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Friday, April 24, 2020

मेरी फ़ितरत में है लड़ना ...निजाम फतहपुरी

ग़ज़ल- 212  212  212  212
अरकान- फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
दूर  मुझसे न  जा  वरना  मर जाऊँगा 
धीरे-धीरे   सही   मैं   सुधर    जाऊँगा  

बाद  मरने   के   भी   मैं   रहूँगा   तेरा 
चर्चा होगी  यही  जिस  डगर  जाऊँगा  

मेरा  दिल  आईना  है   न   तोड़ो  इसे 
गर ये टूटा तो फिर  से  बिखर जाऊँगा  

नाम  मेरा  भी  है   पर  बुरा  ही   सही 
कुछ न कुछ तो कभी अच्छा कर जाऊँगा

मेरी फ़ितरत में है लड़ना सच के लिए 
तू  डराएगा  तो  क्या  मैं  डर जाऊँगा  

झूठी दुनिया में दिल देखो लगता नहीं 
छोड़ अब ये महल अपने घर जाऊँगा  

मौत सच है यहाँ बाक़ी धोका "निज़ाम" 
सच ही कहना है कह के गुज़र जाऊँगा  
- निजाम फतेहपुरी

Thursday, April 23, 2020

घरों में बंद हो कर जीतना है ....अखिल भंडारी


गली कूचों में सन्नाटा बिछा है
हमारे शहर में क्या हो रहा है

ये किस ने ज़हर घोला है फ़ज़ा में
ये कैसा ख़ौफ़ तारी हो गया है

गले मिलना यहाँ की रीत कब थी
मिलाना हाथ भी दूभर हुआ है

सभी चेहरे नक़ाबों में छुपे हैं
सभी के दरमियाँ इक फ़ासला है

दुकानें बंद हैं अब शहर भर में
निज़ाम-ए-ज़िंदगी बदला हुआ है

हुए हैं क़ैद अपने ही घरों में
कि दुश्मन का अजब ये पैंतरा है

अजब ये जंग-ए-पोशीदा है इस को
घरों में बंद हो कर जीतना है

किरण उम्मीद की अब दिख रही है
उफ़ुक़ के पार कोई नूर सा है
-अखिल भंडारी 
पोशीदा = अदृश्य
उफ़ुक़ = क्षितिज



Wednesday, April 22, 2020

चाँद की व्यथा ....राजनन्दन सिंह


चाँद की व्यथा ....
ओ मानव!
आज देखा तुमने 
मुझे ग़ौर से 
मैं तो सदियों से 
ऐसा ही हूँ 
रोज़ आता हूँ ,
रोज़ जाता हूँ 
ख़ुद ताप सहकर
सारे जग को
अपनी शीतलता 
बिना भेदभाव
प्रदान करता हूँ 
कोमल किरणों से 
मानव मन में 
मधुरता भरता हूँ 
प्रेमियों के  मन में 
प्रेम का संचार 
करता हूँ .......


इस मशीनी युग 
की भागदौड़  में
मुझे देखने का 
कभी तुमको 
समय ही ना मिला 
तुम प्रकृति से दूर 
अप्राकृतिक जीवन 
जीने मे व्यस्त रहे 
समय का अभाव रहा 
जीवन बरबाद रहा .....


कवियों का कहा 
तुमने सर झुका 
मान लिया !
अपनी नज़र से गर
मुझे देखते-परखते 
चाँदनी के साथ मेरे 
ज़ख़्म भी दिखते 
कोमल किरणों का
दर्द भी अनुभव होता ......


कानों के कितने 
कच्चे हो तुम !
आज किसी ने 
कह दिया कि 
उल्टा हो गया हूँ मैं 
तो झट मान लिया?
पर चलो 
इस बहाने से तुमने 
मुझको ग़ौर से 
कुछ देर निहार 
तो लिया....

