सदैव कर्मरत रहकर।
कर्मों का यही हिसाब देता है
हमको वह फल, जो आता है
इस लोक और परलोक में
दोनों ही जगह काम।

बनती है जिससे फिर
नए जन्म की किस्मत हमारी।

समझ लें इसे और करें -
निरंतर मेहनत, सद्कर्म ।

खें संतोष, मानकर यह
किस्मत से हम नहीं
हमसे है किस्मत।
-देवेन्द्र सोनी

Monday, June 25, 2018

निस्तब्ध...पुष्पा परजिया

निशब्द, निशांत, नीरव, अंधकार की निशा में
कुछ शब्द बनकर मन में आ जाए,
जब हृदय की इस सृष्टि पर 
एक विहंगम दृष्टि कर जाए 
भीगी पलकें लिए नैनों में रैना निकल जाए 
विचार-पुष्प पल्लवित हो 
मन को मगन कर जाए 

दूर गगन छाई तारों की लड़ी 
जो रह-रह कर मन को ललचाए
ललक उठे है एक मन में मेरे 
बचपन का भोलापन 
फिर से मिल जाए

मीठे सपने, मीठी बातें, 
था मीठा जीवन तबका 
क्लेश-कलुष, बर्बरता का 
न था कोई स्थान वहां 

थे निर्मल, निर्लि‍प्त द्वंदों से, 
छल का नामो निशां न था 
निस्तब्ध निशा कह रही मानो मुझसे ,
तू शांति के दीप जला, इंसा जूझ रहा 

जीवन से हर पल उसको 
तू ढांढस  बंधवा निर्मल कर्मी बनकर
इंसा के जीवन को 
फिर से बचपन दे दे जरा 

-पुष्पा परजिया 

Monday, June 11, 2018

पिछले पन्नों में‍ लिखी जाने वाली कविता......तिथि दानी


अक्सर पिछले पन्नों में ही
लिखी जाती है कोई कविता
फिर ढूंढती है अपने लिए
एक अदद जगह
उपहारस्वरूप दी गई
किसी डायरी में
फिर किसी की जुबां में
फिर किसी नामचीन पत्रिका में

फिर भी न जाने क्यों
भटकती फिरती है ये मुसाफिर
खुद को पाती है एकदम प्यासा
अचानक इस रेगिस्तान में
उठते बवंडर संग उड़ चलती हैं ये
बवंडर थककर खत्म कर देता है
अपना सफर
लेकिन ये उड़ती जाती हैं
और फैला देती है
अपना एक-एक कतरा
उस अनंत में जो रहस्यमयी है।
लेकिन एक खास बात
इसके बारे में,
आगोश से इसके चीजें
गायब नहीं होतीं
और न ही होती है
इनकी इससे अलग पहचान

लेकिन यह कविता
शायद! अपने जीवनकाल में
सबसे ज्यादा खुश होती है
यहां तक पहुंचकर
क्योंकि
ब्रह्माण्ड के नाम से जानते हैं
हम सब इसे।
-तिथि दानी

Tuesday, February 13, 2018

एक नन्ही सी नाजुक-नर्म कविता .....स्मृति आदित्य


रोज ही 
एक नन्ही सी 
नाजुक-नर्म कविता 
सिमटती-सिकुड़ती है 
मेरी अंजुरि में..
खिल उठना चाहती है 
किसी कली की तरह...
शर्मा उठती है 
आसपास मंडराते 
अर्थों और भावों से..
शब्दों की आकर्षक अंगुलियां 
आमंत्रण देती है 
बाहर आ जाने का. ..
नहीं आ पाती है 
मुरझा जाती है फिर 
उस पसीने में, 
जो बंद मुट्ठी में 
तब निकलता है 
जब जरा भी फुरसत नहीं होती 
कविता को खुली बयार में लाने की...
कविता.... 
लौट जाती है 
अगले दिन 
फिर आने के लिए... 
बस एक क्षण 
केसर-चंदन सा महकाने के लिए....
-स्मृति आदित्य

Saturday, November 4, 2017

गुजर जाना चाहती हूं...फ़िरदौस ख़ान


मेरे महबूब !
तुम्हारा चेहरा
मेरा कुरान है
जिसे मैं
अजल से अबद तक
पढ़ते रहना चाहती हूं...
तुम्हारा जि‍क्र
मेरी नमाज है
जिसे मैं
रोजे-हश्र तक
अदा करते रहना चाहती हूं...

मेरे महबूब !
तुमसे मिलने की चाह में
दोजख से भी गुजर हो तो
गुजर जाना चाहती हूं...

