सोचा न कभी खाने कमाने से निकलकर
हम जी न सके अपने ज़माने से निकलकर
जाना है किसी और फ़साने में किसी दिन
आये थे किसी और फ़साने से निकलकर
ढलता है लगातार पुराने में नया दिन
आता है नया दिन भी पुराने से निकलकर
दुनिया से बहुत ऊब कर बैठे थे अकेले
अब जाएँ कहाँ दिल के ठिकाने से निकलकर
किस काम की यारब तेरी अफ़सानानिग़ारी
किरदार भटकते हैं फ़साने से निकलकर
चहरों की बड़ी भीड़ में दम घुट सा गया था
साँस आई मेरी आइनाख़ाने से निकलकर
कोशिश से कहाँ हमने कोई शे’र कहा है
आये हैं गुहर ख़ुद ही ख़ज़ाने से निकलकर
- राजेश रेड्डी
हज़ज की मुज़ाहिफ़ सूरत
मफ़ऊल मफ़ाईल मुफ़ाईल फ़ालुन
22 11 22 11 22 11 22
http://aajkeeghazal.blogspot.in/2010/07/blog-post.html