-राजनन्दन सिंह

Tuesday, April 21, 2020

पेड़ .....डॉ. शैलजा सक्सेना


पेड़ 
तुम्हें धन्यवाद 
पिता और प्रपिताओं से खड़े हो 
सदियों से 
हमें सुख देने को.,.
पेड़! तुम्हें धन्यवाद ।


तुम्हारे 
खुरदुरे शरीर पर हाथ फिराती 
सोच रही हूँ 
कि तुम क्या सोच रहे हो?
तुम्हारी धड़कन नहीं सुनाई देती 
पर तुम हहराने लगते हो पत्तियों की आवाज़ में 
ख़ूब बोल सकते हैं पेड़ हवाओं की अनुमति पर 
पूरा जंगल बोल रहा है
गिलहरियों, झींगुरों की आवाज़ में


मैं तुम्हारे झुके तने पर बैठी 
अपनी सारी कल्पना लिए  
तुम्हारे जड़ों की सोच तक घुसने को इच्छुक!


तुम जाने किस स्वर में गूँजने लगे मेरे भीतर 
“इच्छा है 
व्याकुलता नहीं, 
इसी से पहुँच नही पाती जड़ों के सत्य तक “ 


तुम व्याकुल होती तो बुद्ध हो जातीं  
पातीं मुझ से होकर सत्य तक जाने की राह
तुम स्नेहिल होती तो कृष्ण हो जाती  
पातीं मेरी डालों पर पड़े झूले की पींग में प्रेम का आकाश
तुम प्रेमी होतीं तो राम हो जाती
पूछती मुझ से अपने खोये अर्धसत्य का पता  
तुम जिज्ञासु होतीं तो न्यूटन हो जाती 
पातीं मनुष्य की विराटता से बड़ा है धरती का गुरुत्व  


कोई ऋषि हो जाती अगर साधक होती तो 
मेरी जड़ों पर बैठ स्वयं में पैठतीं!


तुम केवल इच्छुक हो  
इच्छा लहर है संकल्प और विकल्प की 
समर्पणहीन सी !
मैं समर्पित हूँ धरती को 
हवा को 
बादल और आकाश को.. 
सदियों का समर्पण 
ही कर पाता है अर्पण कुछ 
अपने को या दूसरे को..”
गूँजा जाने किस स्वर में मेरे भीतर पेड़
मिट्टी के सच की तरह!!
मैं चुपचाप उठी और जंगल के दो फूल उस वृक्ष के नीचे रख,
चल पड़ी!
लगा,
हर वृक्ष बोधि वृक्ष है 
जिसे प्रतीक्षा है अपने लिए किसी शुद्ध मन
बुद्ध की!!

-डॉ. शैलजा सक्सेना

Saturday, May 18, 2019

कविता की तलाश ......सरिता यादव

क्या लिखूँ मैं,
मेरे ख़ुदा मुझे एक कविता चाहिए।
कभी न सही 
अभी और इसी वक़्त चाहिए।
मेरे ख़ुदा मुझे एक कविता चाहिए, 
ताज न शोहरत चाहिए।
मेरे ख़ुदा मुझे 
कुछ शब्द चाहिए।
लिख सकूँ दिल की बात  
टूटी बिखरी यादों के अल्फ़ाज़
ढूँढ रही स्वछंद छंद।
ऐसी पंक्ति की कविता चाहिए 
मेरे ख़ुदा मुझे एक शब्द चाहिए।
मेरे ख़ुदा मुझे एक कविता चाहिए।
-सरिता यादव 

Tuesday, May 14, 2019

खड़े जहाँ पर ठूँठ.....रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

खड़े जहाँ पर ठूँठ
कभी वहाँ
पेड़ हुआ करते थे।
सूखी तपती
इस घाटी में कभी
झरने झरते थे।

छाया के 
बैरी थे लाखों
लम्पट ठेकेदार,
मिली-भगत सब 
लील गई थी
नदियाँ पानीदार।
अब है सूखी झील 
कभी यहाँ 
पनडुब्बा तिरते थे।