तुम्हारी परस्तिश ही 
मेरी रूह की तस्कीन है
तुम्हारे इश्क में 
फना होना चाहती हूं...
-फ़िरदौस ख़ान 


Saturday, September 23, 2017

मैं, कीर्ति, श्री, मेधा, धृति और क्षमा हूं... स्मृति आदित्य



एक मधुर सुगंधित आहट। आहट त्योहार की। आहट रास, उल्लास और श्रृंगार की। आहट आस्था, अध्यात्म और उच्च आदर्शों के प्रतिस्थापन की। एक मौसम विदा होता है और सुंदर सुकोमल फूलों की वादियों के बीच खुल जाती है श्रृंखला त्योहारों की। श्रृंखला जो बिखेरती है चारों तरफ खुशियों के खूब सारे खिलते-खिलखिलाते रंग।

हर रंग में एक आस है, विश्वास और अहसास है। हर पर्व में संस्कृति है, सुरूचि और सौंदर्य है। ये पर्व न सिर्फ कलात्मक अभिव्यक्ति के परिचायक हैं, अपितु इनमें गुंथी हैं, सांस्कृतिक परंपराएं, महानतम संदेश और उच्चतम आदर्शों की भव्य स्मृतियां। इन सबके केंद्र में सुव्यक्त होती है -शक्ति। उस दिव्य शक्ति के बिना किसी त्योहार, किसी पर्व, किसी रंग और किसी उमंग की कल्पना संभव नहीं है।
-
'कीर्ति: श्री वार्क्च नारीणां 
स्मृति मेर्धा धृति: क्षमा।'   

अर्थात नारी में मैं, कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूं। दूसरे शब्दों में इन नारायण तत्वों से निर्मित नारी ही नारायणी है। संपूर्ण विश्व में भारत ही वह पवित्र भूमि है, जहाँ नारी अपने श्रेष्ठतम रूपों में अभिव्यक्त हुई है।   

आर्य संस्कृति में भी नारी का अतिविशिष्ट स्थान रहा है। आर्य चिंतन में तीन अनादि तत्व माने गए हैं - परब्रह्म, माया और जीव। माया, परब्रह्म की आदिशक्ति है एवं जीवन के सभी क्रियाकलाप उसी की इच्छाशक्ति होते हैं। ऋग्वेद में माया को ही आदिशक्ति कहा गया है उसका रूप अत्यंत तेजस्वी और ऊर्जावान है।  

फिर भी वह परम कारूणिक और कोमल है। जड़-चेतन सभी पर वह निस्पृह और निष्पक्ष भाव से अपनी करूणा बरसाती है। प्राणी मात्र में आशा और शक्ति का संचार करती है।   

'अहं राष्ट्री संगमती बसना 
अहं रूद्राय धनुरातीमि'   

अर्थात् - 
'मैं ही राष्ट्र को बांधने और ऐश्वर्य देने वाली शक्ति हूं। मैं ही रूद्र के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाती हूं । धरती, आकाश में व्याप्त हो मैं ही मानव त्राण के लिए संग्राम करती हूं।'  

विविध अंश रूपों में यही आदिशक्ति सभी देवताओं की परम शक्ति कहलाती हैं, जिसके बिना वे सब अपूर्ण हैं, अकेले हैं, अधूरे हैं।   

हमारी यशस्वी संस्कृति स्त्री को कई आकर्षक संबोधन देती है। मां कल्याणी है, वही पत्नी गृहलक्ष्मी है। बिटिया राजनंदिनी है और नवेली बहू के कुंकुम चरण ऐश्वर्य लक्ष्मी आगमन का प्रतीक है। हर रूप में वह आराध्या है।  

पौराणिक आख्यान कहते हैं कि अनादिकाल से नैसर्गिक अधिकार उसे स्वत: ही प्राप्त हैं। कभी मांगने नहीं पड़े हैं। वह सदैव देने वाली है। अपना सर्वस्व देकर भी वह पूर्णत्व के भाव से भर उठती है। नवरात्रि पर्व पर देवी के हर रूप को नमन। 





- स्मृति आदित्य
.......
अत्यंत हर्ष का विषय है कि 
दिनांक 23 सितंबर को वेबदुनिया 
अपनी स्थापना के 18 वर्ष पूर्ण करने जा रही है।
हार्दिक शुभकामनाएँ
-यशोदा

Thursday, June 8, 2017

चांद बेवफा नहीं होता.....स्मृति आदित्य









चांद नहीं कहता 
तब भी मैं याद करती तुम्हें 
चांद नहीं सोता 
तब भी मैं जागती तुम्हारे लिए 
चांद नहीं बरसाता अमृत 
तब भी मुझे तो पीना था विष 
चांद नहीं रोकता मुझे 
सपनों की आकाशगंगा में विचरने से 
फिर भी मैं फिरती पागलों की तरह 
तुम्हारे ख्वाबों की रूपहली राह पर।   

