
शोर यूँ ही न परिंदों* ने मचाया होगा,
कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा।
पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था,
जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा।
बानी-ए-जश्ने-बहाराँ** ने ये सोचा भी नहीं
किस ने काटों को लहू अपना पिलाया होगा।
अपने जंगल से जो घबरा के उड़े थे प्यासे,
ये सराब*** उन को समंदर नज़र आया होगा।
बिजली के तार पर बैठा हुआ तनहा पंछी,
सोचता है कि वो जंगल तो पराया होगा।
1919-2002
-कैफ़े आज़मी
:शब्दार्थ:
*पक्षियों, **वसन्तोत्सव के प्रेरणा स्रोतों, ***धोखा