बदल गए हैं 
मौसम सारे
खा-खा करके मार
धूल-बवण्डर
सिर पर ढोकर 
हवा हुई बदकार 
सूखे कुएँ,
बावड़ी सूखी
जहाँ पानी भरते थे।
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

Monday, April 22, 2019

चुगली कहूँ........ज़हीर अली सिद्दीक़ी

चुगली कहूँ...
या क्रिकेट की गुगली 
क्रमशः करने और दूसरा डालने पर
बोल्ड होना तय है॥

तरक्क़ी से भय 
चापलूसी से उदय  
मुहब्बत की दिखावटी विधा
लोकमत की ख़िलाफ़त तय है॥

मित्रता को सर्पदंश 
आपसी रिश्ते के शकुनि-कंस
प्रेमिका से तक़रार  
विध्वंसक नतीजा तय है॥

कहीं मनोरंजन तो...
मनमुटाव कहीं...
प्रतिशोध की ज्वाला की वजह कहीं 
अंधकारमय नतीजा तय है॥

चाल है प्रकाश की 
ऊर्जा है आकाश सी  
कम्पन है भूकंप की 
कम्पन से प्रवास तय है॥

भूत से वर्तमान का
भविष्य है रहस्य का 
रहस्य ही प्रचंड है  
गोपनीयता का दंग होना तय है॥
-ज़हीर अली सिद्दीक़ी 

Sunday, April 21, 2019

ताँका....डॉ. सुरंगमा यादव

*
निज शक्ति का
हनुमत को जब 
हुआ आभास
पल में लाँघ लिया 
निस्सीम पारावार ।

*
प्रकृति सदा 
निरत रहती है 
निज कार्यों में 
मनुज होकर तू
व्यर्थ वक़्त बिताये।

*
पथ बाधा से 
विचलित होकर 
जीवन व्यर्थ 
सच्चा मनुज वही 
जो करता संघर्ष।
-डॉ. सुरंगमा यादव

Saturday, April 20, 2019

स्वप्न की जलती राह.....सरिता यादव

कुछ उथले से कुछ गहरे से।
भाँति भाँति के चित्र उभर कर बूँद बूँद बिखरे से।
हाँ यही स्वप्न और जीवन है।
जिनको जन मानस पालता है।
मन के कोने कोने में।
कुछ हाँ मीठी कुछ तीखी याद में बीते।
किन्तु शीतल शीघ्र गर्म हवा में रीते।
काँच की तरह बिखर जाएँ फ़र्श पर,
पल भर में, सँजोए सारे स्वप्न।
बस यही ज़िन्दगी है।
उम्र के गलियारे हर मोड़ नये होते हैं।
मिले कई बिछड़े कई।
अन्त में कौन किसके साथ होते हैं?
यही ज़िन्दगी है।
-सरिता यादव 

Friday, April 19, 2019

प्रश्न और प्रश्न.....सतीश राय


प्रश्न चिन्हों की नदी में 
डूबता मैं जा रहा,
सब चले पतवार लेकर, 
मैं भँवर में नहा रहा।
है ये हिम्मत या हिमाक़त, 
वक़्त ही बताएगा,
अपनी धुन हम ख़ुद रटेंगे, 
या ज़माना गायेगा।
सब चले पक्की सड़क पर, 
पगडण्डी मैं बना रहा,
प्रश्न चिन्हों की नदी में 
डूबता मैं जा रहा।

अपने ख़्वाबों को सँजोए, 
दिल ही दिल में जो गदगदा रहा,
कल के बदले में कहीं मैं, 
आज तो ना गँवा रहा?
मैं किनारे रुक कर तनिक 
सोच तो लूँ, पर कैसे!
आकांक्षाओं का प्रवाह मुझे 
प्रतिपल बहाता जा रहा।
क्यूँ न जाकर वापस मैं भी, 
पकड़ लूँ वही पक्की डगर?
महफ़िलों की भीड़ में मैं, 
ख़ुद को खो न लूँ मगर!
पीछे पड़े अपने निशां पर, 
मैं जो यूँ इठला रहा,
प्रश्न चिन्हों को मैं 
अपने प्रश्नों में ही डूबा रहा।
जो भी संशय था, 
अब ना रहा.....अब ना रहा!
-सतीश राय

