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Saturday, March 30, 2019

‘एक नया अनुभव’...हरिवंश राय बच्चन



मैंने चिड़िया से कहा, 'मैं तुम पर एक 
कविता लिखना चाहता हूँ ।'
चिड़िया ने मुझ से पूछा, 'तुम्हारे शब्दों में 
मेरे परों की रंगीनी है ?'
मैंने कहा, 'नहीं ।'
'तुम्हारे शब्दों में मेरे कंठ का संगीत है ?'
'नहीं ।'
'तुम्हारे शब्दों में मेरे डैनों की उड़ान है ?'
'नहीं ।'
'जान है ?'
'नहीं ।'
'तब तुम मुझ पर कविता क्या लिखोगे ?'
मैंने कहा, 'पर तुमसे मुझे प्यार है ।'
चिड़िया बोली, 'प्यार का शब्दों से क्या सरोकार है ?'
एक अनुभव हुआ नया ।
मैं मौन हो गया !
-हरिवंशराय बच्चन

Saturday, December 31, 2016

वह साल गया, यह साल चला.....हरिवंशराय बच्चन

मित्रों ने हर्ष-बधाई दी
मित्रों को हर्ष-बधाई दी
उत्तर भेजा, उत्तर आया
'नूतन प्रकाश', 'नूतन प्रभात'
इत्यादि शब्द कुछ दिन गूंजे
फिर मंद पडे, फिर लुप्त हुए
फिर अपनी गति से काल चला;
वह साल गया, यह साल चला।

आने वाला 'कल' 'आज' हुआ,
जो 'आज' हुआ वो 'कल' कहलाया
पृथ्वी पर नाचे रात-दिवस,
नभ में नाचे रवि-शशि-तारे.
निश्चित गति रखकर बेचारे।
यह मास गया, वह मास गया,
ऋतु-ऋतु बदली,मौसम बदला;
वह साल गया, यह साल चला।

झंझा-सनसन. घन-घन-गर्जन,
कोकिल - कूजन, केकी - क्रंदन,
अखबारी दुनिया की हलचल,
संग्राम - संधि. दंगा - फसाद,
व्याख्यान विविध चर्चा-विवाद
हम-तुम यह कह कर भूल गए,
वह बुरा हुआ, यह भला हुआ;
वह साल गया, यह साल चला।

-हरिवंशराय बच्चन
......मधुरिमा से

Friday, July 18, 2014

कोई पार नदी के गाता...........हरिवंशराय बच्चन




भंग निशा की नीरवता कर
इस देहाती गाने का स्‍वर
ककड़ी के खेतों से उठकर,
आता जमुना पर लहराता
कोई पार नदी के गाता।


होंगे भाई-बंधु निकट ही
कभी सोचते होंगे यह भी
इस तट पर भी बैठा कोई,
उसकी तानों से सुख पाता
कोई पार नदी के गाता।


आज न जाने क्‍यों‍ होता मन
सुनकर यह एकाकी गायन
सदा इसे मैं सुनता रहता,
सदा इसे मैं गाता जाता
कोई पार नदी के गाता। 


-हरिवंशराय बच्चन