चांद ने कभी नहीं कहा 
मुझे कुछ करने से 
मगर फिर भी 
रहा हमेशा साथ 
मेरे पास
बनकर विश्वास। 
यह जानते हुए भी कि 
मैं उसके सहारे   
और उसके साथ भी
उसके पास भी 
और उसमें खोकर भी 
याद करती हूं तुम्हें। 
मैं और चांद दोनों जानते हैं कि 
चांद बेवफा नहीं होता। 
-स्मृति आदित्य

Monday, May 1, 2017

मैं एक मजदूर हूं.......राकेशधर द्विवेदी











मैं एक मजदूर हूं
भगवान की आंखों से मैं दूर हूं  

छत खुला आकाश है
हो रहा वज्रपात है
फिर भी नित दिन मैं
गाता राम धुन हूं
गुरु हथौड़ा हाथ में
कर रहा प्रहार है
सामने पड़ा हुआ  

बच्चा कराह रहा है
फिर भी अपने में मगन
कर्म में तल्लीन हूं
मैं एक मजदूर हूं
भगवान की आंखों से मैं दूर हूं।  

आत्मसंतोष को मैंने
जीवन का लक्ष्य बनाया
चिथड़े-फटे कपड़ों में
सूट पहनने का सुख पाया
मानवता जीवन को
सुख-दुख का संगीत है  

मैं एक मजदूर हूं
भगवान की आंखों से मैं दूर हूं।   
--राकेशधर द्विवेदी

Tuesday, April 25, 2017

बहुत दिन हो गए!....एमएल मोदी (नाना)










जब करते थे यारों के बीच ठिठौली
वो वक्त गुजरे बहुत दिन हो गए!

किसी अपने को तलाश करते हुए,
एक अनजान शहर में आए-
बहुत दिन हो गए!  

न मंजिल का पता है और न ही रास्ते की खबर,
फिर भी अनजानी राह पर चलते हुए-
बहुत दिन हो गए!

भीड़ तो बहुत देखी हमने इस जमाने में,
मगर इस भीड़ में कोई अपना देखे-
बहुत दिन हो गए!  

जब मिलेगा कहीं वो हमें तो,
पूछेंगे यार कहां थे तुमसे मिले-
बहुत दिन हो गए!  

और जो करते थे साथ निभाने की बातें,
उनसे बिछड़े 'नाना' को बहुत दिन हो गए!! 
-एमएल मोदी (नाना)  

Sunday, February 12, 2017

वृद्धाश्रम‌....प्रभुदयाल श्रीवास्तव



दुर्बल-निर्बल जेठे-स्याने,
वृद्धाश्रम में रहते क्यों हैं?
दूर हुए क्यों परिवारों से,
दु:ख तकलीफें सहते क्यों हैं?  

इनके बेटे, पोते, नाती,
घर में पड़े ऐश करते हैं,
और जमाने की तकलीफें,
ये बेचारे सहते क्यों हैं?  

इन सबने बच्चों को पाला,
यथायोग्य शिक्षा दी है,
ये मजबूत किले थे घर के,
टूट-टूट अब ढहते क्यों हैं?  

इसका उत्तर सीधा-सादा,
पश्चिम का भारत आना है,
पश्चिम ने तो मात-पिता को,
केवल एक वस्तु माना है। 

चीज पुरानी हो जाने पर,
उसको बाहर कर देते हैं,
इसी तरह से मात-पिता को,
वृद्धाश्रम में धर देते हैं।  

-प्रभुदयाल श्रीवास्तव

Wednesday, February 1, 2017

फिर से चांदी उग आई है...शम्भू नाथ

Image result for बसंत ऋतु
अलौकिक आनंद अनोखी छटा।  
अब बसंत ऋतु आई है।  
कलिया मुस्काती हंस-हंस गाती।  
पुरवा पंख डोलाई है।  

महक उड़ी है चहके चिड़िया।
भंवरे मतवाले मंडरा रहे हैं।  
सोलह सिंगार से क्यारी सजी है।  
रस पीने को आ रहे हैं  

लगता है इस चमन बाग में। 
फिर से चांदी उग आई है।। 
अलौकिक आनंद अनोखी छटा।  
अब बसंत ऋतु आई है।    

कलिया मुस्काती हंस-हंस गाती।  
पुरवा पंख डोलाई है।

-शम्भू नाथ