Friday, February 1, 2019

यादों के दरीचे से........अर्जित पाण्डेय

एक हसीन ख़्वाब
काग़ज़ की तरह मोड़कर
दिल के कमरे में बने 
यादों के दरीचे पर मैंने 
रख दिया है
धूमिल न हो जाए वो पन्ना 
इसलिए अक्सर उसे अपने
आँसुओं से धोता हूँ
उस ख़्वाब को सजाने में
वक़्त की कितनी सीमाएँ लाँघी हमने, 
ये सोचता हूँ
उस पन्ने पर अपने ख़्वाब मैं 
और लिखना चाहता था 
पर ज़माने की पैदा की हुई ठण्ड ने 
मेरी लेखनी की स्याही को जमा डाला 
मैं बेबस लाचार अब उस ख़्वाब को 
लिख नहीं सकता 
पर जब वक़्त के झोंकों से
वो पन्ना 
यादों के दरीचे से हिलता है 
तो मैं उस लिखे हुए ख़्वाब को पढ़ लेता हूँ
-अर्जित पाण्डेय

Friday, December 28, 2018

अश्रु नीर.....दीपा जोशी

यह नीर नही
चिर स्नेह निधि
निकले लेन
प्रिय की सुधि

संचित उर सागर
निस्पंद भए
संग श्वास समीर
नयनों में सजे

युग युग से
जोहें प्रिय पथ को
भए अधीर
खोजन निकले

छलके छल-छल
खनक-खन मोती बन
गए घुल रज-कण
एक पल में
-दीपा जोशी

Sunday, December 16, 2018

सरकारी दस्तावेज़ों में थर्ड जेंडर हूँ....अपर्णा बाजपेई

न औरत हूँ न मर्द हूँ
अपने जन्मदाता का अनवरत दर्द हूँ।
सुन्दर नहीं हूँ, असुंदर भी नहीं
हुस्न और इश्क़ का सिकंदर भी नहीं।
मखौल हूँ समाज का, हँसी का लिबास हूँ,
ग़लत ही सही ईश्वर का हिसाब हूँ।
जान मुझमें भी है, संवेदना भी
जन्म भले न दूँ, पालक लाज़वाब हूँ।
हँसते हो, खिलखिलाते हो,मज़ाक बनाते हो,
तुम्हारी नीचता का क़रारा जवाब हूँ।
तुम्हारे जन्म पर तालियाँ बजाता हूँ,
अपने होने की क़ीमत माँग जाता हूँ,
मर्द का जिगर हूँ , औरत की ममता हूँ
पके हुए ज़ख्म सा हर पल रिसता हूँ
देहरी और दालान के बीच में अटका हूँ
पाच उँगलियों के साथ छठी उँगली सा लटका हूँ।
चंद सिक्के फेंक कर पीछा छुड़ाते हो,
क्यों नहीं मेरा दर्द थोड़ा सा बाँट जाते हो।
मुझमें भी साँसे हैं, मेरे भी सपने हैं,
पराये ही सही कुछ मेरे भी अपने हैं,
प्यार की झप्पी पर मेरा भी हक़ है,
इज़्ज़त की रोटी मुझे भी पसंद है।
नागरिक किताबों में बोया हुआ अक्षर हूँ,
पूरे लिखे पत्र का ज़रूरी हस्ताक्षर हूँ।
नर और नारायण के बीच का बवंडर हूँ
सरकारी दस्तावेज़ों में थर्ड जेंडर हूँ।
-अपर्णा बाजपेई

Saturday, December 1, 2018

अक्षर.....डॉ. जगदीश व्योम


अक्षर कभी क्षर नहीं होता
इसीलिए तो वह ’अक्षर’ है
क्षर होता है तन
क्षर होता है मन
क्षर होता है धन
क्षर होता है अज्ञन
क्षर होता है मान और सम्मान
परंतु नहीं होता है कभी क्षर
’अक्षर’ 
इसलिए अक्षरों को जानो
अक्षरों को पहचानो
अक्षरों को स्पर्श करो
अक्षरों को पढ़ो
अक्षरों को लिखो
अक्षरों की आरसी में अपना चेहरा देखो
इन्हीं में छिपा है 
तुम्हारा नाम
तुम्हारा ग्राम
और तुम्हारा काम
सृष्टि जब समाप्त हो जोगी
तब भी रह जाएगा ’अक्षर’
क्यों कि ’अक्षर’ तो ब्रह्म है
और भला-
ब्रह्म भी कहीं मरता है?
आओ! बाँचें 
ब्रह्म के स्वरूप को 
सीखकर अक्षर 
-डॉ. जगदीश व्योम

Friday, November 30, 2018

आवाज़.....पाराशर गौड़

सुनो..
मेरी आवाज़ को गौर से सुनो
अगर पौधा मर गया तो उसके साथ
बीज भी मर जायेगा
धरती बंजर हो जायेगी
किसान भी मर जायेगा-

अगर वो मरा तो...
उसके साथ समुचा देश भी मर जायेगा
फिर...
ना तो कोई सुननेवाला होगा
ना सुनाने वाला।
-पाराशर गौड़

Thursday, November 29, 2018

आवाज़.....दीप्ति शर्मा


आवाज़ जो
धरती से आकाश तक
सुनी नहीं जाती
वो अंतहीन मौन आवाज़
हवा के साथ पत्तियों
की सरसराहट में
बस महसूस होती है
पर्वतों को लाँघकर
सीमाएँ पार कर जाती हैं
उस पर चर्चायें की जाती हैं
पर रात के सन्नाटे में
वो आवाज़ सुनी नहीं जाती
दबा दी जाती है
सुबह होने पर
घायल परिंदे की
अंतिम साँस की तरह
अंततः दफ़न हो जाती है
वो अंतहीन मौन आवाज़

-दीप्ति शर्मा

Tuesday, November 27, 2018

अक्स तुम्हारा (हाइकु)............डॉ. सरस्वती माथुर

अक्स तुम्हारा (हाइकु)

1
मोर है बोले
मेघ के पट जब
गगन खोले 
2
वक्त तकली
देर तक कातती
मन की सुई l
3
यादों के हार
कौन टाँक के गया
मन के द्वार 
4
अक्स तुम्हारा
याद आ गया जब
मन क्यों रोया ?
5
यादों से अब
मेरा बंधक मन
रिहाई माँगे 
6
यादों की बाती
मन की चौखट को
रोशनी देती l
7
साँझ होते ही
आकाश से उतरी
धूप चिरैया 
8
धरा अँगना
चंचल बालक सी
चलती धूप 
9
भोर की धूप
जल दर्पण देख
सजाती रूप 
10
मेघ की बूँदें
धरा से मिल कर
मयूरी हुई

-डॉ. सरस्वती माथुर

Sunday, November 25, 2018

रिश्ते...........डॉ. रति सक्सेना

कुछ रिश्ते
तपती रेत पर बरसात से
बुझ जाते हैं,
बनने से पहले
रिश्ते 
ऐसे भी होते हैं
चिनगारी बन
सुलगते रहते हैं जो
जिन्दगी भर
चलते साथ कुछ कदम
कुछ रुक जाते बीच रास्ते
रिश्ते होते हैं कहाँ
जो साथ निभाते हैं
सफर खत्म होने तक
-डॉ. रति सक्सेना

Friday, November 23, 2018

आँसुओं का खजाना.........डॉ. रति सक्सेना

एक आँसू
उसके लिए
जो अपना न बन सका

एक आँसू
अपना बनने का
दिखावा करने वाले के लिए

एक आँसू
अपने आप से 
दोस्ती करवाने वाले के लिए

आँसुओं का खजाना
खत्म हो गया
-डॉ. रति सक्सेना